भारत, चीन व अमेरिका

पंजाब केसरी के डायरेक्टर आदित्य नारायण चोपड़ा

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के इकतरफा रवैये के चलते जिस प्रकार विश्व व्यवस्था (वर्ल्ड आर्डर) में बदलाव आ रहा है उससे अंतर्राष्ट्रीय मंच पर नये रणनीतिक व आर्थिक गठबन्धन बनने स्वाभाविक हैं। इस सन्दर्भ में भारत व चीन के आपसी सम्बन्धों का विशेष महत्व है क्योंकि ये दोनों ही देश एशिया की उभरती हुई ताकत हैं और विश्व की सबसे तेज गति से प्रगति करती अर्थ व्यवस्थाएं हैं। इनमें से चीन तो अब विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अमेरिका के बाद बन चुका है। अतः भारत व चीन के बीच यदि सहयोग बढ़ता है और विश्व की एक अन्य सामरिक ताकत रूस यदि साथ आता है तो विश्व में एेसी व्यवस्था कायम होने में सफलता मिल सकती है जिसमें अमेरिका के नवआर्थिक उपनिवेशवाद का मुकाबला किया जा सके। इसके साथ ही जिस प्रकार ब्रिक्स (भारत, रूस, ब्राजील व चीन तथा अफ्रीकी देशों का महागठबन्धन) काम कर रहा है उससे विश्व में शक्ति संतुलन की नई संभावनाएं बन सकती हैं क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प पूरी दुनिया को अपनी दादागिरी के तहत रखना चाहते हैं जिससे द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बने संयुक्त राष्ट्र संघ का अस्तित्व भी लगातार अप्रासंगिक होता जा रहा है। इन परिस्थितियों के बीच भारत को अपने राष्ट्रीय हितों का संरक्षण करना होगा और अपनी विकास करती अर्थव्यवस्था की गति को कायम रखना होगा।
इस सन्दर्भ में अगर हम भारत-चीन के बीच के आर्थिक व वाणिज्यिक सम्बन्धों को देखे तो दोनों देशों के बीच आर्थिक उदारीकरण का दौर शुरू होने के बाद व्यापार बहुत बढ़ा है और चीनी सस्ती टैक्नोलॉजी की बदौलत भारत के विभिन्न क्षेत्रों में उत्पादन भी बढ़ा है। भारत के साथ चीन का व्यापार हालांकि चीन के पक्ष में झुका हुआ है अर्थात हम चीन से जितनी मिकदार में आयात करते हैं उतना निर्यात नहीं कर पाते परन्तु इसके बावजूद चीन से आयात करके भारत अपना तैयार माल स्वदेश में बनाकर अन्य देशों को निर्यात करता है। बेशक इसमें जून 2020 के लद्दाख के गलवान घाटी संघर्ष के बाद कमी आई है और बहुत सी चीनी कम्पनियों पर भारत में निवेश करने पर प्रतिबन्ध भी लगा है परन्तु इस हकीकत के बावजूद भारत अभी भी चीन से बहुत आयात करता है जिसमें आवश्यक कच्चे माल से लेकर तैयार उत्पाद तक शामिल हैं जिनमें बिजली व इलैक्ट्रानिक सामान की बहुतायत है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत की स्वतन्त्रता के बाद से चीन के साथ हमारे सम्बन्ध खट्टे-मीठे रहे हैं जिन्हों दो काल खंडों में बांटा जा सकता है। पहला कालखंड 1962 से पहले का है जब चीन व भारत के बीच दोस्ती प्रगाढ़ थी और हिन्दी-चीनी, भाई- भाई के नारे लगा करते थे परन्तु 1962 में चीन ने भारत पर आकारण ही आक्रमण करके इस दोस्ती को तार-तार कर दिया और भारत के अक्साई चिन इलाके को अपने कब्जे में ले लिया। 1962 में चीन की फौजें भारत के असम राज्य के तेजपुर तक पहुंच गई थी। अंतर्राष्ट्रीय दबाव के चलते ये फौजें पीछे हटीं मगर चीन ने अक्साई चिन का इलाका दबा लिया जो अभी तक उसी के कब्जे में है। चीन का इस बारे में कहना रहा है कि वह भारत-चीन व तिब्बत के बीच 1914 में खिंची मैकमोहन रेखा को स्वीकार नहीं करता है क्योंकि उस समय ब्रिटिश सरकार ने तिब्बत को एक स्वतन्त्र देश मान कर यह रेखा खींची थी जबकि तिब्बत उसी का इलाका था। तिब्बत को स्वतन्त्र मानने की भारत की नीति भी 2003 तक रही मगर इस वर्ष केन्द्र की सत्तारूढ़ एनडीए सरकार के मुखिया स्व. अटल बिहारी वाजपेयी ने तिब्बत को चीन का स्वायत्तशासी अंग मानकर भारत के रुख में परिवर्तन किया और इसके बदले में चीन ने सिक्किम को भारत का अंग स्वीकार किया जिसका 1974 में भारतीय संघ में विलय हुआ था परन्तु चीन दोनों देशों के बीच की सीमा रेखा को अपनी अवधारणा के अनुसार ही मानता रहा और इसने 2003 के बाद भारत के राज्य अरुणाचल प्रदेश पर अपना अधिकार दिखाना शुरू कर दिया। इससे यह तो सिद्ध होता ही है कि दोनों देशों के बीच सीमा रेखा का मुद्दा अत्यधिक संवेदनशील है जिसे हल करने के लिए भी 2003 में एक योजना बनी और एक उच्चस्तरीय वार्तातन्त्र को स्थापित करने हेतु सहमति बनी। 2004 में केन्द्र में सत्तापलट होने पर डा. मनमोहन सिंह की सरकार स्थापित होने के बाद 2005 में यह वार्ता तन्त्र स्थापित हुआ जिसमें भारत की ओर से इसके राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार व चीन की ओर से उनके समकक्ष मन्त्री शामिल रहते हैं। तब से लेकर अब तक इस वार्ता तन्त्र की दो दर्जन से अधिक बैठकें हो चुकी हैं मगर नतीजा कोई नहीं निकला है। अतः दोनों देशों के बीच सम्बन्धों की प्रगाढ़ता इस बात पर भी निर्भर करती है कि सीमा विवाद कितनी जल्दी हल होता है और चीन का इस मामले में रवैया क्या रहता है। जहां तक दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग का सवाल है तो इसमें 1996 के बाद से लगातार वृद्धि हो रही है मगर 2020 के बाद इसमें शिथिलता आई लेकिन अब बदली परिस्थितियों में भारत महसूस कर रहा है कि चीन के साथ आर्थिक गतिविधियों को बढ़ना चाहिए और सीमा विवाद का हल करने की दिशा में भी समानान्तर रूप से आगे बढ़ा जाना चाहिए।
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण यह है कि भारत व चीन एेतिहासिक व सांस्कृतिक रूप से दो पड़ौसी देश हैं और दोनों की ही संस्कृतियां विश्व की पुरातन संस्कृतियां मानी जाती हैं। इन दोनों देशों के बीच यदि आर्थिक सम्बन्धों में प्रगाढ़ता आती है तो इससे दुनिया के विकासशील देशों की प्रगति का रास्ता खुलेगा। अतः जब 2006 की अपनी चीन यात्रा के दौरान तत्कालीन रक्षामन्त्री व पूर्व राष्ट्रपति भारत रत्न स्वर्गीय प्रणव मुखर्जी ने बीजिंग की धरती पर ही खड़े होकर यह कहा था कि ‘आज का भारत 1962 का भारत नहीं है’ तो स्पष्ट सन्देश यही था कि चीन बदली हुई क्षेत्रीय हकीकत को पहचानते हुए अपने रुख में परिवर्तन लाये और भारत के साथ सहयोग करते हुए ही आगे बढे़। हालांकि अब विश्व के 2006 जैसे हालात भी नहीं रहे हैं क्योंकि अमेरिका के रवैये से इनमें गुणात्मक परिवर्तन आता दिखाई पड़ रहा है और इन्हें देखते हुए ही भारत के नीति आयोग के सदस्य श्री राजीव गाबा ने कहा था कि चीन की कम्पनियों पर लगे निवेश अंकुश में ढील दिये जाने की जरूरत है क्योंकि पिछले कुछ समय से दोनों देशों के बीच व्यापारिक व नागरिक गतिविधियों पर लगे प्रतिबन्धों को खोला गया है।

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