पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में अब भी इस प्रेम काव्य का डंका बजता है। हीर-रांझा सिर्फ लोक संस्कृति में ही मौजूद नहीं हैं, सूफी संतों के रूप में उनकी विधिवत इबादत का सिलसिला भी गत लगभग 500 वर्षों से जारी है।
पाकिस्तान के शहर झंग में फैसलाबाद रोड और रेलवे लाइन के करीब ही एक मकबरा है जहां गर्मी के इस मौसम में भी सैकड़ों लोग इबादत के लिए आते हैं। हर वीरवार को यहां खास रौनक रहती है। इस मकबरे में एक ही कब्र है। एक ही कब्र में दफ्न हैं हीर और रांझा। यहीं एकत्र होते हैं हज़ारों की तादाद में नक्शबंदी सुहरावर्दी, कादरी और चिश्ती सूफी। साल में दो बार उर्स मनाया जाता है। इस्लामिक शैली में निर्मित इस मकबरे में कब्र वाले हिस्से पर छत नहीं डाली गई, मगर मान्यता व स्थानीय गवाहियां यही हैं कि बारिश के दिनों में यहां कब्र पर एक बूंद भी नहीं बरसती, जबकि कब्र के चारों ओर फर्श पर और आसपास बरसाती पानी भर जाता है। कहा यही जाता है कि ‘कुदरत भी इस कब्र का एहतराम करती है।’
‘तख्त हज़ारे’ का जट्ट, मुराद-बख्श यानी रांझा और सियालवंश की इज्जत बीबी यानि कि माईहीर दोनों की कब्र कब बनी, यह निश्चित नहीं है लेकिन इतना तय है वहां मौजूद एक पुराने शिलालेख पर वर्ष 1471 दर्ज है। संभवत: उन दिनों लोधी वंश का शासन था। वहां प्राप्त कुछ अन्य शिलालेखों के अनुसार इज्जत बीबी यानी कि माई हीर, सूफी संत हज़रत शेख अहमद कबीर की उत्तराधिकारी खलीफा थी। हजरत शेख अहमद कबीर, सैय्यद बुखारी उची के बेटे थे और झंग शहर की स्थापना सैय्यद जलाल ने ही की थी। मुझे याद है अपनी पहली पाकिस्तान यात्रा के मध्य मैं इस मज़ार को देखने के बाद उत्सुकतावश जिला सरगोधा के गांव तख्त हज़ारा भी चला गया था। रांझे का जन्म इसी गांव में हुआ था। यहीं पर ही उसने अद्वितीय सौंदर्य की मालकिन और सूफी सम्प्रदाय में दीक्षित इज्जत बीबी यानी ‘हीर’ के बारे में पहली बार कुछ लोगों से सुना था।
इन दोनों के प्रेमाख्यान को पहली बार इन्हीं के समकालीन शायर दामोदार दास अरोड़ा ने लिखा था। मगर उसके लगभग दो सौ वर्ष बाद सूफी संत व शायर बारिस शाह ने इसे एक महाकाव्य का रूप दिया। यह महाकाव्य अब पंजाबी साहित्य का एक महत्वपूर्ण अध्याय माना जाता है। मूल ग्रंथ में दर्ज जानकारी के अनुसार वारिस, जो कि निकटवर्ती कस्बे मलका हांस का निवासी था, ने इसे सन् 1762 में अंतिम रूप दिया था। दरगाहनुमा इस मज़ार को अब भी वहां के लोग ‘दरबार माई हीर’ के नाम से ही जानते हैं, पुकारते हैं। यानी हीर का नाम बड़े अदब के साथ लिया जाता है।
दामोदार दास ने जब ‘हीर’ की रचना की तब अकबर का शासन था। उन दिनों प्रेमाख्यानों को ज़्यादा सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता था। मगर जब 200 वर्ष बाद सैय्यद वारिस शाह ने 18वीं सदी में इसे एक सूफी महाकाव्य के रूप में रचा तो उसकी पहचान ही ‘हीर वारिस शाह’ के रूप में हो गई। हालांकि उन दिनों लोकगीतों और लोक-आख्यानों के माध्यम से मौखिक परंपरा में यह काव्य गाया जाता था लेकिन कालांतर में इसे नाटक रूप में भी प्रस्तुत किया गया और इस पर भारत, पाक दोनों देशों में िफल्में भी बनी।
उन दिनों भी सैकड़ों की तादाद में मुरादें मांगने वालों की भीड़ इस दरगाह, ‘दरबार आशिक सादिक माई हीर ‘औ’ मियां रांझा’ पर पहुंचती थी। लोग मुरादें मांगते और चादर चढ़ाते और अपनी मुराद की याद के रूप में कोई लाल या हरा रुमाल या धागा दरगाह के किसी दरख्त या जंगले के साथ बांध जाते। फिर मुराद पूरी होने पर सिजदे व शुक्राने के लिए दोबारा आते और अपना रुमाल या धागा खोल कर ले जाते।
मैं वहां के एक खिदमतगार से पूछता हूं कि कब्र पर बारिश क्यों नहीं होती तो उसने कहा, ‘दरअसल एक बार भारी बारिश के दिनों में माई हीर ने अल्लाह मियां से रहमत की भीख मांगी थी। उसकी गुज़ारिश फौरन कबूल कर ली गई और तब से भारी बारिशों के दिनों में भी कब्र पर एक बूंद भी नहीं गिरती।’ दरबार के बाहरी दरवाज़े पर एक दान पात्र भी है, जिसमें श्रद्धालु अपनी श्रद्धा और औकात के अनुसार पैसे डाल जाते हैं। यह राशि दरगाह के रखरखाव पर खर्च होती है।
कब्र के चारों ओर छह पतले-पतले खम्भे हैं। इन पर लोग लाल धागे, चूडि़यां चढ़ाने के बाद एक चिराग भी जलाते हैं। हर वीरवार यहां खीर का प्रसाद बांटा जाता है। इत्तफाक से जिस दिन मैं गया था, उस दिन वीरवार था। दरगाहों पर इस वार को ‘पीरों का दिन’ माना जाता है। सूफी-प्रेम की प्रतीकात्मकता के अलावा यह प्रेमी युगल जाति, वर्ग, रूढ़ियों व सामाजिक कट्टरपंथियों के खिलाफ जूझने का भी प्रतीक बन गए हैं।
यहां यह भी उल्लेख ज़रूरी है कि जंडियाला शेर खान नामक स्थल पर सैय्यद वारिस शाह की दरगाह अलग से है। वहीं यानि जंडियाला शेर खान में ही 23 जनवरी, 1722 को जन्मे वारिस का ज़्यादा वक्त और लेखन मलका हांस में ही बीता था और वहीं पर उनका 1798 में निधन हो गया था। वारिश शाह का संबंध सूिफयों की चिश्ती शाखा से था और वह सैय्यद मुहम्मद अल मक्की की वंश परंपरा में था। वह कसूर के सूफी संत हािफज़ गुलाम मुर्तज़ा को अपना उस्ताद मानता था। मलका हांस, कस्बा, पाकपट्टन से सिर्फ 12 किलोमीटर की दूरी पर है।
उसके अमर महाकाव्य ‘हीर’ में कालांतर में अनेक अंश, अन्य शायरों ने भी जोड़ डाले थे। एक शोध के अनुसार बैत-शैली में रचे गए मूल ग्रंथ में 11069 बैत या पद, मूल प्रति में नहीं थे। इसकी सर्वाधिक प्रामाणिक प्रति इस समय पंजाब पब्लिक लाइब्रेरी लाहौर में मौजूद है और इसे एक प्रतिष्ठित हिंदू प्रकाशक किरपा राम ने 1916 में विद्वानों की पूरी राय लेने के बाद प्रकाशित किया था। इस महाकाव्य के अनेक ‘बैत’ एक मुहावरे की तरह ग्रामीण अंचल में लोकप्रिय हैं- मसलन ‘वारिस’ रन्न, फकीर, तलवार, घोड़ा, चारे ठोक किसे देर नहीं’ लेकिन कुछ लोगों का कहना है कि यह पद वारिस का नहीं था, बाद में जोड़ा गया था। उसका एक और पद भी चर्चित है-
‘वारिस शाह ना आदतां, जांदीयां ने
भावें कट्टिए पोरियां-पोरियां जी’
‘एह रुह-कलबूत दा जि़क्र सारा,
नाल अकल दे मेल बुलाया ई’
दिलचस्प बात यह है कि वारिस की मज़ार पर भी मन्नतें मानी जाती हैं। उसकी मुख्य कब्र के आसपास दो कब्रें और भी हैं। कुछ लोग कहते हैं इनमें हीर व रांझा की निजी निशानियां दफन हैं। ये निशानियां स्वयं वारिस, तख्त-हज़ारा व सियालों के गांवों से लाया था। वारिस की दरगाह पर अब भी मेला लगा रहता है। वीरवार को वहां मन्नतें मानने वालों की भीड़ भी रहती है और वहां भी ‘खीर व पूड़ों’ का प्रसाद बांटा जाता है। लंगर तो लगभग हर रोज़ ही लगा रहता है।
जिस दिन मैं वहां कुछ मित्रों के साथ गया तो वहां के जिला नाजि़म भी इस्तकबाल के लिए आए थे। उन्होंने अपने स्वागत भाषण में एक बात कही थी, ‘देखो यारो। दूर-दूर से लोग सैय्यद की दरगाह पर जि़यारत के लिए आते हैं, मगर कोई भी बाप यह नहीं चाहता कि उसके घर हीर जैसी बेटी या रांझा जैसा बेटा पैदा हो।’ उसकी बात में व्यावहारिकता का पुट था मगर हकीकत यह भी थी कि उस दिन सजदा करने वालों में पहला शख्स वही था और पहली फूलों की चादर भी उसी ने चढ़ाई थी। उसने स्वीकार भी किया था कि वहां पर आकर उसने जो-जो मन्नतें मांगी थी, सभी कबूल भी हुई थीं।
हीर, रांझा को मिला है दर्जा सूफी संतों का
Summary :
पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में अब भी इस प्रेम काव्य का डंका बजता है। हीर-रांझा सिर्फ लोक संस्कृति में ही मौजूद नहीं हैं, सूफी संतों के रूप में उनकी विधिवत इबादत का सिलसिला भी गत लगभग 500 वर्षों से जारी है। पाकिस्तान के शहर झंग में फैसलाबाद रोड और रेलवे लाइन के करीब ही एक मकबरा है जहां गर्मी के इस मौसम में भी सैकड़ों लोग इबादत के लिए आते हैं। हर वीरवार को यहां खास रौनक रहती है। इस मकबरे में एक ही कब्र है। एक ही कब्र में दफ्न हैं हीर और रांझा। यहीं एकत्र होते हैं हज़ारों की…


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