छात्र आत्महत्या : नकल या भेदभाव

Summary :

आईआईटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में दाखिला लेना एक सपने जैसा होता है। आईआईटी की चकाचौंध भरी छवि के पीछे एक कड़वी सच्चाई यह भी है कि इन संस्थानों के छात्र लगातार आत्महत्याएं कर रहे हैं, जो सभी के​ लिए चिंता का बड़ा कारण है। पिछले कुछ वर्षों से जिस तरह से युवाओं में आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ी है वह समाज के लिए खतरे की घंटी है। आईआईटी बॉम्बे के छात्र साहिल की आत्महत्या मामले में यद्यपि प्रोफैसर सूर्य नारायण दूल्ला की डीनशिप निलम्बित कर दी गई है और संस्थान ने अपने पुराने बयान के लिए माफी भी मांगी है लेकिन…

आईआईटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में दाखिला लेना एक सपने जैसा होता है। आईआईटी की चकाचौंध भरी छवि के पीछे एक कड़वी सच्चाई यह भी है कि इन संस्थानों के छात्र लगातार आत्महत्याएं कर रहे हैं, जो सभी के​ लिए चिंता का बड़ा कारण है। पिछले कुछ वर्षों से जिस तरह से युवाओं में आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ी है वह समाज के लिए खतरे की घंटी है। आईआईटी बॉम्बे के छात्र साहिल की आत्महत्या मामले में यद्यपि प्रोफैसर सूर्य नारायण दूल्ला की डीनशिप निलम्बित कर दी गई है और संस्थान ने अपने पुराने बयान के लिए माफी भी मांगी है लेकिन यह सवाल बना हुआ है कि क्या साहिल की आत्महत्या जातिगत भेदभाव के कारण हुई या उसने नकल करते पकड़े जाने के बाद खुद को अपमानित महसूस करते हुए मौत के गले लगाया। दो अलग-अलग बातों को समझना जरूरी है।
आईआईटी के नियमों के हिसाब से देखिए, एग्जाम में बिना इजाजत मोबाइल इस्तेमाल करना नियमों का उल्लंघन है। दूल्ला ने उसे इंस्टीट्यूट की सीनेट-अप्रूव्ड पॉलिसी के मुताबिक रिपोर्ट किया। आईआईटी बॉम्बे की फैकल्टी फोरम खुलकर दूल्ला के साथ खड़ी है। फोरम का कहना है कि दूल्ला ने सिर्फ अपना फर्ज निभाया और इंस्टीट्यूट की प्रोसीजर फॉलो की। फोरम ने यह भी कहा कि दूल्ला की छवि खराब करना बहुत दुखद है, जबकि उन्होंने सिर्फ अपनी अकादमिक ड्यूटी निभाई। साहिल के पिता रविंद्र वाकोडे ने आरोप लगाया तथा पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है कि प्रोफेसर दूल्ला ने साहिल को तीन महीने तक जातिसूचक गालियां दीं और धमकाया कि उसे झूठे केस में फंसा दिया जाएगा। इस शिकायत के आधार पर पुलिस ने दूल्ला के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने और एससी/एसटी एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज कर दी। सीधी बात यह है कि अगर सिर्फ एग्जाम की घटना देखें तो दूल्ला ने नियम के मुताबिक काम किया। अगर पिता के आरोप सही हैं तो यह सिर्फ कर्त्तव्य नहीं, अपराध है।
संस्थान की फैकल्टी निलम्बित डीन दूल्ला के समर्थन में प्रदर्शन कर रही है। कारण जो भी हो सच्चाई सामने आनी चाहिए। 2005 से 2024 के बीच आईआईटी में 127 आत्महत्याएं दर्ज की गईं। जिसमें लगभग 50 प्रतिशत छात्र पिछड़े वर्ग से बताए जाते हैं। आईआईटी मद्रास में सबसे अधिक 26 आत्महत्याएं दर्ज की गईं। आईआईटी कानपुर में 18, आईआईटी खड़गपुर में 14, आईआईटी गोवाहाटी में 13, आईआईटी बॉम्बे आैर आईआईटी दिल्ली में 10-10 आत्महत्या के मामले सामने आए। साहिल की मौत आईआईटी बॉम्बे में इस साल की तीसरी आत्महत्या है। जब भी कोई युवा आत्महत्या करता है तो इसके पीछे समाज के मनोवैज्ञानिक पहलू भी उजागर होते हैं। लगता है कि आत्महत्या जैसे खौफनाक कदम उठाने से पहले कोई भावनात्मक तूफान आया होगा।
युवा उम्र में आत्महत्या के लिए कई चीजें एक साथ जिम्मेदार होती हैं। अधिकांश मामलों में सुसाइड करने वालों के दिमाग में लंबे समय से कुछ न कुछ जमा हो रहा होता है जो लास्ट में ट्रिगर प्वाइंट की तरह काम करता है। यह ठीक इसी तरह है जैसे किसी गिलास में धीरे-धीरे पानी भर रहा हो और एक दिन पानी पूरी तरह से भर कर बाहर निकल गया हो। कभी-कभी यह दिमाग में अचानक भी ख्याल आ सकता है। वास्तव में यंग एज में व्यक्ति अपनी पहचान और आत्मसम्मान को बहुत हद तक दूसरों के नजरिये से देखता है। वह यह देखता है कि हमसे आगे कितने लोग हैं। ऐसे में एकेडमिक सफलता को वह अपनी पहचान बना लेता है। फिर जब किसी सार्वजनिक स्थिति में जैसे कि परीक्षा में पकड़े जाना, नकल का आरोप लगना या शिक्षक द्वारा डांटना जैसी घटनाएं अचानक होती हैं तो वह इससे अपमान महसूस करने लगता है। ऐसे लोगों का दिमाग इसे साधारण असफलता नहीं मानता। उसे लगता है कि यह गंभीर सामाजिक और शर्मनाक स्थिति है। व्यक्ति को लगता है कि उसकी पूरी छवि, करियर और सम्मान एक झटके में खत्म हो गया है और फिर वह आत्महत्या जैसी प्रवृति की ओर बढ़ जाता है।
इसमें कोई संदेह नहीं कि उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव की घटनाएं कम नहीं हो रही हैं। एक तथ्य यह भी है कि आज के बच्चे सहनशीलता से दूर हो रहे हैं और वे मामूली तनाव भी नहीं झेल पाते। उच्च शिक्षा संस्थान कोई सबक सीखने को तैयार नहीं है। बहुत ज्यादा कड़ी प्रतियो​िगता, माता-पिता और समाज का बहुत ज्यादा दबाव, पढ़ाई में पिछड़ने का डर, अकेलापन और भेदभाव महसूस करना यह सभी आपस में जुड़े हुए मुद्दे हैं जिन पर तुरन्त ध्यान देेने की जरूरत है। परीक्षा के दौर में जो तनाव छात्र झेलते हैं उसे समाज कभी अनुभव नहीं करता। सभी छात्र दबाव झेलने को तैयार नहीं होते और वह टूट जाते हैं। आईआईटी खड़गपुर ने छात्रों को इमोशनल सपोर्ट देने के ​िलए कैम्पस मदर्स का प्रस्ताव रखा था। छात्रों के लिए फीमेल मैंटर नियुक्त करने का प्रस्ताव था। आईआईटी संस्थानों के भीतर अनुुशासन बनाए रखने की व्यवस्था, मैंटल हैल्थ सपोर्ट आैर जातिगत भेदभाव की ​िशकायतों को सुनने वाले सिस्टम में सुधार करना होगा। केवल एक प्रोफैसर को निल​म्बित करने मात्र से आत्महत्याएं नहीं रुकेंगी। यह सभी दुखद घटनाएं संस्थागत ​विफलता को उजागर करती हैं। जब तक संस्थागत सुधार नहीं किया जाता तब तक कुछ नहीं हो सकता। आईआईटी में परामर्श, मार्गदर्शन आैर कल्याण कार्यक्रम चलाए जाने की जरूरत है।

Aditya Chopra

Aditya Chopra is well known for his phenomenal viral articles.