आरएसएस की संस्कार और समभाव-सद्भाव की शताब्दी

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एक बार पाकिस्तान के एक टीवी चैनल में कोई एंकर आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) की तारीफों के पुल बांध रहे थे, उनका कहना था कि यह विश्व का सबसे बड़ा और अनुशासित संगठन है, जिसके राजनीतिक चेहरे भाजपा के विश्व में किसी भी राजनीतिक पार्टी से अधिक सदस्य हैं। उन्होंने यह भी बताया कि यदि मुस्लिम संगठन इनकी तरह अनुशासन से बंध जाएं तो बहुत आगे जाएंगे। आरएसएस के बारे में मुस्लिम और वह भी पाकिस्तानी से ऐसा सुनकर बड़ा आश्चर्य हुआ, मगर अच्छा लगा क्योंकि आरएसएस के बारे में प्रायः एक साधारण मुस्लिम के विचार कड़वाहट से भरे होते…

एक बार पाकिस्तान के एक टीवी चैनल में कोई एंकर आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) की तारीफों के पुल बांध रहे थे, उनका कहना था कि यह विश्व का सबसे बड़ा और अनुशासित संगठन है, जिसके राजनीतिक चेहरे भाजपा के विश्व में किसी भी राजनीतिक पार्टी से अधिक सदस्य हैं। उन्होंने यह भी बताया कि यदि मुस्लिम संगठन इनकी तरह अनुशासन से बंध जाएं तो बहुत आगे जाएंगे। आरएसएस के बारे में मुस्लिम और वह भी पाकिस्तानी से ऐसा सुनकर बड़ा आश्चर्य हुआ, मगर अच्छा लगा क्योंकि आरएसएस के बारे में प्रायः एक साधारण मुस्लिम के विचार कड़वाहट से भरे होते हैं, जिनका विशेष कारण आरएसएस के संबंध में ज्ञान का अभाव है।

एक मौलाना, जो आरएसएस द्वारा संचालित स्कूल के छात्र रहे हैं और एक बहुत कामयाब जीवन जी रहे हैं, कहते हैं कि आरएसएस को मुस्लिमों से कोई बैर नहीं है। यह तो मुस्लिम वित्त बैंक के सौदागर हैं, जो उनके और आरएसएस के बीच सत्ता हथियाने के लिए दीवारें खड़ी कर देते हैं। आरएसएस और उसके सियासी मुखौटे, भाजपा पर आरोप लगाया जाता है कि वे उनकी मस्जिदों-मदरसों पर बुलडोज़र चलाते हैं, घर वापसी चाहते हैं, मस्जिदों में भगवा झंडे लेकर घुस जाते हैं, गौ हत्या के आरोप में लिंचिंग करते हैं आदि। समाज में अच्छे और बुरे, दोनों तत्व होते हैं। हां अच्छे लोग अधिक होते हैं, जिनके कारण आम शांति बनी रहती है और कम ऐसे होते हैं, जो झगड़ा, फसाद आदि करते हैं, जिनके कारण शांति भंग होती है।

आरएसएस का उसूल है कि धर्म एक होता है और उसके रूप अनेक होते हैं, जैसे हिंदू, मुस्लिम, सिख ईसाई, पारसी आदि। आरएसएस ने कभी भी धर्मांतरण पर ज़ोर नहीं डाला। किसी भी संगठन के लिए शताब्दी वर्ष और विशेष रूप से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए केवल उत्सव का अवसर नहीं होता, बल्कि आत्ममंथन, उपलब्धियों के मूल्यांकन और भविष्य की दिशा निर्धारित करने का भी अवसर होता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सौ वर्षों की यात्रा कोई फूलों की सेज नहीं, कांटों का बिस्तर और ​िसर पर लटकती तलवार की भांति है। न जाने अंग्रेजों द्वारा और मौजूदा दौर में भी कितने आरएसएस कर्मठ कार्यकर्ता भारत माता पर न्यौछावर हो चुके हैं।

भारत के राष्ट्रजीवन से भी ऊपर से सांस्कृतिक चेतना, सामाजिक समरसता और सेवा के इतिहास का डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने संघ की स्थापना करके प्रारंभ किया। उस समय भारत राजनीतिक दासता से जूझ रहा था, समाज जातीय और सामाजिक विभाजनों में बंटा हुआ था तथा राष्ट्रीय चेतना कमजोर पड़ रही थी। डॉ. हेडगेवार ने समझ लिया था कि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता पर्याप्त नहीं होगी, राष्ट्र को स्थायी रूप से सशक्त बनाने के लिए समाज का संगठन आवश्यक है। उन्होंने कहा था ‘यदि समाज संगठित होगा तो राष्ट्र स्वतः सशक्त होगा।’ आज सौ वर्षों बाद यह विचार केवल सिद्धांत नहीं, बल्कि भारत के जनजीवन में प्रत्यक्ष दिखाई देने वाली वास्तविकता है। इसी प्रकार से दीन दयाल उपाध्याय ने कहा था कि सरकारी सुविधा देश के सब से पीछे और निर्धन व्यक्ति को मिलनी चाहिए।

एक वरिष्ठ स्वयंसेवक कहते हैं ‘मैं अपने जीवन की यात्रा पर दृष्टि डालता हूं तो मुझे गर्व के साथ स्वीकार करना पड़ता है कि राष्ट्रवाद, अनुशासन, सामाजिक उत्तरदायित्व और सांस्कृतिक चेतना के जो बीज मेरे मन में पड़े, उनका प्रारंभिक स्रोत संघ प्रेरित शिक्षण संस्थान रहे। हिंदू, मुस्लिम, सिख ईसाई, सब मेरे भाई। इसी प्रकार से कासमी के निकट शिशु मंदिर में अध्ययन का अवसर मिला। बाल्यावस्था में शायद हम यह नहीं समझते कि प्रार्थना, वंदना, गुरुजनों का सम्मान, राष्ट्रध्वज के प्रति आदर और मातृभूमि के प्रति प्रेम हमारे व्यक्तित्व को किस प्रकार आकार दे रहे हैं किंतु समय के साथ यह स्पष्ट हुआ कि वही संस्कार जीवन की सबसे बड़ी पूंजी हैं। किसी भी शिशु मंदिर में केवल पाठ्यपुस्तकों का ज्ञान नहीं दिया जाता है, बल्कि एक सजग, जिम्मेदार और राष्ट्रनिष्ठ नागरिक बनने का प्रशिक्षण भी दिया जाता है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसने अपने कार्य का प्रचार कभी स्वयं नहीं किया। जब भी देश पर संकट आया, स्वयंसेवक सबसे पहले सेवा के लिए उपस्थित हुए। चाहे 1947 के विभाजन की त्रासदी हो, 1962 का युद्ध हो, 1971 के शरणार्थी संकट का समय हो, गुजरात और उत्तराखंड की प्राकृतिक आपदाएं हों या कोविड-19 महामारी-हर अवसर पर संघ के स्वयंसेवकों ने निस्वार्थ सेवा का उदाहरण प्रस्तुत किया। कोविड काल में लाखों परिवारों तक भोजन, दवाइयां, ऑक्सीजन और आवश्यक सहायता पहुंचाने का कार्य स्वयंसेवकों ने किया। अनेक स्थानों पर अंतिम संस्कार तक की व्यवस्था स्वयंसेवकों ने संभाली। यह सेवा किसी जाति, धर्म या राजनीतिक विचारधारा को देखकर नहीं की गई, बल्कि मानवता के आधार पर की गई।

संघ की कार्यपद्धति है ‘नर सेवा ही नारायण सेवा।’ संघ के बारे में अनेक प्रकार की भ्रांतियां फैलाई गईं, किंतु जिन्होंने संघ को निकट से देखा है वे जानते हैं कि संघ की मूल साधना सामाजिक समरसता है। शाखा में व्यक्ति की पहचान उसकी जाति, भाषा, क्षेत्र या आर्थिक स्थिति से नहीं होती। वहां केवल एक पहचान होती है, वह भारत माता का पुत्र है। संघ का स्वयंसेवक जब शाखा में खड़ा होता है तो उसके बगल में खड़ा व्यक्ति किसी भी जाति, समुदाय या वर्ग से हो सकता है, किंतु दोनों के बीच कोई भेद नहीं रहता।

सेवा भारती, वनवासी कल्याण आश्रम, विद्या भारती और अनेक अन्य संगठनों के माध्यम से संघ ने वंचित, दलित, आदिवासी और पिछड़े समाज के उत्थान के लिए व्यापक कार्य किया है। समरसता केवल भाषणों से नहीं आती, वह व्यवहार से आती है। संघ ने इसे व्यवहार में उतारने का प्रयास किया है। गुरुजी माधव सदाशिव गोलवलकर कहा करते थे ‘हमारा राष्ट्र ही हमारा देवता है, उसकी सेवा ही हमारी पूजा है।’ यह कथन किसी राजनीतिक विचार का नहीं, बल्कि राष्ट्र को आध्यात्मिक साधना का विषय मानने वाली भारतीय दृष्टि का परिचायक है। संघ के शताब्दी वर्ष में विशेष रूप से ‘पंच परिवर्तन’ की अवधारणा को समाज के सामने रखा गया है।

पंच परिवर्तन केवल कार्यक्रम नहीं, बल्कि सामाजिक नवजागरण का अभियान है। इसके प्रमुख आयाम हैं- सामाजिक समरसता, समाज में जाति, वर्ग और भेदभाव की दीवारों को समाप्त करना, कुटुंब प्रबोधन, परिवार व्यवस्था को मजबूत करना तथा भारतीय पारिवारिक मूल्यों का संरक्षण। स्वदेशी स्थानीय उत्पादों, स्थानीय कौशल और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना, पर्यावरण संरक्षण, प्रकृति के साथ संतुलित जीवन तथा पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी, नागरिक कर्त्तव्य, अधिकारों के साथ-साथ कर्त्तव्यों के प्रति जागरूकता। यदि भारत का प्रत्येक नागरिक इन पांच परिवर्तनों को अपने जीवन में अपनाए, तो सामाजिक और राष्ट्रीय जीवन में व्यापक सकारात्मक परिवर्तन संभव है।

डॉ. मोहन भागवत के विचार एकता का संदेश है कि भारत की विविधता उसकी शक्ति है। उनका प्रसिद्ध कथन है कि भारत के मुसलमान भारत के ही हैं। उनका पूर्वज भी यहीं है और भविष्य भी यही है और हम सबका डीएनए एक है। यही संघ की साधना है। यही राष्ट्र की आराधना है। यही भारत के उज्ज्वल भविष्य का मार्ग है।

फिरोज बख्त अहमद