‘ड्रामा’ शब्द शायद इस माह की शुरूआत में शीतकालीन सत्र शुरू होने के बाद से संसद की केंद्रीय थीम रहा है, इस शब्द का प्रयोग भाजपा और कांग्रेस दोनों की ओर से काफी उदारता से किया गया।
शुरूआत के लिए, इस शीतकालीन सत्र के अपने पारंपरिक पूर्व-सत्र संबोधन में प्रधानमंत्री ने कहा था: “ड्रामा करने के लिए बहुत सी जगहे हैं। जिन्हें ड्रामा करना है, वे कहीं और करें। यहां डिलीवरी होनी चाहिए, ड्रामा नहीं।”
प्रधानमंत्री पर पलटवार करते हुए कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि प्रधानमंत्री ने संसद के समक्ष मौजूद मुख्य मुद्दों पर बात करने के बजाय एक बार फिर “ड्रामेबाजी” की है। उन्होंने कहा कि वास्तविकता यह है कि सरकार पिछले 11 वर्षों से लगातार “संसदीय शिष्टाचार और संसदीय प्रणाली को रौंदती रही है।” खड़गे ने कहा, “भाजपा को अब इस ध्यान-भटकाने वाले ड्रामे को खत्म कर देना चाहिए और जनता के वास्तविक मुद्दों पर संसद में बहस करनी चाहिए।”
एक अन्य स्तर पर, एक कुत्ते को लेकर भी काफी ड्रामा देखने को मिला। कांग्रेस सांसद रेनुका चौधरी जब एक कुत्ते को लेकर संसद पहुंचीं, तो एक भाजपा सदस्य ने “उचित दस्तावेज” न होने पर आपत्ति जताई। बेतुकापन किस स्तर तक पहुंचा है या इसमें कौन अधिक खराब दिखा-यह आकलन करना कठिन है, लेकिन एक बात स्पष्ट है: संसद और उसके लिए चुने गए प्रतिनिधि एक नए निचले स्तर पर पहुंच गए हैं, लेकिन इस कुत्ते-कांड का संदर्भ समझना आवश्यक है, जिस तरह यह घटनाक्रम सामने आया।
हंगामा तब शुरू हुआ जब चौधरी की कार एक कुत्ते के साथ संसद भवन परिसर में दािखल हुई। चौधरी के अनुसार, उन्होंने एक आवारा कुत्ते को उठाया था और उसे पशु-चिकित्सक के पास ले जा रही थीं। एक कहानी यह है कि उनका चालक उन्हें संसद में उतारने के बाद कुत्ते को डॉक्टर के पास ले जाने वाला था। दूसरी कहानी यह है कि उन्होंने संसद आते समय रास्ते में एक आवारा कुत्ते को बचाया और उसे सीधे पशु-चिकित्सक के पास ले जा रही थीं। एक और कहानी यह भी है कि कार में मौजूद कुत्ता चौधरी का अपना पालतू था और उसे महज नाटकीयता के लिए संसद लाया गया और नाटकीयता आगे भी जारी रही। जब सत्तारूढ़ पार्टी ने चौधरी पर ड्रामा करने का आरोप लगाया, तो उन्होंने कहा कि सरकार को “जानवर पसंद नहीं हैं।” यहीं नहीं रुकीं, उन्होंने कहा: “इनकी समस्या क्या है? यह इतना छोटा है, क्या यह काटेगा? संसद में बैठे लोग काटते हैं, कुत्ते नहीं।” उन्होंने यह भी कहा कि सड़क से कुत्ता बचाने के खिलाफ कोई कानून नहीं है। “वाह सरकार,” उन्होंने ट्वीट किया।
दरअसल, जब उन्हें विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव की धमकी दी गई, तो उन्होंने मीडिया से बातचीत के दौरान कुत्ते की आवाज की नकल करते हुए कहा: “भौं, भौं।” मामला छोड़ने के मूड में न होते हुए भाजपा ने कहा कि चौधरी संसद का मजाक बना रही हैं और “तमाशा” कर रही हैं, और “दोषी” सांसद के खिलाफ कार्रवाई की मांग की।
2018 की ओर लौटें। वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में चौधरी की तेज हंसी का मजाक उड़ाया था। राज्यसभा में, मोदी की एक टिप्पणी पर रेनुका जोर से हंस पड़ी थीं, जिसके बाद सभापति ने संयम बरतने को कहा। इस पर प्रधानमंत्री ने कहा कि उन्हें रोका न जाए: “रामायण सीरियल के बाद, हमें इस तरह की हंसी सुनने का सौभाग्य आज ही मिला है।” भले ही प्रधानमंत्री ने रामायण के किसी चरित्र का नाम नहीं लिया, लेकिन यह स्पष्ट था कि संदर्भ रावण की बहन शूर्पणखा का था, लेकिन चौधरी कोई असहाय नायिका नहीं हैं। उन्होंने भी नाम लेकर कटाक्ष किए हैं। अकाली दल की हरसिमरत बादल, जो उस समय केंद्रीय मंत्री थीं, को याद करें। कुछ वर्ष पहले, आरोप है कि चौधरी ने उन्हें “कचरा” कहा था। उन्होंने यह भी कहा था कि वे “भाड़ में जाएं”, और बादल की टिप्पणी को “पॉलिटिकल ड्रामा” बताकर खारिज कर दिया था।
चाहे वह कुत्ते का प्रकरण हो, शूर्पणखा-संदर्भ हो या “कचरा” टिप्पणी मूल तथ्य यही है कि संसद की मर्यादा और गरिमा गिर चुकी है, बल्कि कहना चाहिए कि गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हुई है, और इसका दोष किसी एक पार्टी या एक सांसद पर नहीं डाला जा सकता, यह सामूहिक विफलता है।
उतना ही अभूतपूर्व यह भी है कि सदन के भीतर नेता-विशेष के समर्थन में नारे लगाए जाते हैं। इसे समझें तो पता चलता है कि भाजपा शासन में जब भी प्रधानमंत्री लोकसभा में प्रवेश करते हैं, “मोदी, मोदी” के नारे गूंज उठते हैं। आश्चर्य की बात है कि इन्हें रोकने के लिए सभापति की ओर से कोई निर्देश या हस्तक्षेप नहीं होता। हालात ऐसे दिखाई देते हैं कि यदि संभव होता तो सभापति भी इस मोदी समर्थक नारेबाजी में शामिल हो जाते।
मूल विषयों पर आया जाए तो सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ने उस संस्था का मजाक बना दिया है जिसे कभी अत्यंत सम्मान प्राप्त था।
यह एक संवैधानिक पवित्र स्थान था जहां मुद्दों पर चर्चा, वाद-विवाद और मतभेद होना स्वाभाविक माना जाता था। आज यह हंगामों और उसके बाद होने वाले स्थगनों तक सीमित रह गया है। अक्सर पूरा सत्र ही इस कारण व्यर्थ चला जाता है क्योंकि विपक्षी सांसद सदन को चलने नहीं देना चाहते। स्थिति यहां तक पहुंच चुकी है कि जहां पहले यह माना जाता था कि संसद चलेगी, आज सुचारू कार्यवाही एक दिवास्वप्न बन गई है।
आंकड़े इसकी पुष्टि करते हैं।
उदाहरण के लिए, 21 जुलाई से 21 अगस्त 2025 के बीच हुए मानसून सत्र में निर्धारित समय का दो-तिहाई हिस्सा बाधाओं में नष्ट हुआ। इसका प्रभाव प्रश्नकाल पर भी पड़ा, जिसमें लोकसभा केवल 23% और राज्यसभा मात्र 6% निर्धारित समय तक ही काम कर सकी। कई विधेयक भी बिना चर्चा के पारित किए गए।
एकमात्र सकारात्मक पहलू बजट सत्र रहा, जिसमें लोकसभा की उत्पादकता 111% और राज्यसभा की 112% रही-और प्रश्नकाल भी अपेक्षाकृत बेहतर चला। 2024 के बजट सत्र में भी यही रूझान दिखा था, लेकिन ये हाल के वर्षों के अव्यवस्थित व्यवहार से अलग कुछ दुर्लभ अपवाद भर हैं।
उत्पादकता में गिरावट एक संरचनात्मक और बहु-सरकारी समस्या है और यह केवल भाजपा तक सीमित नहीं है। अतीत में भी उदाहरण मिलते हैं: यूपीए-2 के दौरान 15वीं लोकसभा का प्रदर्शन सबसे खराब था। निर्धारित समय का 40 प्रतिशत से अधिक हिस्सा नष्ट हुआ, जबकि 13वीं और 14वीं लोकसभाओं की उत्पादकता क्रमशः 91% और 87% थी।
संसद चलाने की लागत अत्यंत भारी है : अनुमान के अनुसार प्रति मिनट 2.5 लाख रुपये, जो प्रतिदिन लगभग 6 करोड़ रुपये और प्रतिवर्ष 600 करोड़ रुपये बैठते हैं। तो इसका भुगतान कौन करता है? और क्या उन सांसदों को, जिन्हें जनता के मुद्दे उठाने के लिए चुना गया है, जवाबदेह नहीं ठहराया जाना चाहिए? क्या उन्हें व्यर्थ गए श्रम-घंटों के लिए दंडित नहीं किया जाना चाहिए?
एक उदाहरण भाजपा के बैजयंत ‘जय’ पांडा ने प्रस्तुत किया था, जिन्होंने एक दशक पहले कहा था कि वे शीतकालीन सत्र में “नष्ट/व्यर्थ हुए समय” के अनुपात में अपना वेतन लौटाएंगे, क्योंकि वह सत्र 2014 के बाद के दस सत्रों में सबसे कम उत्पादक था।
यह एक तर्कसंगत और आवश्यक कदम है: हर वह श्रम-घंटा जो बाधाओं में नष्ट हो, उसके लिए सांसदों को दंडित किया जाए अर्थात उनकी वेतन से उतनी कटौती हो। जब वेतन कटेगा, तब उन्हें अनुशासन का अर्थ समझ आएगा, दूसरे शब्दों में, वेतन कटौती का मतलब होगा काम के घंटों की पुनर्स्थापना।
कुत्ते का ड्रामा
Summary :
‘ड्रामा’ शब्द शायद इस माह की शुरूआत में शीतकालीन सत्र शुरू होने के बाद से संसद की केंद्रीय थीम रहा है, इस शब्द का प्रयोग भाजपा और कांग्रेस दोनों की ओर से काफी उदारता से किया गया। शुरूआत के लिए, इस शीतकालीन सत्र के अपने पारंपरिक पूर्व-सत्र संबोधन में प्रधानमंत्री ने कहा था: “ड्रामा करने के लिए बहुत सी जगहे हैं। जिन्हें ड्रामा करना है, वे कहीं और करें। यहां डिलीवरी होनी चाहिए, ड्रामा नहीं।” प्रधानमंत्री पर पलटवार करते हुए कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि प्रधानमंत्री ने संसद के समक्ष मौजूद मुख्य मुद्दों…


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