लगभग एक वर्ष के राष्ट्रपति शासन के बाद मणिपुर में पूर्व मंत्री युमनाम खेमचंद सिंह के नेतृत्व में लोकप्रिय सरकार का गठन हो गया है। उन्होंने बुधवार शाम को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। उनके साथ दो उपमुख्यमंत्री कुकी समुदाय से नेमचा किपगेन और नागा समुदाय से लोधी दिखो ने भी शपथ ली। पूर्व मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह के कट्टर आलोचक खेमचंद सिंह को भाजपा नेतृत्व में स्वयं मुख्यमंत्री के रूप में चुना है। लम्बे समय से जातीय हिंसा और राजनीतिक अनिश्चितता झेल रहे राज्य में नई सरकार का गठन कर भाजपा ने स्थिति को संतुलित करने के लिए बड़ा दांव खेला है।
भाजपा ने मैतेई और कुकी समुदाय के नेताओं को सत्ता में साथ लाने की रणनीति पर काम किया। इसके पीछे सामाजिक संतुलन और शांति बहाली के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। भाजपा ने कुकी समुदाय से आने वाली महिला नेता नेमचा किपजेन को डिप्टी सीएम बनाने का फैसला किया। दोनों समुदायों को सत्ता में प्रतिनिधि देकर बीजेपी राजनीतिक और सामाजिक तनाव कम करके राज्य में स्थिर सरकार देना चाहती है। मणिपुर में नई सरकार का गठन संवैधानिक जरूरत और राजनीतिक अनिवार्यता दोनों ही थी क्योंकि राज्य में राष्ट्रपति शासन की अवधि फरवरी में खत्म हो रही है। ऐसे में समय पर सरकार का गठन जरूरी था। नई सरकार बनने से प्रशासनिक फैसले तेजी से लिए जा सकेंगे और शांति की बहाली की प्रक्रिया मजबूत होगी।
60 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा के पास 37 विधायक हैं और उसके पास सरकार बनाने के लिए पर्याप्त आंकड़े हैं लेकिन महत्वपूर्ण बात यह थी कि मैतेई-कुकी संघर्ष को पूरी तरह से समाप्त करने के लिए भाजपा क्या संतुलन कायम करती है जिससे शांति बहाली हो सके। मैतेई समुदाय से ताल्लुक रखने वाले युमनाम खेमचंद सिंह की पहचान ऐसे नेता की है जिन्हें हर समुदाय का समर्थन हासिल है। वे हर किसी समूह के साथ जाकर काम कर सकते हैं। उनकी छवि एक सुलझे हुए राजनेता की है जो संगठन और सरकार दोनों का अनुभव रखते हैं। वे 2017 से 2022 तक मणिपुर विधानसभा के स्पीकर रह चुके हैं।
इस दौरान उन्होंने कई विधायी निर्णय लिए और सदन को सुचारू रूप से चलाने का अनुभव प्राप्त किया। 2022 में पुनः बीजेपी सरकार बनने पर उन्हें एन. बीरेन सिंह की कैबिनेट में शामिल किया गया था और उनके पास नगर प्रशासन और आवास विकास, ग्रामीण विकास और पंचायत राज जैसे भारी-भरकम मंत्रालय थे। खेमचंद सिंह को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का समर्थन हासिल है और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के साथ भी उनके अच्छे संबंध हैं। मणिपुर में 3 मई 2023 को जातीय हिंसा शुरू हुई थी जिसमें 300 से अधिक लोग मारे गए और हजारों लोग बेघर हुए। हिंसा की शुरूआत तब हुई जब मणिपुर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को मैतेई समुदाय को एसटी का दर्जा देने की सिफारिश भेजने को कहा।
इस फैसले से पहाड़ी इलाकों में रहने वाली कुकी जनजातियों में असुरक्षा बढ़ी। उनका मानना था कि मैतेई समुदाय को एसटी का दर्जा मिलने पर आरक्षण में उनकी हिस्सेदारी कम हो जाएगी। साथ ही घाटी का प्रभाव बढ़कर पहाड़ी इलाकों के प्रभावों को कम करेगा। कुकी लोगों को डर था कि अगर मैतेई लोगों को जनजातीय दर्जा मिल जाता है तो वे और भी ज्यादा हाशिये पर चले जाएंगे। बहुसंख्यक मैतेई मुख्य रूप से इम्फाल घाटी में बसे हुए हैं जबकि कुकी लोगों की बसावट पहाड़ी इलाकों में है। मणिपुर में भूमि अधिकार, जंगलों का नियंत्रण, सीमा निर्धारण और पुनर्वास जैसे मुद्दे कई वर्षों से विवाद का केन्द्र रहे हैं। कुकी समुदाय का आरोप था कि मैतेई समुदाय उनके अधिकारों में हस्तक्षेप कर रहा है। मैतेई समुदाय मुख्यतः हिन्दू हैं जबकि कुकी अधिकतर ईसाई हैं।
यह पहचान राजनीति में बदल कर संघर्ष को और गहरा कर गई। हिंसा फैली तो घर जले। मंदिरों और चर्चों पर हमले हुए। हजारों लोग विस्थापित हुए। कई जिलों में महीनों तक कर्फ्यू लगा रहा। इंटरनेट बंद रहा। सुरक्षा बलों की तैनाती की गई। तत्कालीन एन. बीरेन सरकार हिंसा को रोकने में पूरी तरह विफल रही। इस हिंसा ने मणिपुर के समाज को पूरी तरह से बांट दिया। कुकी और मैतेई समुदाय अपनी-अपनी सुरक्षा में लग गए। हालात ऐसे बने कि दोनों समुदायों ने एक-दूसरे के इलाकों में जाना ही बंद कर दिया। कुकी समूहों ने एन. बीरेन पर मैतेई लोगों का पक्ष लेने का आरोप भी लगाया। अंततः केन्द्र सरकार ने राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया लेकिन विधानसभा निलम्बित रखी गई। केन्द्र सरकार ने दोनों समुदायों में दूरियां पाटने के लिए बातचीत का सिलसिला शुुरू किया।
कुकी समुदाय का कहना है कि समस्या का हल सिर्फ शांति प्रक्रिया के दौरान ईमानदारी और गैर पक्षपाती रवैया अपना कर ही हो सकता है। जब तक संसाधनों का समान बंटवारा या केन्द्रीय व्यवस्था नहीं स्थापित होती, समस्या खत्म नहीं होगी और समाधान की प्रक्रिया जटिल बनी रहेगी। इस समस्या से निपटने का टिकाऊ तरीका यही है कि जातीय तनाव की जड़ के जो मुद्दे हैं उन्हें हल किया जाए और ऐसा समाधान किया जाए जो दोनों पक्षों को स्वीकार्य हो। कुकी में नगा समुदाय भी शामिल है। कुकी और मैतेई समुदायों में तनाव तो अंग्रेजों के शासन से ही चल रहा है।
अब जबकि राज्य में फिर से सरकार बन गई है तो उम्मीद की जानी चाहिए िक युमनाम सरकार राज्य में शांति बहाल के प्रयास करेगी और दोनों समुदायों के बीच गहरी हाे चुकी अविश्वास की खाई को पाटने के लिए बातचीत की प्रक्रिया शुरू करेगी। हाल ही में युमनाम खेमचंद सिंह ने कुकी बहुल इलाकों का दौरा कर शांति और बातचीत की वकालत की थी। मैतेई समुदाय से होने के बावजूद दूसरे समुदायों तक उनकी पहुंच उन्हें मौजूदा संकट में एक स्वीकार्य चेहरा बना सकती है। विवादों से दूर रहने वाले नेता के तौर पर उनकी पहचान बड़ी भूमिका निभा सकती है। जरूरत इस बात की है कि दोनों समुदायों के बीच संवाद कायम हो। जमीन और आरक्षण पर स्पष्ट नीति तैयार की जाए। अगर ऐसा नहीं हुआ तो फिर से तनाव पैदा हो सकता है।
कुकी समुदाय को भी कुकीलैंड या जूमलैंड नाम से अलग प्रशासनिक स्वायत्तता की मांग छोड़नी होगी। क्योंकि मैतेई समुदाय इस मांग को राज्य की अखंडता के लिए खतरा मानता है। पड़ोसी देश से होने वाली अवैध घुसपैठ को भी नियंत्रित किए जाने की जरूरत है। राज्य में निष्पक्ष सरकार का होना बहुत जरूरी है। ताकि लोगों को भरोसा हो कि सरकार उनके हक के लिए काम कर रही है।


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