दिग्विजय सिंह का ‘दिशा ज्ञान’

Summary :

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता श्री दिग्विजय सिंह ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ व भारतीय जनता पार्टी के संगठन की प्रशंसा करके यथार्थ को ही उजागर किया है और उस ऐतिहासिक सच को सामने लाने का कार्य किया है जिसकी गवाही भारत की राजनीति देती रही है। संघ व पूर्व में जनसंघ की संगठन क्षमता की प्रशंसा इसके प्रबल विरोधी भी करते रहे हैं। इसका प्रमाण यह है कि स्वतन्त्र भारत में समाजवाद के सच्चे प्रणेता स्व. डाॅ. राम मनोहर लोहिया ने पचास के दशक में ही कह दिया था कि यदि उनके पास राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के जैसे कार्यकर्ताओं…

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता श्री दिग्विजय सिंह ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ व भारतीय जनता पार्टी के संगठन की प्रशंसा करके यथार्थ को ही उजागर किया है और उस ऐतिहासिक सच को सामने लाने का कार्य किया है जिसकी गवाही भारत की राजनीति देती रही है। संघ व पूर्व में जनसंघ की संगठन क्षमता की प्रशंसा इसके प्रबल विरोधी भी करते रहे हैं। इसका प्रमाण यह है कि स्वतन्त्र भारत में समाजवाद के सच्चे प्रणेता स्व. डाॅ. राम मनोहर लोहिया ने पचास के दशक में ही कह दिया था कि यदि उनके पास राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के जैसे कार्यकर्ताओं का संगठन हो तो वह भारत में दो वर्ष के भीतर ही समाजवाद ला सकते हैं। डाॅ. लोहिया व संघ के विचार हालांकि परस्पर विरोधी थे मगर संगठन क्षमता के मामले में उन्होंने संघ की खुलकर तारीफ की थी।

इसका कारण यह था कि संघ में कार्यकर्ताओं को समर्पण व वैचारिक प्रतिबद्धता का प्रशिक्षण दिया जाता है। संघ को बने एक सौ वर्ष से ऊपर हो चुके हैं मगर बुरे से बुरे दिनों में भी इस संगठन के कार्यकर्ताओं ने अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता नहीं छोड़ी। बेशक राजनीतिक तौर पर संघ भारतीय जनता पार्टी के लिए एक वैचारिक विश्वविद्यालय की तरह कार्य करता है क्योंकि इसी संगठन से निकल कर पार्टी के अधिसंख्य नेता आते हैं और अपने विचारों पर दृढ़ रहते हैं। वर्तमान प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी भी संघ के स्वयं सेवक व प्रचारक रहे हैं और उनमें संघ के संस्कार भरे हुए हैं। स्वयं अटल बिहारी वाजपेयी भी बहुत उदार किस्म के नेता माने जाते थे मगर उन्होंने भी स्वयं को संघ का स्वयं सेवक बताया था।

अतः श्री दिग्विजय सिंह का संघ व भाजपा के संगठन की तारीफ करना कोई अजूबा नहीं समझा जाना चाहिए लेकिन वर्तमान राजनीतिक सन्दर्भों में कांग्रेस पार्टी को श्री सिंह का बयान अखर रहा है क्योंकि पार्टी लगातार चुनावों में नीचे जा रही है और जनता के सही मुद्दों को ढंग से पकड़ नहीं पा रही है । श्री सिंह इसका कारण यह मानते हैं कि कांग्रेस संगठनात्मक तौर पर निर्जीव हो चुकी है और इसका हर फैसला दिल्ली से ही होता है। मगर इसकी वजह भी ऐतिहासिक है। दरअसल स्वतन्त्र भारत के कांग्रेस के इतिहास में स्व. इदिरा गांधी सबसे अधिक शक्तिशाली नेता रहीं मगर उन्होंने कांग्रेस संगठन की जमीनी जड़ों को कभी मजबूत करने की कोशिश नहीं की। उनके बारे में कहा जाता था कि वह राजनीति में कोई पेड़ रोपती थीं और जब वह बड़ा होकर फलने-फूलने को आता था तो उसे गमले में लगा देती थीं। इसकी वजह से उनके रहते कांग्रेस पार्टी के भीतर आम जनता के बीच से आये नेतृत्व का सृजन ही नहीं हो पाया।

उनके रहते कांग्रेस पार्टी का दो बार विभाजन हुआ और दोनों ही बार उन्होंने सिद्ध किया कि वह जिस तरफ भी होंगी कांग्रेस पार्टी उसी तरफ होगी। पहला विभाजन 1969 में होने पर इन्दिरा जी अपनी कांग्रेस में अकेली रह गई थीं। उनके साथ स्व. बाबू जगजीवन राम व फखरुद्दीन अली अहमद रह गये थे और बाकी सभी बड़े नेता कांग्रेस के दूसरे सिंडीकेट गुट में चले गये थे जिनमें इन्दिरा गांधी को प्रधानमन्त्री बनाने वाले स्व. कामराज भी थे। मगर जब 1971 में उन्होंने लोकसभा के मध्यावधि चुनाव कराये तो देश की जनता ने इन्दिरा गांधी का साथ दिया और उन्होंने अपनी कांग्रेस के संगठन को मनमर्जी के आधार पर चलाया। तदर्थ आधार पर प्रदेश कांग्रेस कमेटियां चलने लगीं और नेताओं का चुनाव इन्दिरा जी की इच्छा पर होने लगा।

इससे कांग्रेस संगठन जमीनी तौर पर कमजोर होने लगा और पार्टी में यह कहावत प्रचिलित हो गई कि जो व्यक्ति दिल्ली में गणेश परिक्रमा करके नजरों में चढ़ जायेगा वही नेता होगा। इसके बाद 1975 में इमरजेंसी लगने के बाद इसके उठने पर जब 1977 में लोकसभा चुनाव हुए तो इन्दिरा जी अपना लोकसभा चुनाव हार गईं और तदोपरान्त कांग्रेस पार्टी के उन नेताओं के समूह ने ही उन्हें कांग्रेस से निकाल दिया जिन्होंने कभी ‘इन्दिरा इज इंडिया’ का नारा इमरजेंसी के दौरान दिया था। वह नेता स्व. देवकान्त बरुआ थे। जिस कांग्रेस कार्य समिति ने 1977 में इन्दिरा गांधी को पार्टी से निकाला उनमें उस समय के सभी दिग्गज कांग्रेसी नेता शामिल थे। इनमें सरदार स्वर्ण सिंह से लेकर ब्रह्मानन्द रेड्डी व डाॅ. कर्ण सिंह तक शामिल थे। मगर इस बार भी इन्दिरा जी ने सिद्ध किया कि वह जिस तरफ भी खड़ी हो जायेगी उसी तरफ कांग्रेस पार्टी चली आयेगी।

अतः 1980 के लोकसभा चुनावों में उनकी बनाई हुई कांग्रेस ने अपार सफलता हासिल की लेकिन कांग्रेस संगठन को चलाने का उनका तरीका नहीं बदला जिसका परिणाम यह हुआ कि कांग्रेस एक परिवार की पार्टी बनकर रह गई। हालांकि समाजवादी चिन्तक व नेता डाॅ. राम मनोहर लोहिया ने ही 1959 में कांग्रेस को इस तरफ चेता दिया था। इस वर्ष पं. जवाहर लाल नेहरू ने अपनी सुपुत्री इन्दिरा गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष बना दिया था। इस पर डाॅ. लोहिया ने कहा था कि नेहरू ने यह क्या सितम कर डाला लोकतन्त्र में वंशवाद व परिवारवाद का बीज रोप डाला। इतिहास गवाह है कि डाॅ. लोहिया की यह चेतावनी आज की राजनीति में सच साबित हो रही है क्योंकि पूरे देश में परिवारवादी क्षेत्रीय दलों की बेल फैली हुई है। श्री दिग्विजय सिंह ने इसी तरफ अपनी चिन्ता व्यक्त की है क्योंकि कांग्रेस के पास अब कोई इन्दिरा गांधी नहीं है। उन्होंने कांग्रेस पार्टी के संगठनात्मक विकेन्द्रीकरण की बात की है।

बेशक उनका इशारा राहुल गांधी की तरफ है क्योंकि उनके नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी लगातार चुनाव पर चुनाव हारती जा रही है। देश में कहीं यह अवधारणा पैठ बना चुकी है कि राहुल गांधी अर्ध समयकालीन (पार्ट टाइम) राजनीतिज्ञ हैं। बिहार के चुनावों के समय हमने देखा कि किस प्रकार जब इस प्रदेश में चुनाव प्रचार का बाजार गर्म था तो वह कोलम्बिया चले गये थे। राजनीति कभी भी अर्ध कालिक कार्य नहीं हो सकता क्योंकि यह जनता की सतत् सेवा का क्षेत्र है। दिग्विजय सिंह ने अपनी पार्टी की नीतियों की आलोचना करके भी कोई नया काम नहीं किया है क्योंकि 140 साल पुरानी इस पार्टी की यह परंपरा रही है। इनके तर्कों को यथार्थवादी नजरिये से देखने की जरूरत है। इसी में कांग्रेस का कल्याण निहित है।

Aditya Chopra

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