कई बार मीडिया व सामाजिक-परिवेश से भी एक महत्वपूर्ण चूक हो जाती है। पिछले दिनों वेनेजुएला में एक ऐसी पंजाबी विदुषी एवं लेखिका का निधन हुआ जिसकी एक समृद्ध पारिवारिक पृष्ठभूमि थी, मगर उसके निधन के बाद भी उसको यही संदर्भ में याद नहीं किया गया। उसका जि़क्र कई कारणों से बेहद जरूरी था। वह प्रख्यात पंजाबी लेखक गुरबख्श सिंह प्रीतलड़ी की सबसे छोटी व शायद सर्वाधिक लाडली बेटी थी। उसे हिंदी, पंजाबी, रूसी, अंग्रेजी, स्पेनिश और कुछ हद तक उर्दू भाषा एवं लिपि पर अधिकार एवं पूरा ज्ञान था। वर्ष 1965 से वह वेनेजुएला के मेरिडा विश्वविद्यालय में अंग्रेजी साहित्य पढ़ाती रही थीं। उसकी अनेक रचनाएं, अंग्रेजी साहित्यिक पत्रिका ‘दी इंप्रिंट’ और ‘दी एनकाउंटर’ में प्रकाशित भी हुई थी। मगर अपने जीवनकाल में वह प्राय: अपनी उपलब्धियों, रचनाओं और जिंदगी की अनेक महत्वपूर्ण घटनाओं के बारे में खामोश रहीं।
एक बार भारत-यात्रा के मध्य उनसे इस खामोशी का कारण पूछा तो उसका जवाब था, मैं किसी ‘गॉसिप’ का आधार नहीं बनना चाहती। अगर मेरे कुछ संंबंध थे तो वे भी निजी थे। वे संबंध मेरे जीवन की एक सम्पदा हैं। मुझे अब तक समझ में नहीं आता कि मैं उन्हें सार्वजनिक क्यों करूं?
-वह रूस की पैट्रिस कुमुम्बा पीपुल्स फ्रेंडशिप यूनिवर्सिटी के पहले बैच (1960) की छात्रा थी, विश्वविद्यालय में उन्हें वेनेजुएला के भौतिकी के छात्र राल जीसस एस्टेवेज से प्यार हो गया। 1965 में वह वेनेजुएला चली गई और जीवनभर वहीं अंग्रेजी साहित्य पढ़ाती रहीं, उसके दो बेटे और एक बेटी है।
वह चार लिपियां (संस्कृत, अरबी, सिरिलिक और लैटिन) बखूबी लिखना जानती थी, उसे पंजाबी, रूसी, अंग्रेजी और स्पेनिश का बेहतरीन ज्ञान था। वर्ष 2016 में एक फिल्म आई थी, उड़ता पंजाब। पंजाब में फैली ड्रग्स की समस्या पर आधारित इस फिल्म में काफी बवाल हुआ था। सेंसर बोर्ड ने कहा काट-छांट करो, फिल्म में प्रोड्यूसर अनुराग कश्यप अड़ गए। आखिर फिल्म रिलीज हुई। इसी फिल्म का एक गाना बेहद पॉपुलर हुआ, ‘इक कुड़ी जिदा नाम मोहब्बत’ यह गाना आलिया भट्ट पर फिल्माया गया।
जैसा कि आमतौर पर होता है। कई लोगों को ये गाना इसी फिल्म की वजह से याद है लेकिन असल में इसका ‘ओरिजिनल वर्जन’ काफी समय से लोगों का पसंदीदा रहा है। इसे लिखा था शिव कुमार बटालवी ने। शिव कुमार बटालवी की कई कविताएं पंजाब के लोक साहित्य का अहम हिस्सा रही हैं।
प्रीतलड़ी परिवार की ही सुकीरत आनंद के अनुसार -अनु और शिव प्रीत नगर में मिले थे। तब तक अनु विधवा हो चुकी थी। दोनों अच्छे दोस्त बन गए थे। जब अनु ने गुरबख्श सिंह को बताया कि वो शिव से शादी नहीं करना चाहती। इस पर उन्होंने सलाह दी कि अनु को पीछे हट जाना चाहिए। कहीं उसकी करीबी से शिव को गलत संकेत न मिल जाए। उसके बाद अनुसूया मॉस्को चली गई और अपने बैचमेट राउल से मिलीं, प्रेम हुआ, शादी कर ली।
गुरबख्श सिंह ‘प्रीतलड़ी’ के बारे में कुछ आलोचकों को शिकायत थी कि ‘इश्क जिन्हां दी हड्डीं रचिया’ सरीखी कृति के लेखक गुरबख्श सिंह का सामना जब अपनी ही बेटी की कथित प्रेम-कथा से हुआ तो उनका रवैया पूरी तरह बदल गया। अनुसूया ने उस संक्षिप्त भेंट में यह भी बताया था कि वह जब भारत आती थीं तो शिव के परिवार से भी मिलती थीं। आखिरी बार जब देश आई थीं तब भी मिलने गई थी। पूनम के मुताबिक उन्होंने बताया था कि एक सितारे का नाम उसने शिव रख छोड़ा है जब तक उनसे बन पड़ा, उन्होंने उस तारे को देखना नहीं छोड़ा।
अनुसूया के दो बेटे और एक बेटी हैं। उसके बेटे सुमितो एस्तेवेज ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए लिखा- वो चार भाषाओं में लिख सकती थी- संस्कृत, अरबी, सिरिलिक, लैटिन। चार भाषाएं बखूबी बोलती थी- पंजाबी, रशियन, अंग्रेजी और स्पैनिश और कई दूसरी भाषाएं समझ लेती थीं। बहुत कम ही मैं किसी ऐसी शख्सियत से मिला हूं जो उनके जैसा सुसंस्कृत हो। पंद्रह साल की उम्र में मैंने नीन की डायरी पढ़ ली थी। मुझे हेनरी मिलर और इजोडोरा डंकन के स्कार्फ की कहानी मालूम थी। जब मैं सत्रह वर्ष का था तब यूरोप के बेहतरीन म्यूजियम देखने गया था। तब मुझे वहां मौजूद पेंटिंग्स के बारे में पहले से ही सब कुछ रटा हुआ था क्योंकि मेरी मां ने मुझे इन सबके बारे में बताया था।
अनुसूया की कहानी शिव कुमार बटालवी के अधूरे प्रेम की कहानी नहीं है। अनुसूया की कहानी एक ऐसी लड़की की कहानी है जिसने जिंदगी को अपनी शर्तों पर जिया। अपना प्रेम खुद चुना, अपने फैसले खुद लिए और उन सभी को स्वीकार करने के पीछे कभी नहीं हटी। अनुसूया सिंह ने यह भी स्वीकार किया था कि उसके पिता श्री गुरबख्श सिंह ‘प्रीतलड़ी’ ने स्वयं ही उससे पूछा था कि ‘क्या वह शिव से शादी करना चाहती है?, तो उसका उत्तर था- मैंने उससे वैवाहिक जिंदगी के बारे में कभी नहीं सोचा। उसकी कविताओं की प्रशंसक होने का अर्थ यह नहीं था।’ बहरहाल अनुसूया सिंह की गरिमापूर्ण जिंदगी और शिव-परिवार की अपनी निजी जिंदगी से लगाव रखने वालों के लिए बेहतर यही होगा कि वे उन दोनों की निजी जिंदगी को अनावश्यक विवादों में घसीटने से यथासंभव परहेज़ रखें।
याद है डॉ. अनुसूया सिंह प्रीतलड़ी ?
Summary :
कई बार मीडिया व सामाजिक-परिवेश से भी एक महत्वपूर्ण चूक हो जाती है। पिछले दिनों वेनेजुएला में एक ऐसी पंजाबी विदुषी एवं लेखिका का निधन हुआ जिसकी एक समृद्ध पारिवारिक पृष्ठभूमि थी, मगर उसके निधन के बाद भी उसको यही संदर्भ में याद नहीं किया गया। उसका जि़क्र कई कारणों से बेहद जरूरी था। वह प्रख्यात पंजाबी लेखक गुरबख्श सिंह प्रीतलड़ी की सबसे छोटी व शायद सर्वाधिक लाडली बेटी थी। उसे हिंदी, पंजाबी, रूसी, अंग्रेजी, स्पेनिश और कुछ हद तक उर्दू भाषा एवं लिपि पर अधिकार एवं पूरा ज्ञान था। वर्ष 1965 से वह वेनेजुएला के मेरिडा विश्वविद्यालय में अंग्रेजी…


Download Android App
Download iOS App



