जब केंद्र सरकार ने मणिपुर में दो उपमुख्यमंत्रियों के साथ एक मुख्यमंत्री के नाम की घोषणा की, तो उसने यह अनुमान नहीं लगाया था कि विरोध भड़क उठेगा और वह भी उसी समुदाय की ओर से जिसे शांत करने की कोशिश की गई थी: कुकी-ज़ो।
मई 2023 में मणिपुर हिंसा की चपेट में था। बहुसंख्यक समुदाय मैतेई और कुकी-ज़ो जनजातियों के बीच संघर्ष छिड़ गया था। यह टकराव उस न्यायालय आदेश के बाद हुआ जिसमें मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की सिफारिश की गई थी। कुकी-ज़ो समुदाय ने इसका विरोध करते हुए कहा कि इससे पहले से प्रभावशाली मैतेई और मजबूत होंगे, सरकार पर उनकी पकड़ बढ़ेगी और उनकी जमीनें भी छीनी जा सकती हैं। मुख्यतः मैतेई और कुकी समुदायों के बीच भड़की यह हिंसा धार्मिक नहीं, बल्कि जातीय आधार पर थी। यौन हिंसा, विस्थापन, हत्याएं और बदले की कार्रवाई आम हो गईं।
बेशक अल्पकालिक उपायों के तौर पर मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह के इस्तीफ़े के बाद राष्ट्रपति शासन लागू किया गया, लेकिन इन्हें स्थायी शांति से पहले के अंतरिम कदम ही माना गया, यदि स्थायी शांति संभव हो भी सके। 2023 से मणिपुर अभूतपूर्व हिंसा का गवाह रहा है, जहां दोनों समुदाय एक-दूसरे के खिलाफ़ संघर्षरत हैं। तीन वर्षों से अधिक समय से राज्य में विस्थापन, हत्याएं, दुष्कर्म और जातीय हिंसा का सिलसिला जारी है।
इस वर्ष फरवरी में केंद्र ने नया शासन स्थापित करने की पहल की। 4 फरवरी को राष्ट्रपति शासन समाप्त होने के बाद युमनाम खेमचंद सिंह ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, लेकिन इससे हिंसा थमी नहीं; उलटे हालात फिर भड़क उठे। नई सरकार के शपथ लेते ही कुछ घंटों में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए, सड़कें जाम कर दी गईं और बाजार व दफ्तर बंद कर दिए गए। मार्शल आर्ट ताइक्वांडो में ब्लैक बेल्ट नए मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण के दौरान ही उनके एक उपमुख्यमंत्री पर हमले की खबर सामने आई। भारतीय जनता पार्टी के पुराने नेता रहे सिंह विधानसभा अध्यक्ष और राज्य मंत्री भी रह चुके हैं। वे बहुसंख्यक मैतेई समुदाय से आते हैं, जिसका कुकी-ज़ो अल्पसंख्यकों से तीखा टकराव रहा है।
अतीत में सरकार पर घटनाक्रम को अनदेखा करने और लोगों को मरने के लिए छोड़ देने जैसे आरोप लगते रहे हैं। इसी महीने जब सरकार ने सिंह को संकटग्रस्त राज्य की कमान सौंपी, तो इसे कई लोगों ने महज़ दिखावा बताया, आम धारणा यही रही कि “दिखने में अच्छा, पर भीतर से खोखला।”
संतुलन साधने की कोशिश में सरकार ने सिंह के साथ दो उपमुख्यमंत्री नियुक्त किए, एक नागा और एक कुकी-ज़ो समुदाय से। परिस्थितियों में इसे “सकारात्मक कदम” माना गया और उम्मीद जताई गई कि कम से कम शांति की झलक लौटेगी, लेकिन यह संभावना दूर होती दिख रही है। कुकी-ज़ो समुदाय के कुछ वर्गों ने अपने ही विधायकों के सरकार में शामिल होने की निंदा की है। उनका आरोप है कि “अपने ही लोग दुश्मन यानी मैतेई पक्ष में चले गए,” जिसे वे विश्वासघात मानते हैं।
इसी व्यापक आक्रोश के बीच उपमुख्यमंत्री नेमचा किपगेन निशाने पर हैं। राज्य की पहली महिला उपमुख्यमंत्री किपगेन को सुरक्षा कारणों से दिल्ली से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए शपथ लेनी पड़ी।
कुकी-ज़ो समुदाय अपने लंबे समय से लंबित अलग प्रशासन की मांग पूरी होने तक विरोध जारी रखने के संकेत दे चुका है। साथ ही, वे उन विधायकों के बहिष्कार पर भी अड़े हैं जिन्होंने सरकार का हिस्सा बनने का फैसला किया है। इसी बीच उपमुख्यमंत्री नेमचा किपगेन ने “संवाद, उपचार और समावेशी शासन” का आह्वान करते हुए खाई पाटने की अपील की, लेकिन यह गुहार कम से कम कुकी समुदाय के एक हिस्से तक तो बेअसर ही रही। कुकी-ज़ो समुदाय के प्रमुख नेता और मुख्य प्रवक्ता गिंज़ा वुआलजोंग ने कहा, “जिन्होंने हमें धोखा दिया, उन पर हम कैसे भरोसा करें?” स्थिति को “शांति से बहुत दूर” बताते हुए उन्होंने कहा कि जब तक कुकी और मैतेई समुदायों के बीच कोई समझौता नहीं होता, हालात सामान्य नहीं हो सकते। उनके अनुसार, “सरकार हमें नई सरकार स्वीकार करने के लिए मजबूर करती दिख रही है, चाहे हमें पसंद हो या नहीं।” वुआलजोंग और कई अन्य नेताओं ने माना कि शांति बंदूक की नोक पर नहीं, बल्कि बातचीत से संभव है। उन्होंने बताया कि केंद्रीय गृह मंत्रालय के साथ वार्ता जारी है, पर “मेज” मैतेई नेतृत्व वाली राज्य सरकार के साथ नहीं हो सकती। उनका तर्क है कि अतीत में ऐसे प्रयास विफल रहे हैं, इसलिए अब उनसे बातचीत नहीं की जाएगी।
कुकी-ज़ो समुदाय अपने विधायकों के सरकार में शामिल होने को जनता की इच्छा के विरुद्ध कदम बताते हुए खुद को “ठगा हुआ” महसूस कर रहा है। आरोप है कि कुकी-ज़ो परिषद और विधायकों के बीच बैठकों में यह तय हुआ था कि जब तक राज्य या केंद्र उनकी मांगें नहीं मानते, वे सरकार से दूर रहेंगे। ऐसे में जो विधायक सरकार में शामिल हुए, उन्हें “बहुमत की भावना के खिलाफ़” व्यक्तिगत निर्णय लेने वाला माना जा रहा है।
इस भावना के साथ मैतेई नेतृत्व वाली सरकार के प्रति अविश्वास जुड़ जाए तो टकराव और गहरा जाता है। समुदाय के लोग याद दिलाते हैं कि एन. बीरेन सिंह के शासनकाल में कुकी-ज़ो लोगों की जानें गईं, वे घरों से बेदखल हुए और उनकी संपत्तियाँ नष्ट हुईं। ऐसे में उसी सत्ता तंत्र से उम्मीद रखना उन्हें निरर्थक लगता है।
वे नई व्यवस्था को “पुरानी बोतल में नई शराब” करार देते हुए कहते हैं कि मुख्यमंत्री बदलने से कुछ नहीं बदला, क्योंकि जिनसे उनका संघर्ष है, मैतेई समुदाय, वे वही हैं। उनके अनुसार विवाद किसी एक व्यक्ति से नहीं, बल्कि पूरे समुदाय से है।
यह भी स्वीकार करना होगा कि केंद्र सरकार ने सकारात्मक कदम उठाने की कोशिश की है। मुख्यमंत्री के साथ एक नागा और एक कुकी नेता को उपमुख्यमंत्री बनाकर उसने सभी पक्षों तक पहुंचने और घाव भरने का प्रयास किया है। ऐसे में कुकी समुदाय द्वारा तीखी आपत्ति जताना न तो पूरी तरह उचित कहा जा सकता है और न ही न्यायसंगत। दरअसल यह केवल शुरुआत है और प्रक्रिया अभी प्रारंभिक चरण में है। इसलिए इस समय धैर्य और संयम की आवश्यकता है, न कि “मेरी मर्जी या कुछ नहीं” जैसा रुख, जो फिलहाल कुछ वर्ग अपनाते दिखाई दे रहे हैं। ऐसा रवैया न केवल मणिपुर राज्य के हितों और संभावित शांति पहलों को नुकसान पहुँचा सकता है, बल्कि उन रचनात्मक प्रयासों को भी पटरी से उतार सकता है जो हालात को शांत करने और जख्मों पर मरहम लगाने के लिए किए जा रहे हैं।
इसके साथ ही यह आशंका भी नकारा नहीं जा सकती कि अशांति को भड़काने और वित्तपोषित करने में बाहरी तत्वों की भूमिका हो।
फिर भड़की आग
Summary :
जब केंद्र सरकार ने मणिपुर में दो उपमुख्यमंत्रियों के साथ एक मुख्यमंत्री के नाम की घोषणा की, तो उसने यह अनुमान नहीं लगाया था कि विरोध भड़क उठेगा और वह भी उसी समुदाय की ओर से जिसे शांत करने की कोशिश की गई थी: कुकी-ज़ो। मई 2023 में मणिपुर हिंसा की चपेट में था। बहुसंख्यक समुदाय मैतेई और कुकी-ज़ो जनजातियों के बीच संघर्ष छिड़ गया था। यह टकराव उस न्यायालय आदेश के बाद हुआ जिसमें मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की सिफारिश की गई थी। कुकी-ज़ो समुदाय ने इसका विरोध करते हुए कहा कि इससे पहले से…


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