जब ब्रिक्स 2026 में भारत ने जो दुनिया पर अपना सिक्का जमाया वो ट्रंप सहित पूरे विश्व ने देख लिया। मगर भारतीय फिल्मी गीतों का जो ठप्पा विदेशी नेताओं और पत्रकारों के द्वारा गाए गए गीतों का दिखाई दिया, उसका अपना जलवा ही कुछ अलग था। मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहीम ने जो 1965 कि बेहद लोकप्रिय फ़िल्म ‘तीन देवियां’ से, किशोर कुमार का -ख्वाब हो तुम या कोई हक़ीक़त, कौन हो तुम बतलाओ… देर से इतनी दूर खड़ी हो और क़रीब आ जाओ’ गीत गाकर जो समां बांधा और जो उनके लिए तालियां बजीं, वह तो इस ब्रिक्स का डोमिनो इफैक्ट था।
ऐसे ही ईरान के पत्रकार माजिद बक्सर ने -आ चल के तुझे मैं लेके चलूं, इक ऐसे गगन के तले जहां ग़म भी न हों, आंसू भी न हों, बस प्यार ही प्यार पले, गाया तो सब बाग-बाग हो गए। इंडोनेशिया की पत्रकार, फातिमा बसरी ने जब गीत -जब कोई बात बिगड़ जाए, जब कोई मुश्किल पड़ जाए, गाया तो भारतवासियों का सीना 56 इंच चौड़ा हो गया। असल में हमें नहीं पता कि हमारी फिल्मों के गीत और उर्दू शायरी कहां तक पहुंच जाती है। भारतीय संसद में भी अपने मुद्दों को ताकत से पेश करने के लिए इन गीतों का सहरा लिया जाता है, क्योंकि ये जनता की भावनाओं से जुड़े होते हैं।
पाठकों को पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पूर्व भाजपा सांसद सुषमा स्वराज की संसद में चली शायराना नोक-झोक का अंदाजा तो होगा ही। कहीं किसी के बचपन, लड़कपन तो कहीं किसी की जवानी से जुड़े रहते हैं। इसी प्रकार से कई अन्य देशों के पत्रकारों और अफसरों ने भी भारतीय सिनेमा के गीत गाकर इस बात की पुष्टि कर दी कि आज का भारत सर्वोपरि है। 18वां ब्रिक्स सम्मेलन ऐसे समय हुआ जब विश्व भू-राजनीतिक संघर्ष, व्यापार तनाव, प्रतिबंधों, ऊर्जा असुरक्षा और आपूर्ति शृंखला की चुनौतियों से गुजर रहा है।
इसलिए ब्रिक्स का महत्व केवल आर्थिक संगठन के रूप में नहीं बल्कि बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था और ग्लोबल साउथ की सामूहिक आवाज के मंच के रूप में बढ़ा है। नई दिल्ली ब्रिक्स शिखर सम्मेलन भारत की कूटनीतिक क्षमता और ग्लोबल साउथ में उसकी बढ़ती भूमिका का महत्वपूर्ण प्रदर्शन रहा। भारत ने एक ओर रूस, चीन, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात आदि जैसे अलग-अलग रणनीतिक हित रखने वाले देशों को एक मंच पर साथ रखने की कोशिश की, वहीं दूसरी ओर ब्रिक्स को ठोस आर्थिक, तकनीकी और मानवीय सहयोग की दिशा में आगे बढ़ाया।
नई दिल्ली घोषणापत्र ने ब्रिक्स की भविष्य की दिशा को सहयोग, बहुपक्षवाद, सतत् विकास और अधिक न्यायपूर्ण वैश्विक शासन से जोड़ा है। सम्मेलन में चीन को 2027 की ब्रिक्स अध्यक्षता के लिए समर्थन भी दिया गया। भारत की अध्यक्षता की प्रमुख उपलब्धियों में औद्योगिक सहयोग, स्टार्टअप, फोटोवोल्टिक उद्योग, लॉजिस्टिक्स और एमएसएमई सहयोग के लिए नए तंत्र शामिल रहे। भारत ने ब्रिक्स स्टार्टअप इनोवेशन फंड और ब्रिक्स इनक्यूबेटर नेटवर्क जैसे प्रस्ताव भी आगे बढ़ाए।
सम्मेलन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष पश्चिम एशिया की स्थिति रहा, उसे देखते हुए ईरान और यूएई दोनों ब्रिक्स के सदस्य होने के कारण इस मुद्दे पर आम सहमति बनाना चुनौतीपूर्ण था। नई दिल्ली घोषणापत्र ने क्षेत्र में बढ़ती हिंसा पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए अधिकतम संयम संवाद और कूटनीति का आह्वान किया भारत ने। जहां तक भारत-चीन संबंध की बात है, वहां भी बर्फ़ पिघली है, क्योंकि सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की महत्वपूर्ण बैठक हुई। दोनों नेताओं ने सीमा पर शांति को द्विपक्षीय संबंधों के विकास की आधारशिला माना तथा व्यापार, परिवहन, आर्थिक संबंधों और लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने पर चर्चा की।
यह बैठक भारत-चीन संबंधों में सावधानीपूर्वक सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण संकेत मानी गई। जहां तक आर्थिक सहयोग की बात है, इतपो ने आर्थिक सहयोग को और मजबूत करने पर जोर दिया है, विशेष रूप से स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, सीमापार भुगतान, निवेश, डिजिटल अर्थव्यवस्था और आपूर्ति शृंखलाओं को अधिक मजबूत बनाने पर चर्चा हुई। भारत ने ब्रिक्स को ऐसी व्यवस्था की ओर ले जाने की कोशिश की जिसमें विकासशील देशों की आर्थिक आवाज अधिक प्रभावी हो।
भारत ने अपनी अध्यक्षता को इन्सानियत पहले और जनता से जुड़ा दृष्टिकोण से संचालित किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अनुसार अध्यक्षता के दौरान 350 से अधिक बैठकें आयोजित हुईं और लगभग 30 भारतीय शहरों में ब्रिक्स से जुड़े कार्यक्रम हुए, जिनसे भारत का नाम रौशन हुआ है और पीएम मोदी का इन्सानियत का लक्ष्य उजागर हुआ है।


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