पड़ोसी देश नेपाल की घरेलू राजनीति भारत के साथ उसके संबंधों में कई बार आड़े आती रही है। भारत और नेपाल में भी सीमा विवाद का अपना इतिहास जटिलताओं से मुक्त नहीं है। नेपाल के राजनीतिक दलों ने सीमा बिन्दुओं का राजनीतिक समाधान करने की बजाय अपने घरेलू राजनीतिक उद्देश्य पूरे करने के लिए इनका इस्तेमाल किया। सीमाओं के ऐतिहासिक महत्व को जानना भी जरूरी है। नेपाल में राजनीतिक उथल-पुथल के बाद बालेन शाह के नेतृत्व में नई सरकार बनी तो उससे उम्मीद की जा रही थी कि वह भारत के साथ मधुर संबंध स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ेगी लेकिन बालेन शाह ने लिपुलेख विवाद को हवा देकर राष्ट्रवादी कार्ड खेल दिया है। नेपाल के विदेश मंत्रालय ने कैलाश मानसरोवर की यात्रा के लिए लिपुलेख दर्रे के रास्ते के इस्तेमाल करने को लेकर आपत्ति जताई है। काठमांडौ ने इस संबंध में भारत और चीन दोनों के सामने विरोध दर्ज कराया है। नेपाल ने भारतीय राजदूत को इस मामले में तलब भी किया है। नेपाल के दावों को लेकर भारत ने भी सख्त रुख अपनाया है।
भारत का कहना है कि लिपुलेख दर्रा 1954 से कैलाश मानसरोवर का पुराना रास्ता रहा है और इस रास्ते से यात्रा दशकों से होती रही है। जहां तक इलाके के दावों की बात है भारत ने हमेशा कहा है कि ऐसे दावे न तो सही हैं और न ही ऐतिहासिक तथ्यों और सबूतों पर आधारित हैं। लिपुलेख दर्रे के दावों को इस तरह एकतरफा बनावटी तरीके से बढ़ाया नहीं जाना चाहिए। यद्यपि नेपाल और भारत ने बातचीत जारी रखने का फैसला किया है। नेपाल की सख्त प्रतिक्रिया के पीछे 1816 में की गई सुगौली की संधि है। 1816 की सुगौली संधि के साथ एंग्लो-नेपाल युद्ध खत्म हुआ था और इस क्षेत्र का नक्शा फिर से बनाया गया था। इस संधि के तहत काली नदी जिसे महाकाली भी कहा जाता है उसे नेपाल की पश्चिमी सीमा के रूप में स्थापित किया गया। 1990 के दशक से नेपाल का लगातार यही रुख रहा है कि इस नदी का उद्गम स्थल लिम्पियाधुरा है और इसलिए उस उद्गम स्थल के पूर्व में स्थित सारी जमीन, जिसमें कालापानी और लिपुलेख भी शामिल हैं नेपाल की है। ये तीनों क्षेत्र मिलकर पश्चिमी हिमालय के एक ऐसे हिस्से को कवर करते हैं जो रणनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है और नेपाल, भारत और तिब्बत के मिलन बिंदु पर स्थित है। नई दिल्ली का तर्क है कि इस नदी का असली उद्गम स्थल और भी पूर्व में लिपुखोला सहायक नदी के पास स्थित है। ऐसा होने पर कालापानी और लिपुलेख नेपाली क्षेत्र से बाहर हो जाएंगे। 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद भारतीय सैनिकों ने चीनी सीमा पर नजर रखने के लिए कालापानी घाटी में चौकियां स्थापित कीं और वे वहां से कभी नहीं हटे। दशकों बीतने के साथ-साथ यह क्षेत्र ‘विवादित’ से बदलकर केवल ‘प्रशासित’ क्षेत्र बन गया। भारत इसे अपना क्षेत्र मानता रहा जबकि नेपाल ने वर्षों तक इस मामले पर चुप्पी बनाए रखी।
नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्रियों पुष्प कमल दहल प्रचंड ने भी भारत-नेपाल संबंधों में तनाव के बीच यह मुद्दा उठाया था। बाद में के.पी. शर्मा ओली ने भी इस मुददे को काफी हवा दी। उन्होंने तो लिपुलेख दर्रे, लिम्पिया धुरा दर्रे और काला पानी क्षेत्रों पर नेपाल का दावा जताते हुए देश का नया मानचित्र भी जारी कर दिया था। भारत ने तब भी नेपाल के नए नक्शे को खारिज करते हुए नेपाल के दावे को बेबुनियाद बताया था और कहा था कि उसकी गतिविधियां पूरी तरह से भारतीय क्षेत्र के भीतर हैं। सन् 2020 में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह द्वारा धारचूला-लिपुलेख सड़क का उद्घाटन करने के बाद विरोध तेज हो गया। यह 80 किलोमीटर लंबी सड़क धारचूला के घटियाबगढ़ से शुरू होकर लिपुलेख में समाप्त होती है। नेपाल का दावा है कि यह सड़क उसके क्षेत्र से होकर गुजरती है। क्षेत्र को लेकर नेपाल में तनाव बढ़ गया। कुछ लोगों ने प्रधानमंत्री के.पी. ओली का पुतला जलाकर उन पर भारतीय परियोजना का मुकाबला करने के लिए समय पर कदम न उठाने का आरोप लगाया। नेपाल में कुछ लोगों ने प्रधानमंत्री ओली की इस बात के लिए आलोचना की कि वे शासन में अक्षमता या कोविड-19 से निपटने के अप्रभावी उपायों की आलोचनाओं को दबाने के लिए उग्र राष्ट्रवाद का सहारा ले रहे हैं। फिर भी, अधिकांश लोगों ने राष्ट्रवाद की आवाज का समर्थन किया और सरकार द्वारा उठाए गए कड़े कदमों की सराहना की।
नेपाल में िलपुलेख दर्रे का मुद्दा वहां की जनता के लिए भावनात्मक मुद्दा बन चुका है आैर सरकारों का ऐसे मुद्दों पर जनभावनाओं के िवपरीत जाना मुश्किल हो जाता है। दूसरी तरफ कैलाश मानसरोवर की यात्रा भारत की धर्म प्रेमी लोगों के लिए बहुत ही भावनात्मक और आस्थावान मुद्दा है। हर साल श्रद्धालुओं का जत्था कैलाश मानसरोवर की दुर्गम और कठिन यात्रा पर जाता है। इस बार बालेन शाह सरकार का अंदाज कुछ अलग है, क्योंकि उन्होंने भारत के साथ-साथ चीन को भी अपने लपेटे में ले लिया है। जबकि पहले के.पी. शर्मा आेली ने िसर्फ भारत से ही आपत्ति जताई थी और उन्होंने नेपाल को पूरी तरह से चीन की गोद में डाल दिया था। बालेन शाह ने इस संवेदनशील मुद्दे को उठाकर अपनी छवि को चमकाने का ही प्रयास िकया है, जो न तो ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित है और न ही न्याय संगत। कैलाश मानसरवर यात्रा में अडं़गा लगाकर उन्होंने कोई राजनीतिक परिपक्वता का परिचय नहीं दिया है। भारत से संबंधों में कड़वाहट पैदा कर नेपाल को नुक्सान ही होगा। देखना होगा कि आने वाले दिनों में क्या कोई कूटनयिक समाधान निकलता है और यात्रा क्या मोड़ लेती है।
भारत-नेपाल लिपुलेख विवाद
Summary :
पड़ोसी देश नेपाल की घरेलू राजनीति भारत के साथ उसके संबंधों में कई बार आड़े आती रही है। भारत और नेपाल में भी सीमा विवाद का अपना इतिहास जटिलताओं से मुक्त नहीं है। नेपाल के राजनीतिक दलों ने सीमा बिन्दुओं का राजनीतिक समाधान करने की बजाय अपने घरेलू राजनीतिक उद्देश्य पूरे करने के लिए इनका इस्तेमाल किया। सीमाओं के ऐतिहासिक महत्व को जानना भी जरूरी है। नेपाल में राजनीतिक उथल-पुथल के बाद बालेन शाह के नेतृत्व में नई सरकार बनी तो उससे उम्मीद की जा रही थी कि वह भारत के साथ मधुर संबंध स्थापित करने की दिशा में आगे…


Download Android App
Download iOS App



