सर्वशक्तिमान नहीं रहा अमेरिका

Summary :

ईरान से युद्ध के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का रवैया बड़बोलेपन का ही रहा है। वे कभी कूटनीति तो कभी ध्यान भटकाने वाले बयान देकर सुर्खियां बटोरते रहे। कई बार उनके बयानों का असली अर्थ समझना भी मुश्किल साबित हुआ। एक बात तो स्पष्ट है कि युद्ध बयानों से नहीं जीते जा सकते। दुनिया में सर्वशक्तिमान होने का दावा करने वाले ट्रंप की छवि को बहुत नुक्सान पहुंचा है और अवधारणाओं की जंग में वह फिलहाल पिछड़ते दिखाई दे रहे हैं। यह बात अब हर किसी की जुबां पर है कि अमेरिका अब सुपर पावर नहीं रहा। इसमें कोई…

ईरान से युद्ध के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का रवैया बड़बोलेपन का ही रहा है। वे कभी कूटनीति तो कभी ध्यान भटकाने वाले बयान देकर सुर्खियां बटोरते रहे। कई बार उनके बयानों का असली अर्थ समझना भी मुश्किल साबित हुआ। एक बात तो स्पष्ट है कि युद्ध बयानों से नहीं जीते जा सकते। दुनिया में सर्वशक्तिमान होने का दावा करने वाले ट्रंप की छवि को बहुत नुक्सान पहुंचा है और अवधारणाओं की जंग में वह फिलहाल पिछड़ते दिखाई दे रहे हैं। यह बात अब हर किसी की जुबां पर है कि अमेरिका अब सुपर पावर नहीं रहा। इसमें कोई शक नहीं कि अमेरिका ने ईरान को बहुत आर्थिक नुक्सान पहुंचाया है मगर अमेरिका को भी कोई कम नुक्सान झेलना नहीं पड़ा। अमेरिका के मित्र खाड़ी देशों को लगातार ईरान नुक्सान पहुंचा रहा है। ईरान के साथ युद्ध में अमेरिका की कोई स्पष्ट रणनीति दिखाई नहीं दी। इसकी वजह यह है कि राष्ट्रपति ट्रंप ने कई बार बड़े सैन्य कदम उठाने के संकेत तो दिए लेकिन बाद में वे पीछे हट गए।
ट्रंप ने एक बार फिर कलाबाजी खाते हुए ईरान पर हमलों को रोकने का ऐलान किया है और कहा कि ईरान से बातचीत आगे बढ़ रही है आैर होर्मुज स्ट्रेट को पूरी तरह से खोलने पर सहमति बन चुकी है। ट्रंप ने उम्मीद जताई है कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर एक अलग समझौता होगा। ईरान को कुछ ही घंटों में तबाह करने की धमकियां देने वाले ट्रंप अब यह कह रहे हैं कि वह लोगों को मारना नहीं चाहते क्योंकि युद्ध में बहुत से लोग मरते हैं। हाला​ंकि यह भी सच है कि सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और कतर ने अमेरिका से आर्मी एक्शन रोकने को कहा है। पश्चिमी मीडिया से छन-छन कर आ रही खबरें बताती हैं कि ट्रंप ने ईरान के खतरनाक प्लान के डर से हमले रोक दिए हैं। रिपोर्टों में कहा जा रहा है कि अगर अमेरिका ईरान पर आर्मी एक्शन करता तो ईरान ने एक ऐसा प्लान बना रखा है जो पूरी दुनिया को तेल संकट में धकेल सकता है। ईरान खाड़ी देशों के तेल कुओं को निशाना बना सकता है। ईरान की आईआरजीसी पहले ही सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और कतर के अहम तेल और गैस ठिकानों को निशाना बनाने को तैयार है।
लिस्ट में दुनिया का सबसे बड़ा पारंपरिक तेल क्षेत्र घवार, अबकैक तेल प्रसंस्करण संयंत्र और खुरैस ऑयल फील्ड शामिल हैं। ये तीनों सऊदी अरब के तेल उत्पादन के प्रमुख केंद्र हैं। संयुक्त अरब अमीरात में ईरान ने कथित तौर पर जाकुम और ऑयल फील्ड व रुवैस रिफाइनरी को संभावित निशाना बना सकता है। कतर का नॉर्थ फील्ड दुनिया का सबसे बड़ा नेचुरल गैस फील्ड है। रास लफ्फान औद्योगिक परिसर, दुनिया में एलएनजी निर्यात का एक बड़ा केंद्र है। ये भी इस कथित सूची में शामिल बताया जाता है। अभी यह कहना जल्दबाजी होगा कि ट्रंप ने ईरान पर हमले क्यों टाल दिए। यह भी साफ नहीं है कि ईरान के विदेश मंत्री की तुर्की, सऊदी अरब और पाकिस्तान के वरिष्ठ अधिकारियों से बातचीत के दौरान ईरान ने क्या भरोसे दिए होंगे। पिछले कुछ हफ्तों से होर्मुज स्ट्रेट को लेकर तनातनी इसलिए बढ़ रही थी कि जून में हुए समझौते में बहुत कुछ अस्पष्ट था। अमेरिका ने ईरान के साथ मिलकर जहाजों को दक्षिणी तट के पास से गुजरने की व्यवस्था की ताकि वह ईरान की पहुंच से बाहर रहे। यहीं से तनाव बढ़ना शुरू हुआ। ईरान होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों के टोल वसूलने पर अड़ा हुआ है। होर्मुज का रास्ता व्यापार के साथ वैश्विक स्थिरता और शांति के लिए भी अहम है। कई देशों के हित यहां से जुड़े हैं। विकास के लिए निर्बाध ऊर्जा आपूर्ति सबसे जरूरी शर्त है। ऐसे में अगर कोई देश होर्मुज पर नियंत्रण बढ़ाने की कोशिश करता है, तो इससे टकराव बढ़ने की आशंका रहेगी। समुद्री कानून का सबसे पुराना और व्यापक रूप से स्वीकार किया जाने वाला सिद्धांत है – फ्रीडम ऑफ नेविगेशन सन 1609 में डच विधिवेत्ता ह्यूगो ग्रोटियस ने इसे प्रस्तुत किया था और आज के अन्तर्राष्ट्रीय समुद्री कानूनों की यही बुनियादी अवधारणा है। भारत का भी हमेशा से रुख रहा है कि अन्तर्राष्ट्रीय जल मार्गों से मुक्त व्यापार होना चाहिए। किसी एक देश का वर्चस्व बाकी सभी के खिलाफ होगा। स्थायी शांति के लिए जरूरी है कि होर्मुज पहले की तरह ही आजाद रहे।
पश्चिम एशिया में स्थायी शांति के लिए दोनों पक्षों को संयम से काम लेना होगा वर्ना टकराव लंबा होने से ईरान की भी हालत बिगड़ेगी और ट्रंप भी पहले से कमजोर पड़ते जाएंगे। यूरोप के साथी उनसे पहले ही दूर हो चुके हैं। पश्चिम एशिया में भी अमेरिकी कूटनीति अब तक नाकाम रही है। ईरान को भी पूरी दुनिया से जुड़ने की जरूरत है और उसे अपने आर्थिक हितों की भी रक्षा करनी होगी। बेहतर यही होगा कि वह परमाणु कार्यक्रम तैयार कर होर्मुज स्ट्रेट को पूरी दुनिया के लिए मुक्त करें।

Aditya Chopra

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