‘कल रात जब गहरी नींद में था शहर,
जंतर मंतर पर बिखरी हुई बैचेनियों, संत्रास व अकुलाहटों के बीच
वहां मौजूद देश के युवाओं ने एक आतिशी सुर्ख रंगों से
रौशन कर दिया अपना-अपना एक सूरज
कल जब नया सवेरा आएगा, नवसनाध्य किरणों के आगोश में
चमकेगा हर किसी का मुस्तकबिल, नया भारत जिसका नाम होगा’
जंतर-मंतर के आदमकद सन्नाटों को चीरते नए जोशो-खरोश से लबरेज़ ‘जेन ज़ी’ या यूं कहें कि देश के युवाओं के इस मुखर आंदोलन को अगर कोई नया चेहरा मिला है तो इसका बहुत हद तक श्रेय इंटरनेट को भी जाता है। ‘जेन ज़ी’ अपने पूर्ववर्ती जेनरेशंस से अलग एक ऐसी पीढ़ी है जो इंटरनेट के साथ ही पैदा हुई, अगर पालतू टीवी न्यूज़ चैनल और भाजपा का परंपरागत आईटी सेल इस ‘जेन ज़ी’ आंदोलन से लोहा नहीं ले पाए तो इसकी वज़ह इस जेनरेशन की इंटरनेट के साथ तारतम्यता है। इस पीढ़ी ने आधुनिक दौर के सबसे बड़े ईजाद इंटरनेट की ताकत, व्यापकता और इसकी बेहतर उपयोगिता को अपनी तासीर में पिरो रखा है। इस नई जेनरेशन को आप वैसे कंट्रोल नहीं कर सकते, जैसा परंपरागत मीडिया को कर सकते हैं।
‘रील्स’ इनके पास अभिव्यक्ति का सबसे बड़ा हथियार है और जो भाजपा नेता यह कहते इतरा रहे थे कि ‘जो लड़कियां आज आपको जंतर-मंतर पर नारे लगाते दिख रही हैं, कुछ दिनों बाद वे आपको दुकानों में मैचिंग लिपस्टिक खरीदती नज़र आएंगी’, तो ‘जेन ज़ी’ ने इस बात का भी मुंहतोड़ जवाब दे दिया है कि ‘वे इश्क और इंकलाब दोनों साथ कर सकते हैं।’ सरकार और इसके रणनीतिकार दरअसल ‘जेन ज़ी’ और ‘जेन अल्फा’ को समझाने में गलती कर गए, उन्हें शायद इस बात का इल्म नहीं रहा कि ‘जेन ज़ी’ के सोचने और एक्ट करने का तरीका ‘मिलेनियरस’ और ‘बेबी बूमर जेनरेशन’ से किंचित अलग है। समाज व तंत्र इन दोनों को ही इस जेनरशन ने अपनी स्पष्ट सोच, निर्भीकता और ताकत का अहसास करा दिया है। शायद इसीलिए मजबूरी में धर्मेंद्र प्रधान को अपना इस्तीफा पीएम के पास भेजना पड़ा है।
गलती कहां हुई?
केंद्र सरकार अपनी सरकारी खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट पर आंख मूंद कर यकीन करती रही, जिसमें बारंबार कहा गया कि ‘इस आंदोलन की उम्र ज्यादा लंबी नहीं, यह ज्यादा टिकाऊ इसीलिए नहीं हो सकता कि इस पर कब्जा करने के लिए वामपंथी व अंबेडकरवादी तत्व इसमें घुस आए हैं, इस आंदोलन का स्वरूप भी व्यवस्थित नहीं है, कोई सुचारू मैनेजमेंट या व्यवस्था इनके पास नहीं है।’ पर नीट परीक्षा में धांधली के विरोध से शुरू हुए इस आंदोलन ने बहुत जल्द ही भौगोलिक सीमाएं लांघ दीं, जंतर-मंतर की चिंगारी देश के अन्य हिस्सों में फैल गई, यहां तक कि जर्मनी, ब्रिटेन, अमेरिका जैसे देशों में भी युवा इसके समर्थन में उतर आए। जब यह आंदोलन गति पकड़ रहा था तो देश के कुछ मूर्धन्य पत्रकार जो अलग-अलग प्रिंट व डिजिटल मीडिया से जुड़े थे वे केंद्र के एक बेहद शक्तिशाली मंत्री से मिलने पहुंचे तो ये पत्रकारगण आंदोलन के प्रति मंत्री जी के रवैए को लेकर हैरान रह गए। मंत्री जी का मानना था कि ‘पहले भी ऐसे कई आंदोलन हुए हैं, पर सब फुस्स साबित हुए हैं।’
मंत्री ने कहा कि ‘शिक्षा मंत्री के इस्तीफे का सवाल ही पैदा नहीं होता क्योंकि हमने नीट को संचालित करने वाली एजेंसी ‘एनटीए’ के दोषी अधिकारियों पर पहले ही कार्रवाई कर दी है।’ हां, एक सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह कि इस मंत्री जी का मानना था कि ‘आंदोलन ने शुरूआती दिनों में जंतर मंतर पर मौजूद हमारे पुलिस बलों का रवैया आंदोलनकारी छात्रों के साथ ज्यादा ही लचर और उदार था, सो हमें मजबूरन कहना पड़ा कि पुलिस बल आंदोलनकारियों के साथ और थोड़ी सख्ती से पेश आए।’ और इसके बाद तो पुलिस का व्यवहार सबके सामने है।
सोनम की पत्नी का ओडिशा कनेक्शन !
सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि आंगमो को भाजपा व सोनम के बीच की सबसे बड़ी कड़ी बताया जाता है। गीतांजलि सोनम से ब्याहने से पहले ओडिशा के बालासोर की रहने वाली थीं, उनका मायका वहीं का है। वह एक पंजाबी-जैन परिवार से ताल्लुक रखती हैं। यह भी कहा जाता है कि सोनम को धर्मेंद्र प्रधान से सबसे पहले गीतांजलि ने ही मिलवाया था। शायद यही वज़ह रही हो कि सोनम ने सरकार की नई शिक्षा नीति के समर्थन में खुल कर तारीफों के कसीदे पढ़े थे। अब लगतार यह सवाल उठ रहे हैं कि क्या गीतांजलि व सोनम ने जानबूझ कर ऐसा माहौल बनवाया कि इस पूरे आंदोलन के छींटे भाजपा पर न पड़े और न ही इस आंदोलन का कांग्रेस कोई लाभ ले पाए।
यह बात भी अभी तक एक पहेली है कि क्यों गीतांजलि लड़-भिड़ कर सोनम को सफदरजंग अस्पताल से मेदांता शिफ्ट कराने का हाई कोर्ट का आदेश लेकर आ गईं। क्यों अनशन तोड़ने के लिए लगातार सोनम की मांगों की लिस्ट को ज्यादा से ज्यादा लचीला बनाया गया, उसमें से धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को सीधे डिलीट कर दिया गया? क्यों गीतांजलि के बयानों में भाजपा के खिलाफ कोई टिप्पणी नहीं होती थी अपितु नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के खिलाफ राजनैतिक बयान अवश्य होते थे और इन बयानों को सोनम का समर्थन हासिल होता था। पर लगता है सोनम वांगचुक को भी इस बात का इल्म हो चुका है कि छात्रों का यह आंदोलन अब उनके या ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ की जद में नहीं रहा, इससे वह काफी बड़ा हो गया है और छात्रों का आंदोलन उन्हें पीछे छोड़ कर कहीं आगे निकल चुका है, सो अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने की जद्दोजहद करते उन्होंने इस शनिवार को इंस्टाग्राम पर पोस्ट किया-क्या उन्हें यह साबित करने के लिए कोई चरित्र प्रमाण पत्र चाहिए कि उनका अनशन कितना सच्चा था?’ इसका जवाब भी शायद सोनम को अपने अंदर ही ढूंढना पड़ेगा।
सोनम दंपति की मजबूरी क्या है?
सरकार से जुड़े सूत्रों के दावों पर अगर यकीन किया जाए तो आने वाले दिनों में सोनम व गीतांजलि पर एक और बड़ी कृपा बरस सकती है। दरअसल, सोनम व गीतांजलि के संस्थान ‘हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ ऑल्टरनेटिव लद्दाख’ के पास यूजीसी या एआईसीटीई की कोई आधिकारिक मान्यता नहीं है। संसद में भी इस संस्थान को मान्यता देने के लिए कई दफे चर्चा हो चुकी है। कई सालों से यह मामला यूजीसी में पेंडिंग पड़ा है। सोनम की पत्नी डॉ. गीतांजलि जे. आंगमो इस हिमालयन संस्थान की को-फाउंडर हैं, वर्तमान में वह इसकी सीईओ और डीन भी हैं, सनद रहे कि इस संस्थान की स्थापना 2017 में हुई है। सोनम के सरकार के पिछलग्गू होने के पीछे एक तर्क और दिया जा रहा है इसी मानसून में केंद्र सरकार विदेशी फंड से संचालित होने वाले एनजीओ पर लगाम लगाने के लिए एफसीआरए कानून संशोधन विधेयक लाने वाली है, केंद्र का यह नया विधेयक सोनम के लद्दाख में चल रहे एनजीओ पर भी उल्टा असर डाल सकता है, शायद इसीलिए भी वे घुटनों पर आने को मजबूर हो गए।
…और अंत में
खबरों से अप्रांसगिक हो चुके बॉलीवुड स्टार सलमान खान 23 जुलाई को यूं अचानक आंदोलनकारी छात्रों के समर्थन में एक पोस्ट जारी कर यकायक सुर्खियों में आ गए। 250 शब्दों वाले इस पोस्ट में सलमान ने छात्रों के आंदोलन में हुई हिंसा पर दुख जताया था। तब तक बॉलीवुड व हॉलीवुड के कई चर्चित चेहरों का इस आंदोलन को समर्थन हासिल हो चुका था, पर सलमान के इस कदम ने उन्हें युवाओं में फिर से हीरो बना दिया। पर इसके अगले ही रोज सलमान 360 डिग्री पर पलट गए, अपने पहले पोस्ट में जहां वे बेहतर शिक्षा व्यवस्था के लिए आंदोलन कर रहे युवाओं के प्रयासों की सराहना कर रहे थे, इसके अगले दिन के पोस्ट में उन्होंने युवाओं से आंदोलन छोड़ घर लौट जाने की अपील कर डाली।
जिन लोगों ने ये पोस्ट देखा वे समझ गए कि यह पोस्ट लिखने की सलमान की शैली नहीं है, उन्हें मसौदा कहीं से लिख कर आया है, उन्होंने तो बस इसे पोस्ट किया है। अब चूंकि सलमान की एक नई फिल्म ‘मातृभूमि’ आने वाली है। सो, इस दूसरे पोस्ट को लेकर युवाओं ने उन्हें खूब ट्रोल कर दिया, यहां तक कह दिया कि ‘सलमान डर गए हैं’ अब अपने परिचित अंदाज में सलमान ने तीसरा पोस्ट किया है-’ जो डर गया, वह मर गया।’ पर अगर सचमुच सलमान नहीं डरे हैं तो वे अपनी फिल्म के डिस्ट्रीब्यूटर्स को फोन कर ‘मातृभूमि’ की रिलीज डेट आगे बढ़ाने को क्यों कह रहे हैं?


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