पिछले कुछ सप्ताह में कई अलग जगहों से स्टूडेंट्स द्वारा आत्महत्या करने के दुखदाई समाचार पढ़ने को मिले हैं। जिस उम्र में बच्चों के खेलने-कूदने के दिन हैं, कुछ मुक्ति पाने के लिए अपनी जान देने के लिए भी तैयार हैं। दिल्ली के एक प्रतिष्ठित स्कूल की दसवीं क्लास के 16 वर्षीय लड़के ने एक मैट्रो स्टेशन से छलांग लगाकर जान दे दी और यह नोट छोड़ गया, “सॉरी मम्मी, आपका इतनी बार दिल तोड़ा, अब लास्ट बार तोड़ूंगा”। इस एक वाक्य के पीछे बच्चे की कितनी मजबूरी छिपी थी? वह बच्चा क्या-क्या बर्दाश्त करता रहा होगा कि यह आख़िरी कदम उठा लिया? क्या कहीं से कोई सहारा नहीं मिला? कोई समझाने वाला नहीं? स्कूल में भी नहीं, और जैसा आजकल नई शिकायत मिल रही हैं, घर में भी नहीं?
यह बहुत बड़ी सामाजिक समस्या बन रही है। आंकड़े बहुत तकलीफ़देह हैं। 2023 में नैशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो ने 14,000 स्टूडेंट सुसाइड केस दर्ज किए थे। यह देशभर में कुल सुसाइड का 8.3% है। एक दशक में ऐसे सुसाइड में 65% की वृद्धि हुई थी। यह राष्ट्रीय सुसाइड रेट से अधिक है। हमारे जमाने में तो ऐसी बातें सुनी ही नहीं जाती थीं। कभी-कभार कोई इश्क़ के चक्कर में जान दे देता था, पर शिक्षा सम्बंधी या शिक्षा संसधान सम्बंधी सुसाइड कभी नहीं सुना था। क्या समाज की गति और अपेक्षा, और उपेक्षा, इतनी बढ़ गई है कि जो बच्चे बराबर दौड़ नहीं पा रहे वह निकलने का आसान रास्ता ढूंढने लगे हैं? कोटा के ‘शिक्षा-कारख़ानों’ से हर साल कई बच्चों के आत्महत्या करने के कष्टदायक समाचार मिलते हैं। वहां भारी शैक्षणिक दबाव है।
अभिभावकों की उम्मीद का दबाव होता है। समाज भी बहुत तेज़ी से बदल रहा है और केवल श्रेष्ठ को ही सलाम करता है। सब बच्चे तो अव्वल नहीं आ सकते, कई कमजोर टूट जाते हैं। इस सारे मामले में स्कूल प्रबंधन की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। जिस बच्चे ने मैट्रो स्टेशन से छलांग लगाई वह टीचर्स के हाथों बार-बार अपमानित होने की शिकायत कर गया है। एफ़आईआर में लिखा गया है कि उसने काउन्सलर को बताया था कि ‘वह सुसाइड करने की सोचता है,’ पर स्कूल ने परवाह नहीं की और न ही उसके मां-बाप को बताया। जयपुर में नौ वर्ष की बच्ची ने बार-बार उत्पीड़न से तंग आकर आत्महत्या कर ली। जिस दिन उसने आत्महत्या की उस दिन 45 मिनट में पांच बार उसने टीचर से शिकायत करने की कोशिश की कि उसके साथ सहपाठी अश्लील मज़ाक़ कर रहे हैं, पर टीचर ने कोई परवाह नहीं की। लड़की ने चौथी मंज़िल से कूदकर जान दे दी। रतलाम में 8वीं क्लास के छात्र ने स्कूल की तीसरी मंज़िल से कूदकर जान देने की कोशिश की। वह बच गया, पर यह घटना भी स्कूली उपेक्षा का परिणाम है। स्कूल में मोबाइल लाने पर पाबंदी है, पर यह छात्र ले आया। क्लास का वीडियो बनाकर उसने अपलोड कर दिया। स्कूल ने उसके मां-बाप को बुलाया। बताया जाता है कि लड़के ने 52 बार माफ़ी मांगी पर प्रिंसिपल ने उसका कैरियर तबाह करने की धमकी दे दी। वह स्केटिंग में राष्ट्रीय स्तर का खिलाड़ी है। कुछ ही क्षणों बाद उसने छलांग लगा दी।
स्कूल में मोबाइल न ले जाने देना बिल्कुल जायज़ है। हर स्कूल में यह पाबंदी चाहिए, न केवल बच्चों पर बल्कि टीचर्स पर भी। पर जब लड़के ने बार-बार माफ़ी मांग ली तो प्रिंसिपल को भी उदारता दिखाते हुए मामला छोड़ देना चाहिए था। स्कूल का काम बच्चे को सुधारना है, बिगाड़ना नहीं। ऐसा ही विचलित करने वाला मामला महाराष्ट्र में वसई से है जहां स्कूल देर से आने पर 13 वर्ष की नाजुक लड़की से 100 बैठकें निकलवाई गईं। वह वहीं बेहोश हो गई और बाद में उसकी मौत हो गई। स्कूल में अनुशासन चाहिए, पर वह क्रूरता की हद तक नहीं जा सकता। वह जमाना गया जब आप बच्चों को मुर्ग़ा बनाने की सजा दे सकते थे। संतुलन रखना अध्यापकों के लिए काफ़ी चुनौतीपूर्ण हो गया है, क्योंकि समाज बदल गया। बहुत बच्चे जिन्हें डिस्टर्ब्ड फ़ैमिली कहते हैं, से आते हैं। एक स्कूल प्रिंसिपल जो कमजोर परिवारों के बच्चों के स्कूल को चलाती हैं, ने मुझे बताया कि आधे बच्चे ‘ब्रोकन फ़ैमिली’ अर्थात टूटे परिवार से आते हैं। ऐसे बच्चों को सम्भालना और अधिक चुनौतीपूर्ण होता है लेकिन इस समस्या का एक और पहलू भी है जिस पर कम ध्यान दिया जाता है, मां-बाप और परिवार की ज़िम्मेवारी। दिल्ली के जिस लड़के ने मैट्रो स्टेशन से छलांग लगाई थी उसने स्कूल के काउन्सलर को बताया था कि वह सुसाइड करने की सोचता है। मेरा सवाल दूसरा है। स्कूल की लापरवाही तो है ही, पर मां-बाप को क्यों पता नहीं चला कि बच्चा इतना हताश और निराश है कि सुसाइड करने के बारे सोच रहा है? घरों में बच्चों के साथ संवाद क्यों नहीं होता? स्कूल अब बच्चों से संवाद करने और उनकी तकलीफ़ों को बारे जानने के लिए काउन्सलर रखते हैं। पहले तो ऐसा नहीं होता था। अब ज़रूरत क्यों पड़ गई? एक काउन्सलर ने मुझे बताया कि छोटे- छोटे बच्चे भी अपनी बात कहने आते हैं। क्या घर में सुनने वाला कोई नहीं? कई परिवारों में दोनों पति-पत्नी काम करते हैं जिससे बच्चा कटा महसूस करता है। अपनी बात अंदर छिपा कर रखता है जिससे घुटन पैदा होती है जो कई बार यह अप्रिय मोड़ ले लेती है। कई परिवार सारी ज़िम्मेवारी स्कूल पर डाल कर बैठ जाते हैं। यह सही नहीं है। कई बाप तो ऐसे हैं जिन्हें पता भी नहीं होता कि बच्चा किस क्लास में पढ़ रहा है। जवाब मिलता है, “टाइम कित्थे है जी!” आजकल के समय जब बच्चों पर बाहरी प्रभाव बहुत बढ़ गया है, अभिभावकों की ज़िम्मेवारी और भी बढ़ गई है कि वह बच्चे पर निगरानी रखें कि किधर जाता है और किस से बात करता है ? मोबाइल फ़ोन ने तबाही मचा दी है। बहुत विशेषज्ञ बता रहे हैं कि अत्यधिक सोशल मीडिया सम्पर्क बच्चों के लिए हानिकारक है। बच्चों का बचपन ख़त्म हो रहा है। मैटा की अपनी रिपोर्ट के अनुसार सोशल मीडिया से बच्चों की मानसिक और शैक्षणिक क्षमता पर असर पड़ता है। आस्ट्रेलिया ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों पर सोशल मीडिया बैन लगा दिया है। आस्ट्रेलिया की अपनी स्टडी बताती है कि 10-15 वर्ष के बच्चों में 10 में से 7 में सोशल मीडिया के प्रभाव हानिकारक पाए गए। स्टैनफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी की स्टडी में पाया गया कि ऐसे बच्चों में बोलने और लिखने की क्षमता प्रभावित हो रही है। उनमें खाने में विकार से लेकर सुसाइड के बारे सोच पाई गई। दूसरे देश भी आस्ट्रेलिया की तरफ़ देख रहे हैं कि क्या प्रतिक्रिया होती है? कई बच्चे सदमें में हैं। एक विशेषज्ञ का कहना है कि “बच्चों की दिनचर्या में सोशल मीडिया गहराई से जुड़ चुका है”। अब बच्चों को समझ नहीं आता कि क्या करेंगे? यह मां-बाप की असफलता है जो बच्चे को िबजी रखने के लिए छोटी उम्र में मोबाइल थमा देते हैं। बच्चों को आउट डोर गेम्स में व्यस्त रखने की जगह मोबाइल में व्यस्त रखा जाता है। बच्चों में जल्द ग़ुस्सा आना, आंखों में दर्द, चिड़चिड़ापन, ज़िद्दी होना सब मोबाइल से जुड़े हैं। पढ़ाई में ध्यान कम हो रहा है। डाक्टर बताते हैं कि छोटे बच्चों से माइग्रेन की शिकायत आने लगी है, जो पहले सुना भी नहीं जाता था। भारत में मोबाइल पर कोई पाबंदी नहीं है, परपैरेंट्स को उनके स्क्रीन टाइम पर नज़र रखनी चाहिए। दिल्ली हाईकोर्ट का कहना है कि पूर्ण प्रतिबंध व्यवहारिक नहीं है। यह तो सही है, पर जहां मां-बाप बच्चे को इस लत से बचाने में नाकाम हो रहे हैं वहां कुछ सरकारी दखल की ज़रूरत बनती है, पर केवल मोबाइल ही बच्चों को ख़राब नहीं करते। ज्योत्सना मोहन भार्गव ने शहरी बच्चों पर लिखी अपनी किताब स्टोंड, शेम्ड, डिप्रैस्ड में लिखा है,” सड़क पर ख़तरे के निशान बिखरे पड़े हैं फिर भी मैं शहरी घरों में बेबसी की भावना देखती हूं”। जो सामने हैं उसे नकारा जा रहा है, जिसके कई बार बहुत भयानक परिणाम निकलते हैं।
अब तो कई पेरैंट्स गर्व से कहते हैं कि हम अपने बच्चे के ‘फ्रैंड’ हैं। मैं इस बात से सहमत नहीं हूं। पेरैंट को पेरैंट रहना चाहिए, बच्चे का दोस्त नहीं बनना चाहिए। उनका काम बच्चे को ग़लत प्रभाव से बचाकर सही दिशा में डालना है। पिछले कुछ सालों में हमारा समाज बहुत हिंसक हो गया है। ड्रग्स का बहुत चलन है और आसानी से मिल जाते हैं। सब 90% से अधिक नम्बर भी नहीं ला सकते। ध्यान रखने की ज़रूरत है कि इसकी क़ीमत बच्चा मानसिक या शारीरिक तौर पर न अदा करें, अगर आप का बच्चा डिप्रेस्ड या दुखी है या ग़लत आदतों में फंस गया है तो स्कूल से पहले घर को पता चलना चाहिए। पश्चिम में बहुत मां-बाप बच्चों पर नियंत्रण खो बैठे हैं। हमें सावधान रहना है। अभिषेक और ऐश्वर्या राय बच्चन की बेटी आराध्या के पास मोबाइल नहीं है अगर उसके फ्रैंड्स ने उससे बात करनी होती है तो उसकी मां के फ़ोन पर सम्पर्क करते हैं। कितने पेरंट्स के पास यह दम है कि बच्चे को मोबाइल से दूर रखें ? 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया देखने पर पाबंदी लगाने के बाद आस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज का कहना है कि “हम बच्चों को उनका बचपन लौटा रहे हैं”। क्या हमारी सरकार भी बच्चों को डिजिटल प्रदूषण से बचा कर उनका बचपन लौटाने के बारे सोचेगी?
बच्चों को उनका बचपन लौटा दो
Summary :
पिछले कुछ सप्ताह में कई अलग जगहों से स्टूडेंट्स द्वारा आत्महत्या करने के दुखदाई समाचार पढ़ने को मिले हैं। जिस उम्र में बच्चों के खेलने-कूदने के दिन हैं, कुछ मुक्ति पाने के लिए अपनी जान देने के लिए भी तैयार हैं। दिल्ली के एक प्रतिष्ठित स्कूल की दसवीं क्लास के 16 वर्षीय लड़के ने एक मैट्रो स्टेशन से छलांग लगाकर जान दे दी और यह नोट छोड़ गया, “सॉरी मम्मी, आपका इतनी बार दिल तोड़ा, अब लास्ट बार तोड़ूंगा”। इस एक वाक्य के पीछे बच्चे की कितनी मजबूरी छिपी थी? वह बच्चा क्या-क्या बर्दाश्त करता रहा होगा कि यह आख़िरी…


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