भारतीय राजनीति में जाति एक अत्यंत प्रभावशाली और निर्णायक तत्व है जो चुनावी समीकरणों, राजनीतिक दलों की रणनीतियों और सामाजिक न्याय की दिशा को तय करता है। चुनाव जीतने के लिए जातियों को एकजुट करना राजनीतिक दलों की मुख्य रणनीति बन गई है। इसने भारत में वोट बैंक की राजनीति को जन्म दिया। 1990 के दशक में जब मंडल आयोग की मांगों के तहत पिछड़े वर्गों को सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में आरक्षण प्रदान किया गया तब भारतीय राजनीति में जाति की भूमिका तय करने वाली हो गई। इसके बाद जातीय समूहों ने अपने अधिकार, पहचान और प्रतिनिधित्व के लिए राजनीति में सक्रिय भागीदारी शुरू की, तब देश में अनेक जाति आधारित दलों का उदय हुआ। वर्तमान की राजनीति में जाति केवल एक सामाजिक पहचान नहीं रह गई बल्कि सत्ता की कुंजी बन गई है। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों से पहले राज्यसभा की 10 सीटों के लिए होने वाले चुनाव में समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी ने अपने-अपने जातीय समीकरण बैठा दिए हैं। भारतीय जनता पार्टी ने अपने 8 उम्मीदवारों की घोषणा के साथ ही 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए अपनी रणनीति को साफ कर दिया है।
भाजपा समाजवादी पार्टी के पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक यानि पीडीए राजनीति की काट सामने लेकर आई है और वह भी पीडीए सियासत को स्थापित करती दिखी है। भाजपा ने जिन 8 उम्मीदवारों के नाम का ऐलान किया है इसमें 3 ओबीसी जाति के आते हैं। वहीं 2 उम्मीदवार अनुसूचित जाति के हैं, 3 उम्मीदवार सामान्य श्रेणी के हैं, दो ब्राह्मण चेहरे हैं, एक उम्मीदवार क्षत्रीय ठाकुर वर्ग से है। योगी आदित्यनाथ सरकार में कैबिनेट मंत्री धर्मपाल सिंह, प्रकाशपाल, पूर्व सांसद और झारखंड के राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार की बेटी श्रुति गंगवार को उम्मीदवार बनाकर आेबीसी वर्ग को साधने का प्रयास किया है। राधाकांत ओझा और गोपी कृष्ण पांडे ब्राह्मण चेहरे हैं। प्रियंका सिंह रावत और विद्या सागर सोनकर दलित चेहरे हैं। जबकि राम प्रताप सिंह चौहान क्षत्रीय समुदाय से आते हैं। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव अपने दो उम्मीदवारों की घोषणा पहले ही कर चुके हैं। अखिलेश ने पार्टी के वरिष्ठ नेता राम गोपाल यादव जो कि यादव परिवार से ही हैं, को उम्मीदवार बनाया है। अखिलेश यादव ने रिलायंस समूह से जुड़े धनराज नाथवानी को उम्मीदवार बनाकर चौंकाया भी है।
जातियों की जकड़न की सियासी तिकड़मों के चलते कांग्रेस ने भी प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर ब्राह्मण चेहरे अराधना मिश्रा मोना को नियुक्त किया है। अराधना मिश्रा कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रमोद तिवारी की बेटी हैं। मुस्लिम वोट बैंक को लुभाने के लिए कांग्रेस ने इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया है। प्रदेश कांग्रेस में दो अन्य दलित चेहरों को भी जगह दी है। भाजपा अपने फैसलों से पहले भी चौंकाती रही है। उम्मीदवार घोषित किए जाने से पहले स्मृति ईरानी, केन्द्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी और बीएल वर्मा को उत्तर प्रदेश से दोबारा राज्यसभा भेजे जाने की सम्भावनाओं पर चर्चा हो रही थी लेकिन भाजपा ने सभी नए चेहरे उतार दिए हैं। हरदीप सिंह पुरी और बीएल वर्मा का केन्द्रीय मंत्रिमंडल से बाहर होना तय है, क्योंकि उनका राज्यसभा का कार्यकाल पूरा हो रहा है। मौजूदा विधानसभा के आंकड़ों के हिसाब से भाजपा अपने 8 उम्मीदवारों को जिताने की ताकत रखती है और समाजवादी पार्टी को दो सीटें मिल सकती हैं। पहले अखिलेश यादव तीसरे प्रत्याशी को उतारने का मन बना रहे थे लेकिन आंकड़ा न होने के चलते उन्होंने तीसरे प्रत्याशी को न उतारने का फैसला किया है। राज्यसभा चुनावों में क्रॉस वोटिंग की सम्भावनाएं हमेशा प्रबल रहती हैं। इसलिए विधायकों को एकजुट रखना बहुत जरूरी होता है। सभी दल एक-दूसरे के खेमे में सेंध लगाने की हर सम्भव कोशिश करते हैं। अब यह तय है कि अखिलेश यादव द्वारा तीसरा प्रत्याशी न उतारने की स्थिति में राज्यसभा की सभी 10 सीटों पर निर्विरोध निर्वाचन तय है।
अभी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के लिए और भी दांव-पेच खेले जाएंगे। राजनीतिक प्रक्रिया में जाति की भूमिका केवल पारम्परिक विचारधाराओं या समुदाय विशेष तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सम्पूर्ण लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित करती है। चुनावी रणनीति से लेकर नीतिगत तंत्र तक जातिगत राजनीति का लोकतंत्र के विपरीत स्वरूप भी सामने आता रहा है। भारत जैसे देश में जहां सामाजिक विविधता अत्यंत आवश्यक है वहीं यह जरूरी है कि राजनीतिक सहभागिता में संतुलन स्थापित किया जाए। जाति है कि जाती ही नहीं। राजनीतिक दलों को चाहिए कि वह जातिगत ध्रुवीकरण की राजनीति से हटकर समावेशी नीति निर्माण, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सामाजिक समरसता जैसे विषयों को चुनावी विमर्श का हिस्सा बनाएं तभी भारतीय लोकतंत्र अपनी पूर्ण परिपक्वता की ओर बढ़ सकेगा।
जातिगत समीकरणों का मकड़जाल
Summary :
भारतीय राजनीति में जाति एक अत्यंत प्रभावशाली और निर्णायक तत्व है जो चुनावी समीकरणों, राजनीतिक दलों की रणनीतियों और सामाजिक न्याय की दिशा को तय करता है। चुनाव जीतने के लिए जातियों को एकजुट करना राजनीतिक दलों की मुख्य रणनीति बन गई है। इसने भारत में वोट बैंक की राजनीति को जन्म दिया। 1990 के दशक में जब मंडल आयोग की मांगों के तहत पिछड़े वर्गों को सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में आरक्षण प्रदान किया गया तब भारतीय राजनीति में जाति की भूमिका तय करने वाली हो गई। इसके बाद जातीय समूहों ने अपने अधिकार, पहचान और प्रतिनिधित्व के…


Download Android App
Download iOS App



