आज से एक साल पहले, 7 मई 2025 को भारत ने ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया, जिसने सिर्फ नीति की घोषणा से आगे बढ़कर उसे निर्णायक कार्रवाई में बदल दिया। यह भारत की धरती पर दशकों से जारी पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के खिलाफ जवाब देने के तरीके में बड़ा बदलाव था। कई मायनों में ऑपरेशन सिंदूर भारत के उस लंबे संघर्ष में एक अहम मिसाल बन गया जिसमें पाकिस्तान द्वारा गैर-राज्य तत्वों को प्रॉक्सी हिंसा के हथियार के रूप में इस्तेमाल करने का जवाब दिया गया। इस अभियान के पीछे भारत का राजनीतिक इरादा पूरी तरह साफ और अडिग था। 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में पाकिस्तान प्रशिक्षित आतंकियों के बर्बर हमले में 26 निर्दोष लोगों की मौत के बाद भारत की प्रतिक्रिया सिर्फ प्रतीकात्मक या सीमित नहीं थी। यह पूरी तरह योजनाबद्ध, समयबद्ध और स्पष्ट उद्देश्य वाली कार्रवाई थी। 88 घंटे तक चले इस अभियान ने साफ दिखाया कि भारत ने तय लक्ष्यों के साथ सुनियोजित जवाबी रणनीति अपनाई और अपने उद्देश्य पूरे करने के बाद अपनी शर्तों पर इसे समाप्त किया।
राजनीतिक और रणनीतिक नजरिए से इस अभियान की दो बातें खास तौर पर ध्यान देने योग्य हैं। पहली, हमलों का दायरा पहले से कहीं ज्यादा बड़ा था। लक्ष्य सिर्फ नियंत्रण रेखा के पार पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर तक सीमित नहीं रहे, बल्कि पाकिस्तान के पंजाब के अंदरूनी इलाकों तक पहुंचे। यह एक सोची-समझी रणनीतिक बढ़त थी, जिसने पाकिस्तान की कथित परमाणु सीमाओं और उसकी प्रतिरोधक नीति को सीधे चुनौती दी।
दूसरी, इस अभियान ने दिखाया कि आज के सूचना युग के युद्धों में तकनीक कितनी केंद्रीय भूमिका निभाती है। क्रूज़ मिसाइलों, लोइटरिंग हथियारों, नेटवर्क आधारित प्रणालियों और बहु-स्तरीय वायु एवं मिसाइल रक्षा तंत्र के इस्तेमाल ने साफ किया कि अब युद्ध सटीकता, तेज़ी और बेहतर समन्वित युद्धक्षेत्र समझ पर आधारित हैं। ऑपरेशन सिंदूर सिर्फ जवाबी कार्रवाई नहीं था, बल्कि यह भारत की उस नई युद्ध रणनीति का प्रदर्शन भी था, जिसमें दूर से मार करने की क्षमता, तेज़ निर्णय प्रक्रिया और कई मोर्चों पर एकीकृत कार्रवाई प्रमुख है।
7 मई 2025 को शुरू हुआ यह अभियान पाकिस्तान के भीतर मौजूद आतंकी ढांचे पर तेज़, सटीक और योजनाबद्ध कार्रवाई थी। यह भारत की समन्वित सैन्य क्षमता का नियंत्रित लेकिन बेहद प्रभावशाली प्रदर्शन था, जिसका मकसद दुश्मन पर कीमत थोपना था, बिना संघर्ष को बेवजह बढ़ाए। एक साल बाद, ऑपरेशन सिंदूर भारत की बढ़ती रणनीतिक परिपक्वता का प्रमाण माना जाता है-यानी परमाणु शक्ति से लैस दुश्मन को जवाबदेह ठहराने की क्षमता, वह भी स्पष्ट उद्देश्य, मजबूत इरादे और संतुलित रणनीति के साथ।
आज के कई युद्ध जहां लंबे और अनिर्णायक बन जाते हैं, वहीं ऑपरेशन सिंदूर स्पष्ट लक्ष्य और ठोस कार्रवाई के लिए अलग दिखा। इसका राजनीतिक उद्देश्य साफ था-आतंकवाद के ढांचे और उसे समर्थन देने वालों पर सीधी और ठोस चोट करना। लक्ष्य पूरा होते ही अभियान को सीमित रखा गया। टारगेट चुनने में भी संयम और दृढ़ता दोनों दिखे। लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और हिज्बुल मुजाहिदीन जैसे संगठनों से जुड़े अहम ठिकानों को निशाना बनाया गया, ताकि उनकी क्षमता कमजोर हो, लेकिन आम नागरिकों को नुकसान और अन्य सहायक क्षति न्यूनतम रहे।
सैन्य संचालन के स्तर पर यह अभियान भारत की दूर से सटीक हमला करने वाली युद्ध क्षमता के और परिपक्व होने का संकेत था। लंबी दूरी की क्रूज़ मिसाइलों और प्रिसिजन हथियारों से लैस राफेल, साथ ही ब्रह्मोस प्रणाली से जुड़े सुखोई एसयू-30एमकेआई जैसे प्लेटफॉर्म ने बड़े दायरे में गहराई तक समन्वित हमले संभव बनाए। पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर से आगे बढ़कर पाकिस्तान के पंजाब के भीतर तक कार्रवाई का विस्तार इस बात का संकेत था कि भारत ने अपनी पुरानी स्व-निर्धारित सीमाओं को पीछे छोड़ते हुए कथित सुरक्षित ठिकानों को भी चुनौती दी। इस अभियान की रक्षा व्यवस्था भी उतनी ही महत्वपूर्ण रही।
एकीकृत वायु और मिसाइल रक्षा प्रणालियों ने ड्रोन या मिसाइलों के जरिए किसी भी जवाबी हमले को प्रभावी ढंग से निष्फल कर दिया। आक्रामक मारक क्षमता और मजबूत रक्षात्मक सुरक्षा के इस मेल ने साफ दिखाया कि आधुनिक युद्ध में नेटवर्क आधारित समन्वय और बहु-स्तरीय सुरक्षा कितनी जरूरी हो चुकी है।
रणनीतिक सिद्धांत के स्तर पर ऑपरेशन सिंदूर ने एक साथ तीन अहम सीमाएं पार कीं। जिम्मेदार लक्ष्य चयन, संतुलित सैन्य बल का इस्तेमाल और स्पष्ट दबावकारी संदेश। इसने दिखाया कि जब कार्रवाई साफ राजनीतिक इरादे, सटीक सैन्य लक्ष्य और मजबूत प्रतिरोधक क्षमता के साथ की जाए तो दुश्मन को सज़ा दी जा सकती है बिना हालात को अनियंत्रित युद्ध में बदले। भारत ने युद्ध का दायरा पूरी तरह बढ़ाने के बजाय उसे सीमित लेकिन प्रभावी तरीके से फैलाया, जिससे पूर्ण युद्ध से बचते हुए भी दुश्मन पर ठोस कीमत थोपी गई।
इस अभियान की एक और बड़ी खासियत थी-तीनों सेनाओं के बीच बेहतर तालमेल और पूरे रक्षा तंत्र का एकीकृत संचालन। चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) की स्थापना के बाद विकसित नई रक्षा संरचना का असर साफ दिखा। समुद्री मोर्चा, वायु शक्ति और ज़मीनी लक्ष्य-ये अलग-अलग अभियान नहीं थे, बल्कि एक ही संयुक्त रणनीति के हिस्से थे।
इसे रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की बढ़ती ताकत ने और मजबूत बनाया। स्वदेशी प्लेटफॉर्म, सटीक हथियार प्रणालियां, काउंटर-ड्रोन तकनीक और आईएसआर (इंटेलिजेंस, सर्विलांस, रिकॉनिसेंस) जैसी घरेलू क्षमताओं की बढ़ती भूमिका ने दिखाया कि भारत धीरे-धीरे लेकिन मजबूती से रक्षा आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहा है। इस तरह ऑपरेशन सिंदूर सिर्फ सैन्य शक्ति का प्रदर्शन नहीं था, बल्कि भारत की औद्योगिक और तकनीकी गहराई का भी प्रमाण था। अब मजबूत रक्षा तैयारी सीधे देश की औद्योगिक क्षमता से जुड़ चुकी है।
कूटनीतिक स्तर पर भी यह अभियान बेहद सोच-समझकर चलाया गया। भारत ने अपनी कार्रवाई को आतंकवाद के खिलाफ जवाब और आत्मरक्षा के दायरे में रखकर पेश किया जिससे ऑपरेशन सिंदूर के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत नैतिक और रणनीतिक आधार बना। सैन्य कार्रवाई और कूटनीतिक संदेशों के बीच यह तालमेल भारत के लिए रणनीतिक स्पेस बनाए रखने में बेहद अहम साबित हुआ।
आखिरकार, ऑपरेशन सिंदूर की सबसे बड़ी खासियत उसका सही समय पर और स्पष्ट तरीके से समाप्त होना था। अपने लक्ष्य हासिल करने के बाद भारत ने तय समयसीमा के भीतर अभियान रोक दिया जिससे वह उन लंबे और दिशाहीन संघर्षों से बचा रहा जो आज कई आधुनिक युद्धों की पहचान बन चुके हैं। इसकी शुरुआत, संचालन और समापन, तीनों में दिखाई गई स्पष्टता और सटीकता ही इस अभियान की सबसे बड़ी पहचान रही।
एक साल बाद, ऑपरेशन सिंदूर की असली विरासत सिर्फ दुश्मन को हुए नुक्सान में नहीं, बल्कि उस नई मिसाल में है जो इसने कायम की। इसने दिखाया कि संतुलित, तकनीक से लैस और राजनीतिक नेतृत्व से निर्देशित सैन्य कार्रवाई दुश्मन पर भारी कीमत डाल सकती है, उसकी रणनीति बदल सकती है और फिर भी नियंत्रित दायरे में रह सकती है। यह परमाणु खतरे के बीच सीमित युद्ध के लिए भारत के उभरते मॉडल को दिखाता है- इरादों में मजबूत, कार्रवाई में सटीक और संयम में अनुशासित।
– रवि मुरुगन ,मेजर जनरल (सेवानिवृत्त)


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