ओवैसी को चारा डाल रही है बीजेपी?

Summary :

‘आइनों से कब मेरा इतना राब्ता था, उसकी गली में बस आना-जाना था आवाज़ देकर बुलाया उसने, वह मेरा चेहरा था, पर मैं उसे जानता न था’ असदुद्दीन ओवैसी के लिए यह नितांत निराला अनुभव था, सियासत कभी-कभी नए पेंचोखम में उलझा देती है। एक तरह से जब इस बात की तस्दीक हो गई कि संसद का इस बार का मानसून सत्र महज़ तीन हफ्तों का होगा और यह 20 जुलाई से प्रारंभ होकर 13 अगस्त को समाप्त हो जाएगा। तब जनाब ओवैसी हैदराबाद में अपने संसदीय क्षेत्र के दौरे पर थे तो उनके मोबाइल पर यकबयक घंटी बजी और…

‘आइनों से कब मेरा इतना राब्ता था, उसकी गली में बस आना-जाना था
आवाज़ देकर बुलाया उसने, वह मेरा चेहरा था, पर मैं उसे जानता न था’

असदुद्दीन ओवैसी के लिए यह नितांत निराला अनुभव था, सियासत कभी-कभी नए पेंचोखम में उलझा देती है। एक तरह से जब इस बात की तस्दीक हो गई कि संसद का इस बार का मानसून सत्र महज़ तीन हफ्तों का होगा और यह 20 जुलाई से प्रारंभ होकर 13 अगस्त को समाप्त हो जाएगा। तब जनाब ओवैसी हैदराबाद में अपने संसदीय क्षेत्र के दौरे पर थे तो उनके मोबाइल पर यकबयक घंटी बजी और ओवैसी यह देख कर हैरान रह गए कि फोन के दूसरी तरफ कोई और नहीं बल्कि स्वयं लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला थे। जनाब के हैरत का कोई ठिकाना नहीं था कि दूसरी ओर से आवाज गूंजी-‘इस वक्त कहां हैं आप, आपके साथ बैठ कर एक चाय पीने की इच्छा हो रही थी।’ ओवैसी ने जवाब दिया-‘जनाब अपने संसदीय क्षेत्र के दौरे पर हूं, आप हुक्म करें, कल ही दिल्ली हाजिर हो जाऊंगा।’ फिर दोनों नेताओं में बातचीत का सिलसिला चल पड़ा, सूत्रों की मानें तो दरअसल स्पीकर साहब को यह जानने में दिलचस्पी थी कि ‘अयोध्या के चढ़ावा चोरी’ के मुद्दे पर देश का मुसलमान क्या सोच रहा है।’ कहते हैं इस पर ओवैसी ने जवाब दिया-‘मुसलमान कोई अलग ग्रह का प्राणी नहीं है जनाब, वह भी वैसे ही सोचता है जैसा देश का कोई आम नागरिक या उसका हमवतन हिंदू सोचता है कि जो जगह खुदा की इबादत को बनी है वहां यह सब नहीं होना चाहिए था।’
कहते हैं स्पीकर साहब ने ओवैसी का हौसला बढ़ाते हुए कहा कि संसद में आपके बोलने का मैं भी कायल रहा हूं, वैसे भी आप एक बैरिस्टर रहे हैं, सो, बेहद नपा-तुला बोलते हैं, वह अलग बात है कि आपका रुझान एक धर्म विशेष के साथ है, फिर भी पूरा देश आपको सुनना चाहता है, सो मैं चाहता हूं कि इस बार आप सदन में विस्तार से बोलें, पूरा देश आपको सुनेगा। इस पर ओवैसी ने कहा-जनाब हमारे तो कुल दो ही सांसद हैं, हमें समय ही बहुत कम अलॉट होगा। स्पीकर ने कहा-इस बात की चिंता आप मुझ पर छोड़िए, दिल्ली आकर मिलिए, साथ चाय पीते हैं, गपशप लड़ाते हैं। अब इस मुलाकात के पीछे एक गूढ़ वज़ह है, दरअसल भाजपा अयोध्या के चढ़ावा चोरी मामले से खासी आहत है, अभी यह मामला ठंडा भी नहीं पड़ा था कि केदरनाथ और बद्रीनाथ धाम मंदिर में चढ़ावा चोरी का मुद्दा तूल पकड़ने लगा है।
सो, केंद्र नीत भाजपा सरकार धार्मिक स्थलों के चंदे में पारदर्शिता लाने के लिए एक नया कानून लाना चाहती है, जिसके तहत चाहे वह किसी भी धर्म की पूजा स्थली हो इसका संपूर्ण ऑडिट सरकार की निगरानी में होगा, ताकि एक-एक पैसे का हिसाब-किताब मिलाया जा सके। महाराष्ट्र के उत्साही मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस ने इस आशय का बिगुल भी फूंक दिया है, नासिक में 300 करोड़ का एक जमीन घोटाला सामने आया है जो एक क्रिश्चियन मिशनरी से जुड़ा मामला है और यह जमीन चर्च की बताई जाती है जिसे अवैध रूप से बेच दी गई है। अब फड़णवीस सरकार ऐसे मामलों की जांच के लिए कमेटियां बनाने को तत्पर हैं, फिर बकायदा इनके लेन-देन का ऑडिट भी किया जाएगा।
यूपी और कांग्रेस
यूपी जहां आने वाले कुछ महीनों में विधानसभा चुनाव आहूत है, इसको लेकर कांग्रेस में असहमतियों के स्वर उभरने लगे हैं। वैसे कांग्रेस पार्टी के अंदर यह एक मान्य अवधारणा है कि यहां के तमाम बड़े राजनैतिक फैसले कांग्रेस का एक कद्दावर नेता खुद लेता है। पर जब इस दफे यूपी में कांग्रेस प्रभारी बनाने की बारी आई तो ऐसी ही एक राय को दरकिनार रखते एक विवादास्पद चेहरे राजेंद्र पाल गौतम के हाथों यूपी की कमान सौंप दी गई। जबकि एक बड़े नेता की राय एक पुराने समर्पित कांग्रेसी नेता प्रमोद तिवारी के पक्ष में थी। तर्क था कि यूपी का ब्राह्मण इस वक्त भाजपा से खासा नाराज़ है, सो तिवारी के रूप में एक ब्राह्मण चेहरे को आगे करने से, ब्राह्मण समाज व अगड़े वोटरों की सहानुभूति कांग्रेस के साथ बढ़ेगी। प्रमोद तिवारी के अखिलेश यादव से बेहद निजी व प्रगाढ़ रिश्ते हैं, जो सपा से गठबंधन की स्थिति में फायदेमंद साबित हो सकते हैं, इसके अलावा प्रमोद तिवारी पार्टी के लिए चुनावी फंड जुटाने में भी सक्षम हैं।
वहीं एक अन्य बड़े नेता को हर वक्त घेरे रखने वाली मंडली ने उनके दिमाग में यह बात डाल दी है कि ‘कांग्रेस को दलित वोटरों पर पूरा दांव लगाना चाहिए, दलित इस वक्त ऊहापोह की स्थिति में हैं, मायावती से बहुत हद तक उनका मोह भंग हो चुका है और वे किसी नए आशियाने की तलाश में भटक रहे हैं।’ इसी मंडली ने बड़े नेता के समक्ष तर्क पेश किए कि 2014 के चुनाव में मायावती को 19.77 फीसदी दलितों के वोट मिले थे, जो 22 के विधानसभा चुनाव में घट कर 13 फीसदी रह गया और 2024 के लोकसभा चुनावों में तो दलितों ने (मायावती के सजातीय वोटरों को छोड़ कर) एक तरह से बहिन जी का साथ छोड़ ही दिया था, उनकी पार्टी बसपा को 24 के चुनावों में मात्र 9 फीसदी वोटों पर ही संतोष करना पड़ा। इस नेता के करीबी इसे एक मौके की तरह देखते हैं सो, उन्होंने चुपके से घाट-घाट का पानी पी आए दलित नेता राजेंद्र पाल का नाम आगे कर दिया, बड़े नेता की गलती यह रही कि उन्होंने इस नेता से पूछे बगैर इसे ‘हां’ भी कर दिया। अब इस नेता ने भी यूपी के मामलों में दिलचस्पी लेना बंद कर दिया है।
बांकीपुर का असली बांका कौन?
जब से भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने अपने घरेलू परिचित और भाजपा युवा मोर्चा के नेता अभिषेक कुमार बंटी को बांकीपुर की अपनी सीट से मैदान में उतारा था, तब से बांकीपुर के गली-गली में यह नारा शोर मच रहा था-‘अभिषेक बंटी, बांधेंगे गले में घंटी’ चंूकि दूसरी ओर मैदान में प्रशांत किशोर थे, जो अपनी राजनैतिक अस्मिता तलाशने की लड़ाई में उतरे हुए हैं, सो जाने-अनजाने यह सीट बेहद ‘हॉट सीट’ में शुमार हो गई है। यूं अचानक अभिषेक बंटी की जाने वह कौन सी घंटी बजी कि उन्होंने ऐन वक्त चुनाव लड़ने से ही मना कर दिया, अपने पारिवारिक कारणों का हवाला देते हुए उन्होंने प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी को एक चिट्ठी लिख दी। सो, भगवा पार्टी में भी तूफान आ गया, चूंकि उस रोज नबीन भी पटना में ही थे, सो आनन-फानन में नीरज कुमार सिन्हा के रूप में एक नया उम्मीदवार ढूंढा गया, ये भी भाजयुमो से ही सियासी सफर तय कर इस मुकाम तक पहुंचे हैं।
अब लगातार ये सवाल पूछे जा रहे हैं कि सबकी घंटी बजाने का इरादा रखने वाले बंटी को आखिर हुआ क्या? तो प्रशांत किशोर कैंप की ओर से दबे-छुपे इस बात का दावा हुआ कि अभिषेक बंटी के परिवार से जुड़े लोगों के चारा घोटाले में संलिप्तता और उसके दस्तावेज पीके के हाथ लग गए हैं। पर इस बारे में कोई भी कुछ खुल कर कहने को राजी नहीं, सो बात अब बंटी व पीके के दरम्यान की रह गई है।
‘चंदा चंपत’ मामले पर उदासीन भाजपा
पिछले दिनों भाजपा के एक बड़े नेता ने कम से कम पांच न्यूज चैनलों के संपादकों को अपने घर चाय पर आमंत्रित किया। इनमें से एक एडिटर की पैठ तो भाजपा में इस कदर है कि बड़े-बड़े भगवा नेताओं के भी वे कान काट लें। संपादकों संग चाय पर सर्वशक्तिमान ने अलग-अलग राजनैतिक मुद्दों पर बेहद विस्तार से चर्चा की। फिर बात चंदा चोरी या चंदा चंपत मामले पर आकर ठहर गई।
दरअसल, यह भाजपानिष्ठ संपादक जी का कहना था कि ‘इस मुद्दे को आखिरकार चैनल वाले बार-बार क्यों दिखा रहे हैं, क्यों इस बात को इतना तूल दे रहे हैं जबकि एसआईटी इस पर अपना काम कर रही है निष्पक्ष भाव से।’ फिर उन्होंने अपने न्यूज चैनल का हवाला देते हुए कहा कि उनके चैनल ने गरिमा का ध्यान रखते हुए इस मामले की रिपोर्टिंग की है, बाकी चैनलों को भी इसी परिपाटी का अनुसरण करना चाहिए। पर संपादक जी तब दंग रह गए जब बड़े नेता ने छूटते ही कह दिया कि ‘इस पूरे मामले से हमारी पार्टी का क्या लेना-देना, हम इसमें अपनी ज्यादा नाक भी नहीं घुसेड़ना चाहते, जांच एजेंसियां अपना काम कर रही हैं दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा, और जिन लोगों ने चोरी की है उन्हें उचित सजा भी मिलनी चाहिए तभी एक सही उदाहरण सामने रखा जा सकेगा। रही बात न्यूज़ रिपोर्टिंग की तो चैनलों को भी अपना काम उतनी ही मुस्तैदी से करना चाहिए।’ बड़े नेता का जवाब सुन कर भाजपा भजनी संपादक महोदय के होश ही फाख्ता हो गए।
…और अंत में
यह कहानी बिहार के एक सीनियर नेताजी की है, जिनकी भगवा रवानी का हर कोई कायल है। कभी ये बिहार सरकार में मंत्री थे, अब भाजपा सांसद हैं। सो, ये नेताजी जब भी ट्रेन के फर्स्ट क्लास कूपे में सफर करते थे इनके साथ हमसफर एक महिला होती थीं, जानने वाले सब यही जानते थे कि यह महिला कोई और नहीं बल्कि नेताजी की धर्मपत्नी हैं, सो सफर में उन्हें सम्मान भी बराबर का ही मिलता रहा है।
एक दिन इत्तफाक से नेताजी के साथ इनकी मुंहबोली नहीं अपितु असली वाली धर्मपत्नी सफर कर रही थीं, सफर पटना से दिल्ली का था। पटना से ट्रेन ने अभी कुछ ही दूरी तय की थी कि नेताजी को टॉयलेट जाना पड़ गया, इसी बीच टिकट चैकर आ धमका, उन्होंने कूपे के दरवाजे पर नॉक किया, अंदर प्रवेश किया तो देखा नेताजी के कूपे में एक अलग महिला है, सो उसने छूटते ही पूछ लिया-‘आप कौन?’ नेताजी की पत्नी ने बताया ‘मैं उनकी मिसेज’ इस पर टीटीई महोदय ठठाकर हंस पड़े, बोले-हमको बुड़बक समझती हैं, हम भाभी जी को पहचानते नहीं हैं, जो हमेशा साथ चलती हैं। फिर क्या था जब नेताजी टॉयलेट से लौट कर कूपे में आए तो फिर जो हंगामा बरपा कि उन्हें भाग कर फिर से अपने को टॉयलेट में ही बंद कर लेना पड़ा।

त्रिदीब रमण