पहले बच्चों पर दादा-दादी, माता-पिता और अन्य रिश्तों का प्रभाव होता था लेकिन आज स्थितियां बदल गई हैं। आज के दौर में आप के बच्चों पर सिर्फ आप का ही प्रभाव नहीं है। बाजारवाद और टैक्नोलॉजी की दुनिया में कई अन्य शक्तियां मौजूद हैं जो आप के बच्चों को लगातार प्रभावित कर रही हैं। इनमें से एक बड़ी शक्ति है सोशल मीडिया। अब 3 साल का बच्चा मोबाइल से चिपका हुआ है, टीवी देख रहा है। अगर 2 या 3 साल का बच्चा मोबाइल फोन पर गेम खेल रहा है तो हम नहीं जानते कि उसके जीवन पर क्या प्रभाव पड़ेगा। तकनीक दो धारी तलवार की तरह है। एक तरफ दुनिया की चकाचौंध है तो दूसरी तरफ हमारी समझदारी की कमी ने समस्याएं पैदा कर दी हैं। आधुनिक होने की सोच उस समय बेकार हो जाती है जब नए-नए गैजेट्स बच्चों को बेकार बना देते हैं।
तकनीकी प्रगति से उत्पन्न चुनौतियों में से एक है बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ रहा प्रभाव। सोशल मीडिया का उपयोग करने वाले किशोर अभूतपूर्व मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य संकट का सामना कर रहे हैं। पिछले दो दशकों में किशोरों में अवसाद और आत्महत्या की दर तेजी से बढ़ी है। आज की डिजिटल दुनिया महज एक उत्पाद नहीं है जिसका हम उपयोग करते हैं, बल्कि एक वैकल्पिक आभासी स्थान है जिसमें हम तेजी से निवास कर रहे हैं- एक ऐसा वातावरण जहां सिलिकॉन वैली चाहती है कि हम (जैसा कि नए नियम में कहा गया है) जिएं, सांस लें और अपना अस्तित्व बनाए रखें।
फेसबुक द्वारा खुद को “मेटा” के रूप में पुनः ब्रांड करने और अपने वर्तमान प्लेटफॉर्म को लेकर चिंताओं को एक अधिक व्यापक और सर्वव्यापी “मेटावर्स” के प्रति उत्साह में बदलने का जनसंपर्क प्रयास विपरीत प्रभाव डाल सकता है। बच्चों के लिए सुरक्षित वातावरण प्रदान करने की हमारी समाज की प्रतिबद्धता को पूरा करने के लिए, इन नए स्थानों का उचित प्रबंधन आवश्यक है। ब्रिटेन में अब 16 साल से कम उम्र के सभी बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने घोषणा की है कि बच्चों की सुरक्षा के लिए सोशल मीडिया पर पाबंदी जरूरी है। 16 साल से कम उम्र के बच्चे अब टिक-टॉक, यू ट्यूब, इंस्ट्राग्राम, रेडिट, फेसबुक, एक्स, स्नैप चैट आदि को एक्सैस नहीं कर पाएंगे।
सबसे पहले आस्ट्रेलिया ने पहल करते हुए 16 साल से कम आयु के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाया था, उसके बाद ग्रीस ने पाबंदियां लगाईं। फ्रांस, डेनमार्क, पाॅलैंड, स्पेन और कनाडा में इस तरह के कानून बनाने की तैयारी चल रही है। ब्रिटेन में सिर्फ सोशल मीडिया ऐप्स को ही बच्चों के लिए बैन नहीं किया जा रहा, बल्कि गेमिंग ऐप्स आदि पर भी शिकंजा कसने की तैयारी है। फिलहाल गेमिंग ऐप्स को बैन नहीं किया जाएगा, लेकिन इन ऐप्स को बच्चों के लिए अनजान लोगों से चैटिंग जैसे फीचर्स हटाने पड़ेंगे। इसी तरह 18 साल से कम यूजर्स के लिए रोमांटिक और सेक्शुएल चैटबॉट की एक्सेस पर रोक लगेगी। इसके लिए सरकार मौजूदा कानूनों का सहारा लेगी और जरूरत पड़ने पर नए कानून भी बनाए जा सकते हैं।
यहां पहले ही ऑनलाइन दुनिया में बच्चों की सेफ्टी के लिए एज वैरिफिकेशन सिस्टम लागू है, लेकिन अब सोशल मीडिया को लेकर और सख्ती की जा रही है। बच्चों को सोशल मीडिया की ओर आकर्षित करना और उन्हें वहां बनाए रखना ऑनलाइन प्लेटफार्म की सर्वोच्च प्राथमिकता है। इसका कारण यह है कि अन्य सभी सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं की तरह बच्चे ग्राहक नहीं बल्कि श्रम शक्ति हैं। सोशल मीडिया प्लेटफार्मों के प्रबंधकों को कोई नैतिक आयाम या सिद्धांत नजर नहीं आता। एक शोध में यह निष्कर्ष निकाला गया है कि सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने से तीन में से एक बालिका को अपने शरीर की बनावट को लेकर परेशानी हाेती है और पांच में से एक को दूसरों से तुलना करने की समस्या होती है।
किशोर लड़के-लड़कियों में पांच में से एक लड़का खुद को कमतर महसूस करता है। सोशल मीडिया और वास्तविक जीवन के बीच की सीमा इतनी धुंधली हो गई है कि भावनाएं और सीमाएं दोनों के बीच आ जाती हैं। यह प्लेटफार्म बच्चों के यौन शोषण सहित कई तरह की घातक प्रवृत्तियों को बढ़ावा देते हैं। बच्चों द्वारा अपनी आपत्तिजनक तस्वीरें साझा करने की प्रवृत्ति लगातार बढ़ रही है। माता-पिता संकट में फंसे हुए हैं। माता-पिता के लिए बच्चों का पालन-पोषण बहुत कठिन हो चुका है। यद्यपि कई विशेषज्ञों की राय है कि पाबंदियां पूरी तरह प्रभावी नहीं होती और लोग वीपीएन समेत कई तरीकों से सोशल मीडिया प्लेटफार्म को एक्सैस कर सकते हैं। विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने से बच्चों की मैंटल हैल्थ बेहतर हुई है।
यह भी डर जताया जा रहा है कि आज के दौर में माता-पिता के पास बच्चों को समय देने की फुर्सत नहीं। इसलिए बच्चे आइसोलेशन में जा सकते हैं। अब फैसला समाज को करना है कि उन्हें बच्चों को सोशल मीडिया से कैसे बचा कर रखना है। समाज सोशल मीडिया को बच्चों के शरीर, मन और आत्मा को कुंठित करने की अनुमति नहीं दे सकता। भारत के नीति निर्माताओं के सामने भी यह विकल्प है कि अन्य देशों की तरह तकनीकी बदलाव से उत्पन्न खतरों से बच्चों की रक्षा कैसे करें। इसके लिए नीतिगत फैसले लेने होंगे। अभिभावकों को भी बच्चों की सुरक्षा को लेकर अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी।


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