स्वतन्त्र भारत की संवैधानिक प्रशासनिक व्यवस्था राजनैतिक दलों के संरचनात्मक ढांचे पर टिकी हुई है जिसके चलते विभिन्न राजनैतिक दल हर पांच साल में होने वाले चुनावों में विजयी होकर बहुमत के आधार पर सरकारों का गठन करते हैं और फिर शासन व्यवस्था संविधान के अनुसार चलाते हैं। राजनैतिक दल चुनाव अपने-अपने घोषित चुनाव घोषणापत्र के आधार पर ही जीतते हैं परन्तु इन घोषणापत्रों का संविधान के अनुरूप होना आवश्यक होता है और खुद राजनैतिक दलों को भी भारतीय संविधान की अन्तर्निहित शर्तों के अनुसार ही अपनी संरचना खड़ी करनी पड़ती है और आन्तरिक लोकतन्त्र के प्रति समर्पित होना पड़ता है।
राजनैतिक दलों की ये सारी व्यवस्थाएं देखने का अधिकार संविधान में चुनाव आयोग को इस प्रकार दिया गया है कि वह किसी भी दल की प्रशासनिक स्थिति से निरपेक्ष रहते हुए अन्य सभी अधिकृत दलों के साथ एक समान व्यवहार करे और पूर्ण न्याय प्रदान करे। इसके लिए ही संविधान में चुनाव आयोग को राजनैतिक दलों के मामले में कुछ न्यायिक अधिकार भी दिये गये हैं जिससे समय-समय पर इन दलों के बीच आन्तरिक व बाह्य विवाद पैदा होने पर उनका निपटारा न्यायिक ढंग से किया जा सके। भारत के आजाद होने के बाद राजनैतिक दलों के आन्तरिक झगड़े कोई नई बात नहीं है। इस देश के स्वतन्त्र होने के बाद केवल कम्युनिस्ट पार्टी व जनसंघ को छोड़ कर शेष अन्य सभी दलों का जन्म प्रायः देश को स्वतन्त्रता दिलाने वाली कांग्रेस पार्टी के गर्भ से ही हुआ जिनमें पहला नम्बर इस पार्टी के समाजवादी गुट का आता है जिसमें डा. राम मनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण , आचार्य कृपलानी व आचार्य नरेन्द्र देव जैसे समर्पित गांधीवादी नेता शामिल थे।
आजादी के बाद समाजवादी पार्टी बनी जिसके बाद में दो भाग हुए संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (डा. राम मनोहर लोहिया)व प्रजा समाजवादी पार्टी (आचार्य नरेन्द्र देव) तथा आचार्य कृपलानी की अपनी प्रजा मजदूर पार्टी। इन सभी पार्टियों को चुनाव आयोग ने अलग- अलग नाम देकर अलग-अलग चुनाव निशान दिये। बाद में 1964 में कम्युनिस्ट पार्टी का भी विघटन हुआ और इससे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी व कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) बनीं। चुनाव आयोग ने इन दोनों पार्टियों को भी अलग- अलग चुनाव निशान आवंटित किये। परन्तु स्वतन्त्र भारत के इतिहास का अभी तक का सबसे बड़ा पार्टी विघटन 1969 में अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का हुआ जो उस समय देश में सत्ता में थी और प्रधानमन्त्री पद पर इसकी नेता स्व. श्रीमती इन्दिरा गांधी विराजमान थीं। इन्दिरा जी ने इस वर्ष हुए राष्ट्रपति चुनाव के मुद्दे पर अपनी पार्टी के घोषित उम्मीदवार स्व. नीलम संजीव रेड्डी के स्थान पर स्वतन्त्र रूप से खड़े हुए उपराष्ट्रपति स्व. वी.वी. गिरी की उम्मीदवारी का समर्थन किया जिससे खफा होकर कांग्रेस पार्टी की कार्य समिति ने इन्दिरा जी को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से ही निरस्त कर दिया। इससे कांग्रेस पार्टी के नेता धरातल से लेकर संसद तक में दो भागों में बंट गये और दोनों गुट स्वयं को असली कांग्रेस बताने लगे तथा पार्टी की सम्पत्ति से लेकर चुनाव चिन्ह आदि पर अपना हक जताने लगे। तब यह विवाद मुख्य चुनाव आयुक्त स्व. एस.पी. सेनवर्मा के यहां पहुंचा और उन्होंने दोनों पक्षों के तर्कों को सुनने के बाद कांग्रेस पार्टी के पुश्तैनी चुनाव चिन्ह ‘दो बैलों की जोड़ी’ को जब्त करते हुए इसे जाम कर दिया और दोनों गुटों को अपना-अपना नया नाम चुनने का विकल्प देते हुए अपनी मनपसन्द का चुनाव चिन्ह चुनने की भी इजाजत दी।
इन्दिरा जी के गुट की कांग्रेस के अध्यक्ष तब श्री आर. संजीवैया थे अतः उनके गुट की कांग्रेस को चुनाव आयोग ने कांग्रेस (आर) नाम दिया और कांग्रेस कार्यसमिति के गुट वाली कांग्रेस को कांग्रेस (संगठन) का नाम दिया। उस समय इस गुट को सिंडीकेट कहा जाता था। इसी प्रकार चुनाव चिन्हों का भी आवंटन किया गया। कांग्रेस (आर) को ‘गाय -बछड़े’ का चुनाव निशान दिया गया और कांग्रेस (संगठन) को ‘चरखा कातती महिला’ का चुनाव निशान आवंटित किया गया। उस समय बोलचाल की भाषा में भारत की आम जनता ने इन दोनों कांग्रेस का नामकरण अपने लिहाज से नई कांग्रेस व पुरानी कांग्रेस में किया। परन्तु मुख्य चुनाव आयुक्त श्री सेनवर्मा ने उस समय के कांग्रेस पार्टी के मुख्यालय 7- जन्तर मन्तर रोड को कांग्रेस (संगठन) को ही दिया। इसी प्रकार पार्टी की पुरानी सम्पत्ति भी अधिसंख्य रूप से इसी पार्टी के हिस्से में आयी। परन्तु कालान्तर में पुरानी कांग्रेस सिमटती गई और नई कांग्रेस ही मूल कांग्रेस के रूप में विकसित होती गई।
यह सब इन्दिरा जी के व्यक्तित्व का ही चमत्कार था। इसके बाद पुनः 1977 में इमरजेंसी के बाद इन्दिरा जी की असली कांग्रेस का विघटन हुआ क्योंकि कांग्रेस कार्यसमिति ने तब भी 1969 की तर्ज पर इन्दिरा जी को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निरस्त कर दिया था। इन्दिरा जी ने अपने गुट की कांग्रेस को ही असली कांग्रेस बताया और मामला फिर चुनाव आयोग गया और चुनाव आयोग ने भी 1969 की तर्ज पर ही अपना फैसला देते हुए इन्दिरा गुट की कांग्रेस को कांग्रेस (इन्दिरा) और दूसरे कार्य समिति के गुट की कांग्रेस को कांग्रेस (अर्स) नाम दिया। चुनाव आयोग ने गाय-बछड़े के चुनाव चिन्ह को जाम कर दिया और इसके स्थान पर कांग्रेस (इन्दिरा) को ‘हाथ का पंजा’ चुनाव चिन्ह आवंटित किया। कांग्रेस अर्स को क्या चुनाव चिन्ह मिला था, इसका स्मरण मुझे नहीं है क्योंकि कालान्तर में इस पार्टी का अस्तित्व ही समाप्त हो गया और इस गुट के सभी नेता एक-एक करके कांग्रेस (इ) में शामिल होते गये।
वर्तमान में प. बंगाल की प्रमुख राजनैतिक पार्टी अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस के बंटवारे का मुद्दा मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त श्री ज्ञानेश कुमार की अदालत में है। उनके सामने एक तरफ बंटवारे की ये आदर्श नजीरे हैं और दूसरी तरफ पिछले सालों में महाराष्ट्र की क्षेत्रीय पार्टी शिवसेना के बंटवारे की नजीर भी है। इस पार्टी के अधिसंख्य विधायकों द्वारा अपना अलग गुट गठित करने पर तत्कालीन चुनाव आयोग ने उसे ही असली शिवसेना के मूल रूप माना और नाम सहित चुनाव चिन्ह भी उसे ही आवंटित किया। इसी प्रकार श्री शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस के बंटवारा होने पर भी इस नजीर का पालन किया गया। चुनाव आयोग के इन फैसलों को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी जा चुकी है। मगर लगता है कि सुश्री ममता बनर्जी द्वारा स्थापित तृणमूल कांग्रेस के बंटवारे के मामले में मुख्य चुनाव आयुक्त 1969 व 1977 की नजीर पर चलना चाहते हैं जिसकी वजह से उन्होंने इस पार्टी के मूल चुनाव चिन्ह ‘फूलों की पत्ती’ को जब्त करते हुए जाम कर दिया है और दोनों गुटों से नये नामों व चुनाव चिन्हों का विकल्प मांगा है।
तृणमूल कांग्रेस का विघटन इसी वर्ष के मई महीने में राज्य विधानसभा चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद तब हुआ जब इस पार्टी के विजयी विधायकों के बड़े गुट ने ममता बनर्जी से विद्रोह करते हुए विधायक ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में अलग गुट बना कर खुद के असली तृणमूल कांग्रेस होने का दावा किया और इसके आधार पर विधानसभा में नेता विपक्ष का औहदा भी ले लिया। इसके बाद ममता दी की पार्टी के 29 सांसदों में से 20 ने भी विद्रोह करके अपना अलग गुट बना लिया और एक अनाम समझे जाने वाले राजनैतिक दल का खुद को सदस्य बना लिया। ऋतब्रत बनर्जी गुट ने अपनी तृणमूल कांग्रेस का अध्यक्ष श्री अरूप राय को बना दिया और चुनाव आयोग से मांग की कि वह उनकी पार्टी को ही असली तृणमूल कांग्रेस के रूप में मान्यता दे।
प.बंगाल विधानसभा की दो सीटों पर आगामी 6 अक्टूबर को उपचुनाव होने हैं जिसके सन्दर्भ में इस पार्टी के दोनों गुटों की पहचान तय होना लाजिमी है। अतः चुनाव आयोग को समय रहते ही अपना फैसला देना होगा। उपचुनावों को देखते हुए यह अन्तरिम फैसला भी हो सकता है जिससे मतदान सुगमता पूर्वक हो सके परन्तु अन्तिम फैसला करते हुए चुनाव आयोग को पूरी निष्पक्षता बरतते हुए ही निर्णय देना होगा जिससे राजनैतिक दलों के बंटवारे के मामले में न्याय होने की ध्वनि गूंज सके। इसलिए चुनाव आयोग का आज का अंतरिम फैसला केवल एक अस्थाई व्यवस्था माना जाना चाहिए। क्योंकि इससे पार्टी का नाम और चुनाव निशान दोनों ही जब्त कर लिये गए हैं।
चुनाव आयोग और पार्टियों का बंटवारा
Summary :
स्वतन्त्र भारत की संवैधानिक प्रशासनिक व्यवस्था राजनैतिक दलों के संरचनात्मक ढांचे पर टिकी हुई है जिसके चलते विभिन्न राजनैतिक दल हर पांच साल में होने वाले चुनावों में विजयी होकर बहुमत के आधार पर सरकारों का गठन करते हैं और फिर शासन व्यवस्था संविधान के अनुसार चलाते हैं। राजनैतिक दल चुनाव अपने-अपने घोषित चुनाव घोषणापत्र के आधार पर ही जीतते हैं परन्तु इन घोषणापत्रों का संविधान के अनुरूप होना आवश्यक होता है और खुद राजनैतिक दलों को भी भारतीय संविधान की अन्तर्निहित शर्तों के अनुसार ही अपनी संरचना खड़ी करनी पड़ती है और आन्तरिक लोकतन्त्र के प्रति समर्पित होना पड़ता…


Download Android App
Download iOS App



