विपक्ष के कड़े विरोध के चलते विदेशी अंशदान विनियामक अधिनियम संशोधन बिल (एफसीआरए) संयुक्त संसदीय समिति के विचारार्थ भेज दिया गया है। मानसून सत्र हंगामे के चलते पूरी तरह से धुल गया है। यद्यपि संसद ने कुछ बिल बिना चर्चा के पास कर दिए लेकिन एफसीआरए बिल पर पक्ष-विपक्ष में सहमति नहीं बन पाई। देश में विदेशी फंडिंग पर निगरानी कोई नई घटना नहीं है। एफसीआरए पहली बार 1976 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के समय लागू किया गया था। बाद में मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने इस कानून को आैर सख्त बनाया था। हर देश की सरकारें यह सुनिश्चित करती हैं कि विदेशी धन का इस्तेमाल केवल उसके घोषित उद्देश्यों के लिए किया जाए न कि किसी राजनीतिक एजेंडे को बढ़ावा देने के लिए। सरकार को पता होना चाहिए कि कौन किसे और किस मकसद से फंड दे रहा है ताकि विदेशी धन का गलत इस्तेमाल न हो। भारत में विदेशी फंड के दुरुपयोग की कहानियां किसी से छिपी हुई नहीं हैं। सत्ता के खिलाफ दुष्प्रचार अभियान चलाने के लिए यहां की संस्थाओं और व्यक्तिगत रूप से लॉबिंग करने वाले िगरोहों से जुड़े लोगों को विदेशी फंडिंग का इस्तेमाल देश में कई वर्षों से धर्मांतरण के लिए किया जा रहा है।
अरब देशों और अन्य इस्लामिक देशों से मदरसों और मुस्लिम संगठनों को खूब पैसा मिलता रहा है और पश्चिमी देशों द्वारा चर्च को भारी फंड मिलता रहा है जिसका इस्तेमाल लोगों को इसाई धर्म में लाने का षड्यंत्र चल रहा है। कौन नहीं जानता कि कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र की स्थापना के विरोध में एनजीओ का आंदोलन विदेशी फंडिंग से ही चलाया गया। मोदी सरकार के शासनकाल में विदेशी फंड प्राप्त करने वाले गैर सरकारी संगठनों पर समय-समय पर कड़ी कार्रवाई की गई। उनके एफसीआरए पंजीकरण रद्द किए गए। मोदी सरकार द्वारा एफसीआरए बिल लाए जाने का उद्देश्य इतना है कि अब एनजीओ को स्पष्ट करना होगा कि विदेशी धन का उपयोग किस उद्देश्य के लिए होगा और वह किन क्षेत्रों के लिए काम करेंगे। सवाल देश की सुरक्षा, संप्रभुता और लोकतांत्रिक ढांचे का भी है। भारत कोई ‘बनाना’ रिपब्लिकन तो है नहीं। इसलिए निगरानी तंत्र होना बहुत जरूरी है। अब सवाल यह है कि बिल को लेकर विवाद क्या है। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और दक्षिण भारत के राजनीतिक दल इस बिल को अल्पसंख्यक विरोधी करार दे रहे हैं। मोदी सरकार ने विदेशी चंदा कानून में पहले ही कई संशोधन पारित करवाकर नियमों को सख्त किया है लेकिन प्रस्तावित बिल इन नियमों से कहीं आगे बढ़कर प्रस्ताव करता है। जिसमें विदेशी फंडिंग से बनी संपत्तियों पर कब्जा कर लिया जाएगा, भले ही सर्टिफिकेट खत्म हो गया हो। बिल के तहत दान पाने वाली संस्था का रजिस्ट्रेशन न केवल तब खत्म हो सकता है जब सरकार उसे रद्द कर दे, बल्कि तब भी जब रिन्यूअल से मना कर दिया जाए, अप्लाई न किया जाए, या पुराना सर्टिफिकेट खत्म होने से पहले मंजूरी न दी जाए। जैसे ही ऐसा होगा, ऑर्गनाइज़ेशन के विदेशी फंड और उनसे जो बनाया गया था वह अपने आप सरकार की तय अथॉरिटी को चला जाएगा। प्रॉपर्टी तभी वापस आएगी जब ऑर्गनाइज़ेशन सरकार द्वारा तय समय के अंदर दोबारा रजिस्टर कराएगा, ऐसा न करने पर वह हमेशा के लिए चली जाएगी। बिल के मुताबिक, विदेशी पैसे से बनी कोई बिल्डिंग, जिसका कुछ हिस्सा ही विदेशी पैसे से बना है, उसे पूरी तरह से अपने कब्ज़े में ले लिया जाएगा। फिर ऑर्गनाइज़ेशन को वह हिस्सा वापस पाने के लिए अप्लाई करना होगा जिसकी पेमेंट विदेशी पैसे से नहीं की गई है। बिल डिस्ट्रिक्ट जज के पास अपील करने की इजाज़त देता है, लेकिन सिर्फ़ इस बात के खिलाफ कि अथॉरिटी बाद में प्रॉपर्टी के साथ क्या करती है। रिन्यू करने से मना करने पर अपील नहीं की जा सकती और मना करने से पहले ऑर्गनाइज़ेशन को सुनवाई का हक़ नहीं होगा। असल में, क्योंकि अथॉरिटी सेंटर के निर्देशों पर काम करती है, इसलिए सेंटर लाइसेंस वापस लेने, प्रॉपर्टी पर कब्ज़ा करने और फिर उस पर कब्ज़ा करने वाली बॉडी को निर्देश देने के लिए अस्पष्ट कारणों का इस्तेमाल कर सकता है।
इन प्रस्तावित प्रावधानों का अल्पसंख्यक धार्मिक संस्थाएं विरोध कर रही हैं। केवल मिजोरम, नगालैंड में इसाई धार्मिक संगठन सड़कों पर उतर आए हैं क्योंकि विदेशी फंड से ही उनके स्कूल-कालेज और अस्पताल चलाए जाते हैं। तमिलनाडु विधानसभा में तो सर्वसम्मति से इस विधेयक को वापिस लेने का प्रस्ताव भी पारित कर दिया है। अमेरिका के सांसद और संगठन भी इस बिल का विरोध कर रहे हैं। भारत में 52 हजार से अधिक एनजीओ रजिस्टर्ड हैं लेकिन सक्रिय 15 हजार के लगभग हैं। 22,498 एनजीओ के लाइसेंस रद्द कर दिए गए हैं। विरोध का बिन्दु यह भी है कि कुछ हिन्दू धार्मिक संगठनों को एफसीआरए लाइसेंस दे दिया गया है। अब जबकि विधेयक को जेपीसी के पास भेज दिया गया है तो इस पर आम सहमति कायम करने के प्रयास किए जाने चाहिए। हालांकि आम सहमति की उम्मीद कम है। विधेयक में ऐसे प्रावधान किए जाने चाहिए कि अल्पसंख्यक धार्मिक संगठनों को अपनी बात रखने का मौका मिले और उन्हें अपील करने का अधिकार मिले ताकि कानून के दुरुपयोग की संभावनाएं न के बराबर हो। एनडीए सरकार के समर्थक नगालैंड के मुख्यमंत्री नेक्यूरियो, मिजोरम के मुख्यमंत्री लाल दुहोमा से लेकर मेघालय के मुख्यमंत्री के.के. संगमा ने भी एफसीआरए के कड़े प्रावधानों को लेकर अपनी चिंता से केन्द्र को अवगत कराया है। देखना होगा कि जेपीसी में आम सहमति कैसे कायम होती है।
एफसीआरए पर विवाद
Summary :
विपक्ष के कड़े विरोध के चलते विदेशी अंशदान विनियामक अधिनियम संशोधन बिल (एफसीआरए) संयुक्त संसदीय समिति के विचारार्थ भेज दिया गया है। मानसून सत्र हंगामे के चलते पूरी तरह से धुल गया है। यद्यपि संसद ने कुछ बिल बिना चर्चा के पास कर दिए लेकिन एफसीआरए बिल पर पक्ष-विपक्ष में सहमति नहीं बन पाई। देश में विदेशी फंडिंग पर निगरानी कोई नई घटना नहीं है। एफसीआरए पहली बार 1976 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के समय लागू किया गया था। बाद में मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने इस कानून को आैर सख्त बनाया था। हर देश की…


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