शिक्षा मन्त्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे से स्पष्ट हो गया है कि प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी की सरकार भारत के लोगों द्वारा चुनी गई एेसी सरकार है जिसका भारत की संवैधानिक लोकतान्त्रिक प्रणाली पर पूरा विश्वास है और जो यह मानती है कि लोकतन्त्र में जनभावनाओं का सम्मान करते हुए ही सरकार चलनी चाहिए। इसमें किसी भी पक्ष की न जीत हुई है न हार हुई है, बल्कि देश की जनता की विजय हुई है। अतः हम कह सकते हैं कि नरेन्द्र मोदी की सरकार पूर्णतः लोकतांत्रिक सरकार है जिस पर विपक्षी दल फासीवादी होने तक के अनर्गल आरोप लगाते रहते हैं। श्री मोदी ने धर्मेन्द्र प्रधान का त्यागपत्र लेकर एक बार पुनः सिद्ध कर दिया है कि उन्हें जनता की नब्ज देखनी आती है। अतः भारत के लोकतन्त्र के मुख्य शिखर होने के कारण श्री मोदी ने अपने फैसले से लोकतन्त्र की जीत का मार्ग प्रशस्त किया है। पेपर लीक के मसले पर जिस तरह पूरे देश के युवाओं में क्रोध था उसे भांपने में श्री मोदी ने कोई गफलत नहीं की क्योंकि राजधानी दिल्ली के अलावा भी देश के कई अन्य प्रमुख नगरों में पेपर लीक को लेकर युवा सड़कों पर थे और शिक्षा मन्त्री प्रधान का इस्तीफा मांग रहे थे।
दिल्ली में जन्तर-मन्तर पर विगत 20 जुलाई से लेकर अब तक आन्दोलन जिस तरह हिंसक हो रहा था उसके देश के अन्य नगरों में भी फैलने का खतरा पैदा हो गया था। इसकी वजह यह थी कि यह आन्दोलन युवा पीढ़ी के नाम पर चलाया जा रहा था जिनमें परोक्ष रूप से उनके परिवार भी शामिल हो गये थे। वैसे भी पिछले 14 वर्षों में 152 परीक्षाओं के पेपर लीक होना कोई साधारण बात नहीं थी जिसके कारण सत्तारूढ़ भाजपा पार्टी रक्षात्मक होती जा रही थी। उसके लिए धर्मेन्द्र प्रधान की ढाल बनना मुश्किल हो रहा था। इस हकीकत के चलते भाजपा के भीतर भी भारी मंथन हो रहा था क्योंकि लोकतन्त्र में सत्तारूढ़ पक्ष का कमजोर पड़ना विपक्ष के हाथों में अपनी डोर देना होता है। बेशक डिजिटल अस्तित्व वाली कथित काॅकरोच जनता पार्टी युवाओं का यह आन्दोलन चला रही थी मगर कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दलों को भी उनका समर्थन करना पड़ रहा था। हालांकि कांग्रेस पार्टी के लोकसभा में विपक्ष के नेता श्री राहुल गांधी ने इस मुद्दे को सबसे पहले उठाते हुए मोदी सरकार पर भारी आरोप लगाये थे। उन्होंने इस सन्दर्भ में राजस्थान के कोटा से लेकर उत्तराखंड के देहरादून में रैलियां आयोजित कर पेपर लीक पर युवाओं का दिल टटोलने का प्रयास भी किया था मगर दिल्ली में विगत 20 जुलाई को युवकों को दिल्ली आने का आह्वान काॅकरोच जनता पार्टी ने ही किया था जिसमें भारी संख्या में युवा छात्र-छात्राएं तो आये मगर उनके साथ कुछ बाजाब्ता तौर पर मुल्जिम व मुजरिम पेशेवर गुंडे भी आ गये और उन्होंने युवाओं के इस आन्दोलन को हिंसक रूप देने में कोई कसर नहीं छोड़ी जिसकी वजह से छात्रों और पुलिस के बीच झड़पें हुईं जिसमें 118 के लगभग पुलिस कर्मी जख्मी हुए और 70 के लगभग युवा भी निशाना बने।
कांग्रेस व काॅकरोच पार्टी मांग कर रहे थे कि धर्मेन्द्र प्रधान इस्तीफा दें क्योंकि उन्हीं का शिक्षा मन्त्रालय चिकित्सा क्षेत्र में मेडिकल कालेजों में प्रवेश के लिए नीट के माध्यम से परीक्षा लेता है। गौर से देखा जाये तो युवकों की यह मांग बेजा नहीं थी क्योंकि नीट की परीक्षा का पेपर 2024 में भी लीक हुआ था और इस बार 2026 में भी यह लीक हो गया था जिसमें 22 लाख से अधिक छात्र-छात्राएं बैठे थे। हालांकि सरकार ने नीट पीरक्षा का पुनः आयोजन एक सप्ताह बाद ही सफलतापूर्वक करके 11 लाख से अधिक छात्रों के उत्तीर्ण होने का परीक्षाफल भी दे दिया। मगर इससे पहले भी कई प्रदेशों में विभिन्न परीक्षाओं के पेपर लीक होते रहते थे, हालांकि उनके लिए राज्य सरकारें जिम्मेदार थीं। मगर मुख्य मुद्दा नीट परीक्षा इसलिए बन गया क्योंकि यह उच्च मेडिकल शिक्षा का क्षेत्र था।
भारत के आम मध्यम वर्गीय परिवारों में अपने बेटे या बेटी को इंजीनियर या डाॅक्टर बनाना एक सपना होता है। इसमें मां-बाप का भारी खर्चा होता है और विद्यार्थी को बहुत कड़ा श्रम व पढ़ाई करनी होती है। अतः नीट परीक्षा का तीन साल में दो बार पेपर लीक होना कोई साधारण घटना नहीं कही जा सकती। जब 2024 में नीट परीक्षा लीक हुई थी तो श्री प्रधान ने संसद के माध्यम से लीक रोकने हेतु एक कानून भी बनवाया था मगर इसके होते हुए 2026 में पेपर फिर लीक हो गया। इससे यही प्रणाणित हुआ कि नया कानून भी पेपर लीक की समस्या को रोकने में असमर्थ है। इसी की वजह से मोदी सरकार ने नीट संस्थान के 47 कर्मचारियों को बर्खास्त किया है और केन्द्रीय शिक्षा सचिव का भी तबादला कर दिया है। पेपर लीक को असंभव बनाने हेतु प्रधानमन्त्री ने अब पुनः नया कानून बनाने का रास्ता खोला है जिसमें पेपर लीक करने पर दोषी को दस साल तक की सजा और दस करोड़ रुपये तक का जुर्माना देना होगा। इस कानून का प्रारूप मोदी सरकार की कैबिनेट ने स्वीकृत कर दिया है जिसे विधेयक रूप में आगामी सोमवार को विचारार्थ संसद में रखा जायेगा। मगर पेपर लीक के मुद्दे पर ही पूरे एक सप्ताह संसद की कार्यवाही विपक्ष ने ठप्प रखी और वह श्री प्रधान का इस्तीफा मांगता रहा। उम्मीद की चाहिए आगामी सोमवार से संसद सुचारू रूप से चलेगी और जन्तर-मन्तर पर धरना-प्रदर्शन बन्द हो जायेगा। मगर इस पूरे प्रकरण से एक बार फिर यह सिद्ध हुआ है कि श्री नरेन्द्र मोदी का लोकतन्त्र में अटूट विश्वास है और उन्हें जनता की ताकत पर भरोसा है।
यहां हम स्वतन्त्र अमेरिका के पहले राष्ट्रपति जार्ज वाशिंगटन से लेकर महात्मा गांधी को याद कर सकते हैं क्योंकि दोनों ने ही कहा था कि लोकतन्त्र में सरकारों को केवल जनता की आवाज ही चलाती है क्योंकि जनता अपने कष्टों को भली-भांति समझती है। जहां तक संसदीय प्रणाली के लोकतन्त्र में विपक्ष का सवाल है तो यह सरकार की नीतियों की खामियों को उजागर करने के धर्म से बंधा होता है जिससे सरकार हमेशा जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरने का प्रयास करे। मगर यह कार्य संसद में केवल नारेबाजी और शोर-शराबा करने से भी नहीं हो सकता। इसके लिए विपक्ष को वैकल्पिक नीतियों का दस्तावेज भी पेश करना पड़ता है। ब्रिटेन में इसीलिए उनकी चुनी हुई संसद ‘हाऊस आॅफ कामंस’ में विपक्ष के नेता को छाया प्रधानमन्त्री (शेडो प्राइम मिनिस्टर) कहा जाता है। इस गूढ विषय पर आगे कभी प्रकाश डालने का प्रयत्न करूंगा।
पेपर लीक और धर्मेन्द्र प्रधान
Summary :
शिक्षा मन्त्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे से स्पष्ट हो गया है कि प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी की सरकार भारत के लोगों द्वारा चुनी गई एेसी सरकार है जिसका भारत की संवैधानिक लोकतान्त्रिक प्रणाली पर पूरा विश्वास है और जो यह मानती है कि लोकतन्त्र में जनभावनाओं का सम्मान करते हुए ही सरकार चलनी चाहिए। इसमें किसी भी पक्ष की न जीत हुई है न हार हुई है, बल्कि देश की जनता की विजय हुई है। अतः हम कह सकते हैं कि नरेन्द्र मोदी की सरकार पूर्णतः लोकतांत्रिक सरकार है जिस पर विपक्षी दल फासीवादी होने तक के अनर्गल आरोप लगाते…



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