भारत तीज- त्यौहारों का देश माना जाता है और लगभग हर पर्व का सम्बन्ध इस देश की कृषिमूलक अर्थ व्यवस्था से जुड़ी सांस्कृतिक विरासत से रहता है। इसके साथ ही भारत की हिन्दू संस्कृति में ईश्वर उपासना के विविध रास्तों के होने से लोगों में परस्पर सहिष्णुता के भाव के परिपक्व होने का मार्ग भी खुला रहता है। मगर भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशिष्टता यह है कि यह जीव या प्राणी मात्र में प्रेम व सद्भाव की कामना करती है और समूचे विश्व को अपना परिवार मानती है। इसी कारण भारत में दुनिया की विभिन्न संस्कृतियों के धर्मों के आगमन के बावजूद इसके सामाजिक ताने-बाने में कमजोरी नहीं आयी और यह सभी मतों के लोगों को एक-साथ लेकर चलने में सफल रहा।
इसमें भी कोई दो राय नहीं हो सकती कि भारत में लगातार छह सौ वर्षों से अधिक समय तक मुस्लिम शासन रहने के बावजूद इस देश की मूल संस्कृति अपने ही स्थान पर टिकी रही और इस्लाम धर्म के कट्टर समर्थकों के लाख प्रयासों के बावजूद हिन्दू संस्कृति के मूल मानकों पर कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ा बल्कि उल्टे इस संस्कृति के प्रभाव से ही मुस्लिम संस्कृति एक सीमा तक प्रभावित हुई और इसमें भी भारतीय रीति–रिवाजों के अनुसार कुछ परिमार्जन हुए। इनमें सर्वाधिक प्रभाव हमें पंजाब व बंगाल में देखने को मिला जहां पंजाबी व बांग्ला संस्कृतियों के मुताबिक ही इस्लामी परंपराओं में हमें बदलाव देखने को मिला अतः बहुत स्पष्ट है कि जब 16वीं सदी में भारत पर शासन कर रहे बादशाह अकबर से ईरान के शहंशाह ने यह पूछा कि वह बताएं कि वह कौन से मुसलमान हैं तो उन्होंने उत्तर दिया कि वह हिन्दुस्तानी मुसलमान हैं। बेशक इसके बाद अकबर के पोते औरंगजेब के शासन के दौरान भारत में मुस्लिम रिवाजों के चलन में कट्टरता को बढ़ावा मिला और एक समय में औरंगजेब ने होली व मोहर्रम के जुलूसों पर भी प्रतिबन्ध लगा दिया लेकिन भारतीय संस्कृति पर इस प्रकार के प्रतिबन्धों का कोई असर नहीं पड़ा और इसके लोग कालान्तर में अपने तीज-त्यौहारों को पूर्व की तरह ही सोल्लास मनाते रहे। भारत में एेसा पहली बार नहीं हो रहा है कि चैत्र नवरात्र व मीठी ईद या ईद-उल-फितर के त्यौहार एक ही काल अन्तर में पड़ रहे हैं । एेसा पहले भी कई बार हो चुका है। मुस्लिम संस्कृति में ईद का त्यौहार चांद देख कर मनाया जाता है। चांद का महत्व हिन्दू संस्कृति में भी कम नहीं है। चांद देखकर भारतीय संस्कृति के बहुत से तीज–त्यौहारों में महिलाएं अपना व्रत या उपवास खोलती हैं। इस सन्दर्भ में हमें यह देखना होगा कि इन तीज -त्यौहारों का आम जनमानस से सीधा सम्बन्ध किस प्रकार रहता है और भारतीय आर्थिक-सामाजिक सम्बन्धों पर इनका किस तरह प्रभाव पड़ता है।
मीठी ईद का त्यौहार हिन्दू व्यापारियों खास तौर पर छोटे-मोटे काम धंधे करने वाले दुकानदारों के लिए खुशी का पैगाम लेकर आता है क्योंकि इन दिनों में इनके कारोबार में खासी वृद्धि दर्ज होती है। भारत के गांव -कस्बों में रेहड़ी–पटरी लगाने वालों व खोमचा लगाने वालों की बिक्री में बेतहाशा वृद्धि होती है लेकिन यह इकतरफा नहीं है क्योंकि दीपावली के हिन्दू त्यौहार का भारत के मुस्लिम कारीगरों व दस्तकारों व कामगारों को भी बेसब्री से इन्तजार रहता है क्योंकि दिवाली के अवसर पर इनकी आमदनी में भारी इजाफा होता है। इसका एक दूसरा कारण भी है कि भारतीय समाज में आर्थिक रूप से हिन्दू व मुसलमान एक-दूसरे पर निर्भर रहते आये हैं। मसलन हिन्दुओं की ब्याह- शादी के समारोहों से लेकर उनके त्यौहारों की सजावट–बुनावट तक में मुस्लिम कलाकारों व फनकारों की शिरकत रहती है। हिन्दुओं के धार्मिक पर्वों पर मन्दिर में चढ़ने वाले बताशे के प्रशाद से लेकर देवताओं की कलात्मक पोशाके बनाने तक का काम मुस्लिम कारीगर ही करते हैं। इसी प्रकार मीठी ईद पर मशहूर हिन्दू हलवाइयों की दुकानों की मिठाई से मेहमानों का स्वागत करना मुस्लिम परिवारों में शान की बात समझी जाती है। इसी प्रकार दीपावली के पर्व पर मुस्लिम आतिशगर अपनी कलात्मक व उत्कृष्ट फनकारी से हिन्दू जनता की वाहवाही लूटते हैं । हिन्दू औरतों की सुहाग की निशानी चूड़ी बनाने से लेकर सिन्दूर के उत्पादन तक की गतिविधियों में मुस्लिम कारीगर शामिल रहते हैं। आज भी उत्तर प्रदेश से लेकर विभिन्न राज्यों में चूडि़यां बेचने वाले अधिकतर लोग मुस्लिम मनिहार ही होते हैं। लेकिन इस प्रकार की मिली-जुली अर्थव्यवस्था की जड़ें बेशक भारत में हुए धर्म परिवर्तन से भी जुड़ी हुई हैं क्योंकि इस्लाम धर्म में परिवर्तन के बावजूद लोगों के कदीमी काम–धंधे नहीं बदले। यही वजह है कि मुस्लिम धर्म में भी कहीं न कहीं जाति प्रथा का चलन हुआ। इससे यही सिद्ध होता है कि भारत के मुसलमान मूल रूप से भारतीय संस्कृति के ही मानने वाले हैं जिस तथ्य का मुस्लिम उलेमाओं को संज्ञान लेना चाहिए और भारत में हिन्दू–मुस्लिम एकता को बढ़ावा देना चाहिए क्योंकि जिस चैत्र नवरात्र की पूजा में हिन्दू जनता तल्लीन है उसमें वे देवी से यही प्रार्थना करते हैं कि हे देवी आप प्रत्येक व्यक्ति को यशवान, ज्ञानवान व धनवान बनाओ जिससे इस पृथ्वी पर सर्वत्र सुख- शान्ति व समृद्धि व्याप्त हो। परन्तु बनारस में जिस प्रकार कुछ मुस्लिम रोजादारों ने गंगा नदी में नौकासैर करते हुए अपनी इप्तारी पार्टी देकर मांसाहार की हड्डियों को गंगा जी में फेंका उससे हिन्दू जनता का आहत होना बहुत स्वाभाविक था। भारत की संस्कृति में इस प्रकार के कृत्यों के लिए कोई स्थान नहीं है क्योंकि जाड़ों के मौसम में जब उत्तर भारत में गंगा स्नान का पर्व आता है तो उसकी व्यवस्था करने में मुसलमान कामकाजी नागरिकों की विशेष भूमिका रहती है। गंगा जितनी हिन्दुओं के लिए पवित्र है उतनी ही भारतीय मुस्लिमों के लिए भी।























