देश के तीन राज्यों बिहार, मध्य प्रदेश व गुजरात की एक- एक विधानसभा सीट पर हुए चुनावों के परिणामों से एक बार पुनः सिद्ध हो गया है कि लोकतन्त्र भारत के लोगों की शिराओं में दौड़ता है और कोई भी राजनीतिक पार्टी भारत के मतदाताओं को अपने समर्थन की गारंटी के रूप में नहीं देख सकती है। स्वतन्त्रता के बाद भारत ने जिस संसदीय लोकतन्त्र को चुना था उसके केन्द्र में इसके लोगों की राजनीतिक बुद्धिमत्ता ही थी जिस पर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को इतना भरोसा था कि उन्होंने 1928 में स्वतन्त्रता आन्दोलन के दौरान ही कह दिया था कि भारत के लोग अनपढ़ और गरीब हो सकते हैं मगर वे मूर्ख नहीं हैं। गांधी को भारत के ग्रामीणों के व्यावहारिक या दुनियावी ज्ञान पर पूरा भरोसा था इसीलिए उन्होंने इसी वर्ष यह भी कह दिया था कि आजाद होने पर भारत संसदीय प्रणाली का एेसा लोकतन्त्र अपनाएगा जिसमें इसके हरेक स्त्री-पुरुष को बिना किसी जाति या धर्म अथवा समुदाय के भेदभाव के एक वोट का बराबर का अधिकार होगा जिसकी कीमत एक समान होगी।
महात्मा गांधी की इस दूरदृष्टि पर स्वतन्त्रता के बाद से भारत के लोग सदा खरे उतरे हैं और उन्होंने लोकतन्त्र को हर हाल में जिया है और सिद्ध किया है कि इस प्रणाली में वे ही पूरी व्यवस्था के मालिक हैं और राजनीतिक तन्त्र के एेसे रचनाकार हैं जिसमें उनकी ही इच्छा अन्तिम फलदायी होती है और वे किसी भी राजनीतिक वाद या विमर्श के गुलाम होकर नहीं रह सकते। बिहार की बांकीपुर सीट पर हुए उपचुनाव में राज्य व केन्द्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी की करारी पराजय बताती है कि लोकतन्त्र में समय और परिस्थितियों का लोगों पर गहरा प्रभाव पड़ता है और कोई भी चुनाव क्षेत्र कभी भी किसी भी पार्टी का गढ़ नहीं होता। वह केवल उस क्षेत्र के मतदाताओं का ही गढ़ होता है। इसके साथ ही राष्ट्रीय फलक पर जिन राजनीतिक परिस्थितियों का निर्माण होता है उनका प्रभाव देश के हर भाग पर पड़ता है। इस सन्दर्भ में मैं थोड़ा इतिहास में जाना चाहता हूं। बिहार राज्य को भारत विशेषकर उत्तर-पश्चिम भारत की राजनीति की नब्ज समझा जाता है। इसकी मुख्य वजह यह है कि इस प्रदेश के लोग गरीब होने के बावजूद राजनीतिक रूप से बहुत जागरूक समझे जाते हैं। ये समकालीन राजनीतिक परिस्थितियों की तह में जाने की अपूर्व क्षमता भी रखते हैं। इसके प्रमाण में कई घटनाएं गिनाई जा सकती हैं।
1971 में जब स्व. इन्दिरा गांधी की नई कांग्रेस ने लोकसभा चुनावों में भारत के तत्कालीन संयुक्त विपक्ष को बुरी तरह धूल चटा दी थी तो उसके लगभग डेढ़ वर्ष बाद ही बिहार की ‘बांका’ लोकसभा सीट का उपचुनाव हुआ जिसमें समाजवादी नेता स्व. मधुलिमये उम्मीदवार थे। इस उपचुनाव में उन्होंने कांग्रेस प्रत्याशी को बुरी तरह परास्त कर दिया। इससे 1971 के बाद की बनी राजनीतिक परिस्थितियां परिलक्षित हुईं क्योंकि 1972 में ही भारतीय जनसंघ के नेता डाॅ. मुरली मनोहर जोशी ने इन्दिरा जी के खिलाफ यह नारा बुलन्द कर दिया था कि ‘वोट हमारा, राज तुम्हारा–नहीं चलेगा, नहीं चलेगा’। यह नारा इस सन्दर्भ में दिया गया था कि 1971 में इन्दिरा गांधी की नई कांग्रेस के प्रत्याशियों को देश के गरीब-गुरबों का भारी समर्थन मिला था और उनके सत्तारूढ़ होने के बाद भारत के पूंजीपति उनके चक्कर काटने लगे थे। इन्दिरा जी तब ‘गरीबी हटाओ’ के नारे पर सवार होकर सत्ता में आयी थीं। इसके बाद मध्य प्रदेश की जबलपुर लोकसभा सीट पर 1974 के शुरू में उपचुनाव हुआ। यह सीट कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सेठ गोविन्द दास की सीट थी जो उनके निधन से खाली हुई थी। इस सीट पर तब विपक्ष ने संयुक्त रूप से समाजवादी युवजन सभा के छात्र नेता स्व. शरद यादव को खड़ा कर दिया और वह कांग्रेस को भारी बहुमत से हरा कर विजयी घोषित हुए। यह भी राष्ट्रीय स्तर पर निर्माणाधीन तत्कालीन परिस्थितियों का ही परिणाम था।
हम जानते हैं कि 1974 में जय प्रकाश नाराय़ण का आन्दोलन शुरू हुआ जो कि गुजरात के छात्र आन्दोलन का वृहद स्वरूप था। मगर कांग्रेस ने इससे कोई सबक नहीं लिया और 25 जून,1975 को देश में इमरजेंसी लागू कर दी जिसकी परिणिती 1977 में इसके शासन की समाप्ति के रूप में हुई। परन्तु वर्तमान में केन्द्र में भाजपा की श्री नरेन्द्र मोदी की सरकार है जिसे अपनी त्रुटियों में सुधार करने में महारथ हासिल है। इसका प्रमाण यह है कि 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा की सीटें 303 से घट कर 240 रह गईं मगर इसके बाद जिस भी राज्य में विधानसभा चुनाव हुए उसमें इसने विपक्ष को करारी शिकस्त दी चाहे वह महाराष्ट्र हो या हरियाणा अथवा बिहार। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि भाजपा परिमार्जन करते हुए राजनीतिक परिस्थितियों को बदलने का मादा रखती है। बेशक बिहार की बांकीपुर सीट इसके राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की पुश्तैनी सीट थी जो 1995 से उनके परिवार के कब्जे में थी। यह सीट बिहार की राजधानी पटना के संभ्रान्त समझे जाने वाले इलाके में पड़ती है जिसमें राज्य सचिवालय से लेकर एेतिहासिक गांधी मैदान तक का क्षेत्र आता है। अतः इस सीट पर पराजय का सन्देश हम किसी जाति- बिरादरी की सीमा में नहीं बांध सकते हैं और यही भाजपा के लिए चिन्ता का सबसे बड़ा कारण है। परन्तु भाजपा मध्य प्रदेश में दतिया सीट भी कांग्रेस प्रत्याशी से हार गई है। इसका कारण भाजपा के भीतर की गुटबाजी भी बताया जा रहा है जो हार का एक पक्ष ही है। मगर गुजरात में भाजपा प्रत्याशी ने कांग्रेस प्रत्याशी को जमकर धूल चटाने में सफलता अर्जित की है अतः कहा जा सकता है कि इस राज्य में भाजपा की लोकप्रियता बरकरार है मगर यहां भी इसके वोट 75 प्रतिशत से घटकर 64 प्रतिशत हुए हैं। इस सबका निष्कर्ष यही निकाला जा सकता है कि लोकतन्त्र की मालिक जनता सभी पार्टियों को सचेत कर रही है कि वे अपनी चाल संभालें। इस सन्दर्भ में दिल्ली में चल रहे संसद के सत्र की बहकी-बहकी चाल को भी संज्ञान में लिया जाना चाहिए।
उपचुनावों का प्राथमिक सन्देश
Summary :
देश के तीन राज्यों बिहार, मध्य प्रदेश व गुजरात की एक- एक विधानसभा सीट पर हुए चुनावों के परिणामों से एक बार पुनः सिद्ध हो गया है कि लोकतन्त्र भारत के लोगों की शिराओं में दौड़ता है और कोई भी राजनीतिक पार्टी भारत के मतदाताओं को अपने समर्थन की गारंटी के रूप में नहीं देख सकती है। स्वतन्त्रता के बाद भारत ने जिस संसदीय लोकतन्त्र को चुना था उसके केन्द्र में इसके लोगों की राजनीतिक बुद्धिमत्ता ही थी जिस पर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को इतना भरोसा था कि उन्होंने 1928 में स्वतन्त्रता आन्दोलन के दौरान ही कह दिया था कि…



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