बढ़ना नहीं चाहिए हिन्दू-मुस्लिम वैमनस्य

Summary :

मुसलमान व अन्य धर्मों के लोग पूर्ण विश्व में निवास करते हैं, मगर सिवाय भारत के, कहीं भी उन से यह प्रश्न नहीं किया जाता कि देश पहले या धर्म? यी भ्रामक प्रश्न पूछने का कोई मतलब नहीं। जो भी व्यक्ति है और भले ही वह किसी भी धर्म का हो, किसी को उससे यह पूछने का अधिकार नहीं कि देश अधिक प्यारा अथवा धर्म, क्योंकि किसी भी शहरी को दोनों प्यारे होते हैं। वतन है तो मस्जिद, मंदिर, स्मारक आदि सभी होंगे और धर्म के द्वारा भगवान से इन सब की सलामती के लिए दुआ की जाती है। दुआ…

मुसलमान व अन्य धर्मों के लोग पूर्ण विश्व में निवास करते हैं, मगर सिवाय भारत के, कहीं भी उन से यह प्रश्न नहीं किया जाता कि देश पहले या धर्म? यी भ्रामक प्रश्न पूछने का कोई मतलब नहीं। जो भी व्यक्ति है और भले ही वह किसी भी धर्म का हो, किसी को उससे यह पूछने का अधिकार नहीं कि देश अधिक प्यारा अथवा धर्म, क्योंकि किसी भी शहरी को दोनों प्यारे होते हैं। वतन है तो मस्जिद, मंदिर, स्मारक आदि सभी होंगे और धर्म के द्वारा भगवान से इन सब की सलामती के लिए दुआ की जाती है। दुआ में, प्रार्थना में बड़ा दम, बड़ा वज़न होता है। हां, जब बात दीन की होती है तो इस्लाम के कई उसूल ऐसे होते हैं कि उनके लिए कोई कंप्रोमाइज नहीं। भारत की आज़ादी से पूर्व, मुस्लिमों की संख्या 25 प्रतिशत थी और हिंदू बहुल आबादी, असम, बंगाल,पंजाब, बलूचिस्तान, भारत के विभाजन के बाद मुस्लिमों और उर्दू को इसका ज़िम्मेदार ठहराया जाता है और यह तोहमत लगाई जाती है कि उनको उनका पाकिस्तान मिल गया तो और उनको क्या चाहिए। आखिर अब क्यों वे उनकी छाती पर मूंग दल रहे हैं। यह बहुत अनुचित विचारधारा है। जो लोग इस प्रकार की मानसिकता रखते हैं उन्हें मौलाना आज़ाद और भारत से इश्क करने वाले देशभक्त मौलानाओं और मुस्लिमों द्वारा दी गई कुर्बानियों का कोई अंदाज़ा नहीं। संयोग से अधिकतर मुस्लिम इन्हीं प्रांतों में निवास करते हैं।
बाकी मुस्लिम बतौर अल्पसंख्यक पूर्ण भारत में रहते हैं। मुहम्मद अली जिन्ना का ज़िक्र इस संदर्भ में इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वे भारत के मुस्लिम बहुल इलाकों को लेकर पाकिस्तान की स्थापना करने की इच्छा रखते थे। मौलाना आज़ाद को जब जिन्ना ने “शो ब्वॉय” कहा तो उनका कहना था कि मैं हिंदुओं और अंग्रेज़ों, दोनों से लड़ सकता हूं, मगर वे मुस्लिम और मौलवी राष्ट्रवादी हैं। ये राष्ट्रवादी मुस्लिम बजाय जिन्ना के, अंत तक गांधीजी के साथ रहे। इन राष्ट्रवादी मुसलमानों में मौलाना आज़ाद का बड़ा वर्चस्व था और वे गांधीजी के साथ थे, जिसके कारण जिन्ना को डर था कि भौगोलिक परिस्थिति में पाकिस्तान कमजोर रहेगा। राष्ट्रवादी मुस्लिम अंत तक मौलाना आज़ाद के साथ रहा। विभाजन के समय जिन्ना का प्लान असफल रहा क्योंकि वह चाहते थे कि ​िहन्दुस्तान के सभी मुस्लिम बहुल क्षेत्र पाकिस्तान में चले जाएं। यदि ऐसा होता तो आज पाकिस्तान की सीमाएं दिल्ली तक होतीं और पंजाब, कश्मीर व बंगाल भी आज के भारत की सीमा में नहीं होता, मगर मौलाना आज़ाद और राष्ट्रवादी व संस्कारी मुस्लिमों ने ऐसा होने से बचा लिया। जिन्ना ने हिन्दुस्तानियों और विशेष रूप से मुस्लिमों को कहा कि वह उनके नेता हैं, जिसे उन्होंने नहीं माना। मुस्लिम, इंडियन नैशनल कांग्रेस और इंडियन नैशनल मूवमेंट के साथ ही रहा। नतीजा यह निकला कि जिन्ना को पश्चिमी और पूर्वी पाकिस्तान दे दिए गए, जिसमें 4300 किलोमीटर दिए पश्चिमी पाकिस्तान को ये लोग मात्र 24 वर्ष में ही गंवा बैठे। यह इन्हीं राष्ट्रवादी मुस्लिमों के सीसा पिलाई भांति दीवार की तरह भारत के साथ खड़े रहने और पाकिस्तान को नकारने के कारण ही था कि अधिकतर मुस्लिम बहुल प्रांत, जैसे जम्मू-कश्मीर, पंजाब, असम, हरियाणा, हिमाचल, बंगाल, नॉर्थ ईस्ट फ्रंटियर एरिया अथवा चिकन नेक आदि का बड़ा भाग भारत में ही रहा। यदि जिन्ना का फॉर्मूला सफल होता तो पाकिस्तान की सरहदें आज दिल्ली से लगी होतीं। यह सब मौलाना आज़ाद के नेतृत्व में चल रहे राष्ट्रवादी मुस्लिमों के कारण हुआ कि भारत अपने अखंड रूप के एक बड़े भाग को बचा पाया। वीभत्सपूर्ण विभाजन के बाद भारत के साढ़े तीन करोड़ मुस्लिम और पाकिस्तान साढ़े चार करोड़ मुस्लिम एक सही समन्वय बना कर रख सकते थे। आज के भारत के बच्चे, बल्कि बड़े भी समझ रहे हैं कि मुसलमानों को अब मज़हब के नाम पाकिस्तान दे दिया गया है, तो आज के लगभग 20 करोड़ मुस्लिम उनके सीने पर मूंग दल रहे हैं। आख़िर ये क्यों बराबरी का दर्जा मांग रहे हैं आदि। यह सोच इसलिए सही नहीं है, क्योंकि मुस्लिमों की एक बड़ी संख्या ने पाकिस्तान की तुलना में भारत को लब्बैक कहा और इस वतन-ए-अज़ीज़ की मिट्टी को चूम कर माथे से लगाया।
इस लेख के लिखने का अभिप्राय यही है कि वे अपने अंदर से एहसास-ए-कमतरी निकालें और जो भी परिस्थितियां हैं, डट कर उनका मुकाबला करें। वे अपने धार्मिक गुरुओं के महत्व को समझें और समझाएं। यदि वे जिन्ना के पीछे खड़े हो जाते तो आज इस्लाम के नाम में बना, मदीना सल्तनते उस्मानिया के बाद यह दूसरा सबसे बड़ा देश होता जिसकी सीमाएं न जाने कहां से कहां पर होतीं।अब हम दूसरे महत्वपूर्ण मुद्दे की ओर जा रहे हैं। आज़ादी से पूर्व मात्र 14 प्रतिशत मुस्लिम ही वोट देने के हकदार थे। एक बड़ी संख्या, अर्थात 86 प्रतिशत वोट देने से ऐसे ही वंचित थे, जैसे अछूत हों। वोट देने वालों में बड़े-बड़े जागीरदार, नंबरदार, जमींदार, इन्कम टैक्स देने वाले, सरकारी अफसर आदि हुआ करते थे। आप ऐसा मान कर चलिए कि लगभग 90 प्रतिशत मुस्लिम अपनी राय रखने का अधिकार नहीं रखते थे। ये वही संस्कारवादी मुस्लिम थे, जो भारत में ही रहना चाहते थे, मगर इनके पास पाकिस्तान के विरुद्ध वोट करने का अधिकार ही नहीं था, अर्थात पाकिस्तान उन्हीं जिन्नावादी मानसिकता वाले तबके के मुस्लिमों ने बनाया था। इनके लिए ही, मौलाना आज़ाद ने अपने जामा मस्जिद के ऐतिहासिक भाषण में कहा था:”जो चला गया उसे भूल जा,हिंद को अपनी जन्नत बना।”हमारा मकसद आज के मुस्लिम बच्चों, बल्कि उन लोगों को भी यह बताना है कि भारत में जो राष्ट्रवादी और संस्कारवादी मुस्लिम हैं, उन्होंने पाकिस्तान को नकारा है और भारत को स्वीकारा है। मगर दिल को ठेस जब पहुंचती है कि जब उनसे देशभक्ति का प्रमाणपत्र मांगा जाता है या पूछा जाता है कि मज़हब पहले या देश। मुसलमान के लिए देश सर्वोपरि है। हां, इस में कोई दो राय नहीं कि मुस्लिम अपने देश की जड़ों से बड़ी मजबूती के साथ जुड़ा हुआ है।
मुस्लिमों के प्रति जो शक और शुबा, बिरादरान-ए-वतन हिंदुओं में है, उसकी जड़ें 1986 के बाबरी मस्जिद के ताला खोलने से लेकर आज तक के चालिस सालों में हैं। यह हिंदू-मुस्लिम वैमनस्य बढ़ गया है, जिसका समाधान भी हम सबको मिल कर ही निकलना है।

Team Desk