प्रकृति से छेड़छाड़ का परिणाम

Summary :

बचपन के स्कूली जीवन में बरसात आने पर किश्तियां बना कर चलाने की यादें खत्म हो गईं। पहाड़ों पर भूस्खलन से लोगों के मरने की घटनाएं सुर्खियां बन रही हैं। मैदानी इलाकों में मानसून रूठ रहा है। वैज्ञानिक इसे जलवायु परिवर्तन बता रहे हैं लेकिन भारत के लिए प्रकृति का बदलाव एक गंभीर खतरे की घंटी बजा रहा है। सच यही है कि भारत का मानसून हमेशा से देश की कृषि, अर्थव्यवस्था और जल संसाधनों की जीवनरेखा रहा है लेकिन पिछले एक दशक में मानसून का स्वरूप तेजी से बदलता दिखाई दे रहा है। उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर जैसे…

बचपन के स्कूली जीवन में बरसात आने पर किश्तियां बना कर चलाने की यादें खत्म हो गईं। पहाड़ों पर भूस्खलन से लोगों के मरने की घटनाएं सुर्खियां बन रही हैं। मैदानी इलाकों में मानसून रूठ रहा है। वैज्ञानिक इसे जलवायु परिवर्तन बता रहे हैं लेकिन भारत के लिए प्रकृति का बदलाव एक गंभीर खतरे की घंटी बजा रहा है। सच यही है कि भारत का मानसून हमेशा से देश की कृषि, अर्थव्यवस्था और जल संसाधनों की जीवनरेखा रहा है लेकिन पिछले एक दशक में मानसून का स्वरूप तेजी से बदलता दिखाई दे रहा है। उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर जैसे पर्वतीय राज्यों में बार-बार बादल फटने, भूस्खलन और अचानक बाढ़ की घटनाएं सामने आ रही हैं। वहीं दूसरी ओर पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य भारत के कई मैदानी क्षेत्रों में सामान्य से कम वर्षा या लंबे सूखे अंतराल देखने को मिल रहे हैं। यह स्थिति बताती है कि अब बारिश समान रूप से नहीं हो रही, बल्कि बहुत कम समय में अत्यधिक वर्षा के रूप में हो रही है।
परिणाम यह है कि मानवीय नुक्सान हो रहा है जिसे रोकना होगा। मौसम का मिजाज बदल रहा है। वर्षा जरूरत से कम या ज्यादा हो रही है। यही स्थिति बादल फटने और फ्लैश फ्लड का कारण बनती है। दूसरी ओर, कई मैदानी क्षेत्रों तक पर्याप्त नमी नहीं पहुंच पाती या मानसून की हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं। परिणामस्वरूप कहीं अत्यधिक वर्षा और कहीं वर्षा की कमी देखने को मिलती है। प्राकृतिक संसाधनों विशेष रूप से पहाड़ों में छेड़छाड़ तथा समुद्र में नए-नए प्रयोग जलवायु को प्रभावित कर रहे हैं। हिमालय विश्व की सबसे युवा पर्वत शृंखलाओं में से एक है। यहां की चट्टानें अभी भी पूरी तरह स्थिर नहीं हैं। भारी वर्षा होने पर मिट्टी और चट्टानें आसानी से खिसक जाती हैं। यदि प्राकृतिक ढलानों के साथ छेड़छाड़ हो तो जोखिम कई गुना बढ़ जाता है। जम्मू-कश्मीर, हिमाचल, उत्तराखंड प्राकृतिक छेड़छाड़ में नए-नए प्रयोग जलवायु को प्रभावित कर रहे हैं। रिपोर्टें बताती हैं कि पिछले कुछ वर्षों में हिमालयी राज्यों में तेजी से सड़क निर्माण, सुरंगें, होटल, रिसॉर्ट और चारधाम जैसी बड़ी परियोजनाएं विकसित हुई हैं। विकास आवश्यक है लेकिन यदि पर्यावरणीय संतुलन की अनदेखी हो तो उसके गंभीर परिणाम सामने आते हैं। पहाड़ों की कटाई, विस्फोटकों का उपयोग, जंगलों की कटाई और नदी किनारों पर निर्माण कार्य मिट्टी की पकड़ कमजोर कर देते हैं। इसके बाद तेज वर्षा होने पर भूस्खलन की संभावना कई गुना बढ़ जाती है। बादल फटना वह स्थिति है जब बहुत छोटे क्षेत्र में कुछ ही घंटों या मिनटों के भीतर अत्यधिक वर्षा हो जाती है। इतनी तेज बारिश से पानी जमीन में समा नहीं पाता और तेज बहाव के साथ नीचे की ओर आता है। यही बहाव अपने साथ चट्टानें, मिट्टी, पेड़ और मलबा लेकर आता है जिससे बड़े पैमाने पर जान-माल का नुक्सान होता है।
हमने पूर्व में पहाड़ाें में हुए हादसों से कोई सबक नहीं लिया। मुझे यही लगता है कि बदलते जलवायु परिवर्तन के चलते वर्षा का वितरण बदल गया है। पहले कई दिनों तक मध्यम वर्षा होती थी जिससे खेतों को लगातार नमी मिलती थी। अब कई स्थानों पर कई दिनों तक बिल्कुल बारिश नहीं होती और फिर एक-दो दिन में जरूरत से ज्यादा वर्षा हो जाती है। यह भी देखा गया है कि जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश में कई बार मानसून की नमी और पश्चिमी विक्षोभ एक साथ सक्रिय हो जाते हैं। वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि हिमालय में तापमान बढ़ने से ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। इससे ग्लेशियर झीलों का आकार बढ़ रहा है। यदि इनमें से किसी झील का प्राकृतिक बांध टूट जाए तो अचानक बहुत बड़ी मात्रा में पानी नीचे की ओर आता है जिससे विनाशकारी बाढ़ और भूस्खलन हो सकते हैं।
जैसा कि हमने एक दशक पहले उत्तराखंड व हिमाचल में भी देखा। समाज और अर्थव्यवस्था पर प्रभाव बुरी तरह पड़ रहा है। इन प्राकृतिक आपदाओं का प्रभाव केवल पहाड़ों तक सीमित नहीं रहता। हजारों परिवार विस्थापित हो रहे हैं। सड़कें और पुल टूट रहे हैं। पर्यटन उद्योग प्रभावित हो रहा है। बिजली और संचार व्यवस्था बाधित होती है। किसानों की फसलें नष्ट हो जाती हैं। पेयजल स्रोत प्रभावित होते हैं। सरकारी राहत एवं पुनर्निर्माण पर भारी खर्च आता है। सवाल यह है कि क्या केवल जलवायु परिवर्तन जिम्मेदार है? जलवायु परिवर्तन एक प्रमुख कारण है लेकिन मानवीय गतिविधियां भी उतनी ही जिम्मेदार हैं। यदि संवेदनशील क्षेत्रों में वैज्ञानिक अध्ययन के बिना निर्माण कार्य किए जाएं, जंगल काटे जाएं, नदियों के प्राकृतिक प्रवाह में बाधा डाली जाए और पर्यावरणीय नियमों की अनदेखी की जाए तो प्राकृतिक आपदाओं का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। भारत को विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना जरूरी है तथा हिमालयी क्षेत्रों में वैज्ञानिक आधार पर निर्माण कार्य किए जाने चाहिए और बड़े पैमाने पर वनीकरण और प्राकृतिक वन संरक्षण होना चाहिए।
मेरा मानना है कि उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर व हिमाचल में बढ़ता भूस्खलन या बादल फटना इत्यादि यह बदलती जलवायु, अनियमित मानसून, हिमालय की संवेदनशील भूगर्भीय संरचना और मानवीय हस्तक्षेप का संयुक्त परिणाम है। संभलने का वक्त आ गया है।
सरकारों को इस दिशा में ठोस योजनाएं बनानी व लागू करनी होंगी। यदि समय रहते वैज्ञानिक योजना, पर्यावरण संरक्षण और जिम्मेदार विकास की नीति नहीं अपनाई गई तो भविष्य में ऐसी चरम मौसम घटनाएं और अधिक बार तथा अधिक तीव्रता से सामने आ सकती हैं। भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती अब केवल विकास नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ संतुलित विकास भी सुनिश्चित करना अनिवार्य है तथा इसे अच्छी नीयत और नीति के रूप में मान कर ही लागू करना होगा तभी इस प्राकृतिक खतरे से बचा जा सकता है।

Kiran Chopra