जब तक संसद और राजनीतिक दलों के बीच इस मुद्दे पर स्पष्ट रूप से मोर्चेबंदी नहीं हुई थी, तब तक एफसीआर, शब्द आम आदमी के लिए लगभग अनजाना था। इसके लाभार्थियों को छोड़ दें तो बहुत कम लोग जानते थे कि आखिर यह पूरा मामला क्या है। विदेशी फंडिंग शब्द जरूर जाना-पहचाना था लेकिन उसके दूरगामी प्रभावों से अधिकांश लोग अनभिज्ञ थे। कम से कम तब तक जब तक संसद ने इस मुद्दे को अपने एजेंडे में नहीं लिया। इस विधेयक के क्यों और कैसे पर आने से पहले जरूरी है कि इसके प्रावधानों को समझा जाए, इसकी बारीकियों को रेखांकित किया जाए और यह भी परखा जाए कि आखिर विपक्ष इसका दांत-नाखून से विरोध क्यों कर रहा है। एक स्तर पर यह तर्क दिया जा सकता है कि विरोध करना विपक्ष का काम है और प्रस्ताव रखना सरकार का लेकिन क्या मामला सिर्फ इतना ही है? या फिर विपक्ष के पास सरकार के दावों को चुनौती देने के लिए पर्याप्त ठोस तर्क भी हैं लेकिन पहले बात विधेयक की और उस मकसद की, जिसे लेकर इसे लाया गया है।
एफसीआर यानी विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक का उद्देश्य विदेशी अंशदान (विनियमन अधिनियम) 2010 में संशोधन करना है। यह कानून तय करता है कि व्यक्ति, संगठन और संस्थाएं विदेशों से मिलने वाले चंदे या आर्थिक योगदान को किस तरह प्राप्त और उपयोग कर सकते हैं। इस संशोधन के जरिए सरकार एक नामित प्राधिकरण के माध्यम से विदेशी फंड से निर्मित परिसंपत्तियों और विदेशी योगदान पर अपना नियंत्रण बढ़ाना चाहती है। प्रस्तावित प्राधिकरण को उस स्थिति में विदेशी योगदान और उससे बनाई गई परिसंपत्तियों के प्रबंधन को अपने हाथ में लेने का अधिकार होगाए जब किसी संगठन का एफसीआर, पंजीकरण रद्द हो जाए, संगठन स्वयं अपना पंजीकरण वापस कर दे या पंजीकरण का नवीनीकरण नहीं होने के कारण वह निष्प्रभावी हो जाए।
मौजूदा व्यवस्था में एफसीआर, गैर-सरकारी संगठनों, ट्रस्टों, सोसायटियों, शैक्षणिक संस्थानों और धार्मिक संगठनों को मिलने वाले विदेशी चंदे को विनियमित करता है। प्रक्रियागत रूप से विदेशी फंड प्राप्त करने वाले किसी भी संगठन के लिए गृह मंत्रालय से एफसीआर, पंजीकरण प्राप्त करना अनिवार्य है। इस पंजीकरण का हर पांच वर्ष में नवीनीकरण कराना होता है। ऐसा न होने पर संबंधित संगठन कानूनी रूप से विदेशी योगदान प्राप्त नहीं कर सकता। फिलहाल, करीब 16,000 संगठन विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम यानी एफसीआर के तहत पंजीकृत हैं और इन्हें हर साल लगभग 22,000 करोड़ रुपये का विदेशी योगदान प्राप्त होता है।
विधेयक की पृष्ठभूमि में दिए गए आंकड़ों के अनुसार 15 जुलाई 2026 तक भारत में एफसीआर के तहत 14,449 पंजीकरण सक्रिय थे। इसी अवधि में 22,498 पंजीकरण रद्द किए जा चुके थे, जबकि 15,212 की अवधि समाप्त हो चुकी थी। वर्ष 2019 से 2022 के बीच एफसीआर के तहत पंजीकृत संगठनों को कुल 55,741 करोड़ रुपये का विदेशी योगदान प्राप्त हुआ। विधेयक में एफसीआर, पंजीकरण के नवीनीकरण के लिए न्यूनतम उपयोग की सीमा तय करने का भी प्रस्ताव है। इसके तहत पिछले दो वित्तीय वर्षों के दौरान 10 लाख रुपये से कम का विदेशी योगदान प्राप्त करने या उसका उपयोग करने वाले संगठन अपने एफसीआर, पंजीकरण के नवीनीकरण के पात्र नहीं माने जा सकते। विधेयक में किए गए अन्य प्रमुख प्रस्तावों में विदेशी योगदान को दूसरे संगठनों को हस्तांतरित करने पर प्रतिबंध, स्वीकृत विदेशी फंड प्राप्त करने और उसका उपयोग करने की समय-सीमा तथा इसके साथ लाए गए एफसीआर, 2026 के तहत अतिरिक्त खुलासा संबंधी प्रावधान शामिल हैं।
उन्होंने चिंतित संगठनों को आश्वस्त करने की कोशिश करते हुए कहा कि देश के कल्याण के लिए वास्तविक और ईमानदारी से काम करने वाली संस्थाओं के काम में कोई बाधा नहीं डाली जाएगी। दरअसल यहां ‘जेनुइन’ यानी वास्तविक और विश्वसनीय शब्द सबसे महत्वपूर्ण है। सरकार के लिए विदेशी फंड के स्रोत और उसके इस्तेमाल अथवा दुरुपयोग की जांच करना निश्चित रूप से जायज है। लेकिन इस अधिकार का इस्तेमाल निर्धारित दायरे से आगे जाने की आशंका को भी पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता।
दूसरी ओर इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि विदेशी फंड के देश में आने और उसके इस्तेमाल को लेकर जवाबदेही और निगरानी अनिवार्य है। फिलहाल स्थिति कुछ हद तक ‘फ्री फॉर ऑल’ जैसी दिखाई देती है, अलग-अलग देशों से पैसा आता है और कई बार उसका इस्तेमाल उन उद्देश्यों से इतर होता है, जिनके लिए वह स्वीकृत किया गया था। भले ही इसके पीछे कोई ठोस और निर्णायक प्रमाण उपलब्ध न हो लेकिन ऐसे पर्याप्त संकेत और आरोप जरूर सामने आते रहे हैं कि किसान आंदोलन से लेकर नागरिकता संशोधन अधिनियम विरोधी प्रदर्शनों तक, कई आंदोलनों को भारत के बाहर से और राष्ट्रीय हितों के प्रतिकूल माने जाने वाले समूहों या ताकतों से आर्थिक समर्थन मिला। हालिया छात्र प्रदर्शनों को भी विदेशी ताकतों के समर्थन से जोड़ने के आरोप लगाए गए हैं।
ऐसे में यह तर्क समझ में आता है कि सरकार को इस तरह के अनियंत्रित विदेशी फंड प्रवाह को विनियमित करने के लिए हस्तक्षेप करना चाहिए लेकिन इससे खराब स्थिति और क्या हो सकती है कि अमेरिकी सांसद रिले मूर की ओर से इसकी आलोचना की जाए और इसे ‘ईसाइयों पर स्पष्ट हमला’ बताया जाए। उन्होंने चेतावनी दी कि यह मामला भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय विवाद का रूप ले सकता है। उनका तर्क है कि प्रस्तावित कानून सरकार को चर्चों और धार्मिक चैरिटी संस्थाओं का नियंत्रण अपने हाथ में लेने की अनुमति दे सकता है। सरकार ने भले ही इसे भारत का ‘आंतरिक मामला’ बताते हुए अमेरिकी आलोचना को खारिज कर दिया हो लेकिन भारत के कानूनों या उनके प्रस्तावित संशोधनों पर अमेरिका की ओर से की जाने वाली ऐसी टिप्पणी निश्चित रूप से सवालों के घेरे में आती है।
विपक्ष के इस तर्क के बरक्स सरकार का पक्ष यह है कि कार्यपालिका को दी जाने वाली अत्यधिक शक्तियां गैर-सरकारी संगठनों और धर्मार्थ संस्थाओं के कामकाज पर प्रतिकूल असर डाल सकती हैं। कांग्रेस ने इस विधेयक को अल्पसंख्यकों के लिए ‘खतरा’ बताते हुए आरोप लगाया कि यह ईसाई संस्थानों को डराने और नियंत्रित करने की कोशिश है।
इन आशंकाओं की आवाज खास तौर पर केरल में मुखर रही है, जहां कई ईसाई संगठन स्कूलों, अस्पतालों और कल्याणकारी संस्थानों का संचालन करते हैं और जिन्हें ऐतिहासिक रूप से विदेशी फंडिंग मिलती रही है। इन तर्कों में कुछ सच्चाई हो सकती है लेकिन दूसरी तरफ विदेशी फंड के दुरुपयोग और उसके मूल उद्देश्य से हटकर इस्तेमाल के पर्याप्त उदाहरण भी सामने आते रहे हैं। ऐसे फंड का इस्तेमाल भारत-विरोधी विमर्श और भावनाओं को हवा देने के लिए किए जाने की आशंकाओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।इसलिए इन तमाम तर्कों और प्रतितर्कों के बीच जो बात सबसे ऊपर उभरकर आती है, वह है राष्ट्रीय हित।
सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए ‘देश पहले’ की और सबसे ऊपर होना चाहिए भारत का हित। सरकार के लिए यह एक फिसलन भरी जमीन जरूर हो सकती है कि नए कानून के अस्तित्व में आने पर उसके प्रावधानों के दुरुपयोग की आशंका से कैसे निपटा जाए लेकिन जहां तक विदेशी फंड के जरिए ऐसे आंदोलनों को बढ़ावा देने पर रोक लगाने का सवाल हैए जिनका उद्देश्य ‘भारत आगे’ के राष्ट्रीय आख्यान को पटरी से उतारना हो, वहां सरकार का पक्ष निश्चित रूप से मजबूत दिखाई देता है।
विदेशी फंडिंग पर कसेगा शिकंजा !
Summary :
जब तक संसद और राजनीतिक दलों के बीच इस मुद्दे पर स्पष्ट रूप से मोर्चेबंदी नहीं हुई थी, तब तक एफसीआर, शब्द आम आदमी के लिए लगभग अनजाना था। इसके लाभार्थियों को छोड़ दें तो बहुत कम लोग जानते थे कि आखिर यह पूरा मामला क्या है। विदेशी फंडिंग शब्द जरूर जाना-पहचाना था लेकिन उसके दूरगामी प्रभावों से अधिकांश लोग अनभिज्ञ थे। कम से कम तब तक जब तक संसद ने इस मुद्दे को अपने एजेंडे में नहीं लिया। इस विधेयक के क्यों और कैसे पर आने से पहले जरूरी है कि इसके प्रावधानों को समझा जाए, इसकी बारीकियों को…


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