पाकिस्तान की ओर से करतारपुर कॉरीडोर खोलने में बाधा

Summary :

पिछले कुछ दिनों से भारत में रहने वाले अनेक सिख नेताओं के बयान लगातार सामने आ रहे हैं, जिनमें वह भारत सरकार से श्री करतारपुर कॉरिडोर को जल्द से जल्द पूरी तरह सुचारू रूप से खोलने की मांग कर रहे हैं। श्रद्धालुओं की यह भावना पूरी तरह स्वाभाविक है, क्योंकि श्री करतारपुर साहिब प्रत्येक सिख की आस्था का केंद्र है, लेकिन इस पूरे विषय का एक ऐसा पक्ष भी है जिससे शायद नेताओं से लेकर आम श्रद्धालु परिचित ही नहीं हैं। वास्तविकता यह है कि करतारपुर कॉरिडोर के सुचारू संचालन में सबसे बड़ा रोड़ा भारत नहीं, बल्कि पाकिस्तान की नीतियां…

पिछले कुछ दिनों से भारत में रहने वाले अनेक सिख नेताओं के बयान लगातार सामने आ रहे हैं, जिनमें वह भारत सरकार से श्री करतारपुर कॉरिडोर को जल्द से जल्द पूरी तरह सुचारू रूप से खोलने की मांग कर रहे हैं। श्रद्धालुओं की यह भावना पूरी तरह स्वाभाविक है, क्योंकि श्री करतारपुर साहिब प्रत्येक सिख की आस्था का केंद्र है, लेकिन इस पूरे विषय का एक ऐसा पक्ष भी है जिससे शायद नेताओं से लेकर आम श्रद्धालु परिचित ही नहीं हैं।

वास्तविकता यह है कि करतारपुर कॉरिडोर के सुचारू संचालन में सबसे बड़ा रोड़ा भारत नहीं, बल्कि पाकिस्तान की नीतियां और उसका रवैया है जिसे वह बदलने को तैयार नहीं, उल्टा पाकिस्तान के द्वारा भारतीय हकूमत को आधार बनाकर इसके लिए उसे बदनाम किया जा रहा है। भारत की मोदी सरकार ने हमेशा सिख समुदाय की धार्मिक भावनाओं का सम्मान किया है। 2019 में कॉरिडोर खुलने से लेकर आज तक भारत की ओर से कभी यह संदेश नहीं दिया गया कि श्रद्धालुओं को दर्शन से रोका जाना चाहिए।

यहां तक कि कोविड-19 महामारी के कठिन दौर में भी भारत की मंशा कॉरिडोर को स्थायी रूप से बंद रखने की नहीं थी। इसके विपरीत, पाकिस्तान ने महामारी का हवाला देकर लंबे समय तक कॉरिडोर बंद रखा और हजारों श्रद्धालु अपने आराध्य स्थल के दर्शन से वंचित रहे, इसलिए यह धारणा बनाना कि कॉरिडोर के संचालन में भारत बाधक है, तथ्यों से मेल नहीं खाती। यदि पाकिस्तान वास्तव में श्री करतारपुर साहिब को विश्वभर के सिखों की आस्था का केंद्र मानता है तो उसे सबसे पहले अपनी नीयत स्पष्ट करनी होगी।

धार्मिक स्थल किसी भी प्रकार के राजनीतिक या वैचारिक प्रचार का माध्यम नहीं बनने चाहिए। दुर्भाग्य से गुरुद्वारा श्री करतारपुर साहिब परिसर के बाहर कांच के शोकेस में एक बम का खोल प्रदर्शित कर यह दावा किया जा रहा है कि 1971 के युद्ध में भारतीय सेना ने गुरुद्वारा साहिब को निशाना बनाया था। यह केवल एक विवादित ऐतिहासिक दावा नहीं, बल्कि श्रद्धालुओं के मन में भारत के प्रति नकारात्मक भावना पैदा करने का प्रयास भी प्रतीत होता है। यह भी याद रखना चाहिए कि 1965 और 1971 के युद्धों के दौरान सीमा के दोनों ओर गोलाबारी हुई थी। भारतीय सीमा में स्थित डेरा बाबा नानक और उसके आसपास के क्षेत्रों में भी पाकिस्तानी गोले गिरे थे, लेकिन भारत ने कभी उन घटनाओं को आधार बनाकर यह प्रचार नहीं किया कि पाकिस्तान ने ऐतिहासिक गुरुद्वारों को निशाना बनाया था।

युद्ध की घटनाओं को दशकों बाद धार्मिक प्रचार का माध्यम बनाना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या किसी गुरुद्वारे का उद्देश्य श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक शांति देना है या उनके मन में उनके अपने ही देश के प्रति नफरत पैदा करना? गुरुघर की मर्यादा राजनीति और प्रोपेगैंडा से कहीं ऊपर होती है, यदि पाकिस्तान वास्तव में करतारपुर कॉरिडोर को शांति और भाईचारे का प्रतीक बनाना चाहता है, तो उसे इस प्रकार की विवादित प्रदर्शनी को तत्काल हटाना चाहिए। श्रद्धालु वहां गुरु नानक देव जी के दर्शन के लिए जाते हैं, किसी राजनीतिक कथा का हिस्सा बनने के लिए नहीं। एक और गंभीर प्रश्न उस शुल्क को लेकर भी है जो दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालुओं से लिया जाता है।

संभवतः दुनिया का यह पहला और एकमात्र गुरुद्वारा साहिब है, जहां श्रद्धालुओं को केवल दर्शन करने के लिए शुल्क देना पड़ता है। पाकिस्तान अपने नागरिकों से नाममात्र की राशि लगभग 125 रुपये लेता है, जबकि विदेशी श्रद्धालुओं, विशेषकर भारतीयों, से लगभग 1,800 रुपये के बराबर शुल्क वसूला जाता है। यह व्यवस्था न केवल धार्मिक समानता की भावना के विपरीत है, बल्कि गुरु नानक देव जी की उस शिक्षा के भी विरुद्ध है, जिसमें किसी भी व्यक्ति के साथ भेदभाव का स्थान नहीं है। आज आवश्यकता इस बात की है कि करतारपुर कॉरिडोर को राजनीतिक संदेशों और भारत-विरोधी प्रोपेगैंडा से मुक्त रखा जाए।

यदि पाकिस्तान वास्तव में सिख श्रद्धालुओं की भावनाओं का सम्मान करता है, तो उसे सबसे पहले गुरुद्वारा परिसर से विवादित बम के खोल की प्रदर्शनी हटानी चाहिए, दर्शन पर लगाए गए शुल्क को समाप्त करना चाहिए और यह विश्वास दिलाना चाहिए कि करतारपुर केवल श्रद्धा का केंद्र रहेगा। खालिस्तानियों का भारत के टुकड़े का सपना कभी पूरा नहीं होगा : एक बार फिर विदेश की धरती पर तथाकथित ‘‘खालिस्तान रेफरेंडम’’ और ‘‘खालिस्तान कार रैली’’ के नाम पर भारत की एकता और अखंडता को चुनौती देने की कोशिश की जा रही है, मगर यह समझना अति आवश्यक है कि यह अभियान भारत के करोड़ों सिखों की आवाज़ नहीं, बल्कि कुछ अलगाववादी तत्वों का राजनीतिक एजेंडा है।

ऐसे लोगों को यह भ्रम छोड़ देना चाहिए कि वह भारत के सिख समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं। सच्चाई यह है कि भारत का सिख कभी खालिस्तान की मांग नहीं करता। सिखों ने इस देश की आज़ादी, सुरक्षा और विकास में अपना अमूल्य योगदान दिया है। गुरु तेग बहादुर जी ने धर्म और मानवता की रक्षा के लिए अपना शीश न्यौछावर किया। गुरु गोबिंद सिंह जी ने अन्याय के विरुद्ध खालसा पंथ की स्थापना की। यदि कुछ लोग विदेशों में बैठकर भारत को तोड़ने के सपने देख रहे हैं तो उन्हें यह भी देखना चाहिए कि पाकिस्तान में सिखों की स्थिति क्या है, वहां सिखों की आबादी बेहद सीमित रह गई है, उनके धार्मिक स्थलों पर समय-समय पर हमलों और अतिक्रमण की खबरें आती रहती हैं और विरासत को सुरक्षित रखने की चुनौती बनी हुई है।

यदि किसी को वास्तव में अलग देश बनाने का इतना ही शौक है तो भारत की एकता पर हमला करने के बजाय वह उन क्षेत्रों में अपने विचारों की व्यावहारिकता साबित करे, जहां स्वयं सिख समुदाय का अस्तित्व और विरासत गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है। कुलदीप सिंह की नियुक्ति से जगी जमीनी कार्यकर्ताओं में नई उम्मीद: राजनीति में संदेश कई बार भाषणों से नहीं, बल्कि नियुक्तियों से दिए जाते हैं। दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग में पार्टी के पुराने और समर्पित कार्यकर्ता कुलदीप सिंह को सदस्य और उनके साथ निर्मल जैन को चेयरमैन बनाए जाने को भी केवल एक नियुक्ति मानना शायद जल्दबाजी होगी। इसे संगठन के भीतर एक ऐसे संकेत के रूप में देखा जा रहा है, जो वर्षों से उपेक्षित महसूस कर रहे जमीनी कार्यकर्ताओं के लिए उम्मीद की नई किरण लेकर आया है।

लंबे समय से राजनीतिक दलों, विशेषकर राष्ट्रीय दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह रही है कि उन्होंने संगठन की रीढ़ कहे जाने वाले कार्यकर्ताओं को अक्सर उतना महत्व नहीं दिया, जितना देना चाहिए था। चुनाव आते ही दूसरे दलों से आए नेताओं के लिए टिकटों के दरवाजे खुल जाते हैं। संगठनात्मक नियुक्तियों में भी अक्सर उन्हीं चेहरों को प्राथमिकता मिलती है, जिनकी राजनीतिक उपयोगिता तत्काल दिखाई देती है। ऐसे में वर्षों तक पार्टी का झंडा उठाने वाले कार्यकर्ता खुद को हाशिए पर खड़ा पाते हैं। यही कारण है कि कुलदीप सिंह की नियुक्ति को एक अलग नजरिए से देखा जा रहा है।

Team Desk