भारत में महिलाओं के लिए सार्वजनिक स्थानों पर पृथक, सुरक्षित और स्वच्छ शौचालयों की कमी एक गंभीर समस्या है, लेकिन प्राय: लोग इसके बारे में खुलकर बात नहीं करते। अक्सर इसे छोटी या सामान्य समस्या मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। जबकि यह मुद्दा महिलाओं के स्वास्थ्य, सुरक्षा, सम्मान और मौलिक अधिकारों से गहराई से जुड़ा हुआ है। यह समस्या सिर्फ शहरों तक सीमित नहीं है, बल्कि गांवों में हालात और भी खराब हैं। सार्वजनिक स्थानों पर महिला शौचालयों की कमी और उनकी बदहाली महिलाओं को बीमार बना रही है। विडंबना यह है कि शौचालय निर्माण की दिशा में काफी काम होने के बावजूद महिलाओं से जुड़ा यह संकट कम नहीं हुआ है।
बीते दिनों सुप्रीम कोर्ट में एक मामले की सुनवाई के दौरान प्रधान न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने देशभर में जिला व निचली अदालतों में चार सप्ताह के भीतर जहां भी जरूरत हो वहां तुरंत शौचालय निर्माण शुरू कराने के निर्देश दिए हैं। इसी से समस्या की गंभीरता को समझा जा सकता है। सार्वजनिक शौचालयों की कमी यों तो सभी से जुड़ी समस्या है लेकिन महिलाओं के लिए तो इनकी उपलब्धता को अनिवार्यता ही माना जाना चाहिए। देश के महानगरों मुंबई, दिल्ली, चेन्नई, अहमदाबाद, लखनऊ, चंडीगढ़ और बेंगलुरु आदि तमाम शहरों में संख्या के हिसाब से महिलाओं के लिए सार्वजनिक शौचालय की कमी खुला तथ्य है। महानगरों में यदि मॉल्स को छोड़ दिया जाए तो बड़ी दुकानों या भरे बाजारों में भी सार्वजनिक शौचालय की व्यवस्था नहीं होती।
हाल के वर्षों में भारत भर में करोड़ों शौचालयों के निर्माण के लिए सरकार के प्रयासों के बावजूद, सड़क किनारे सामान बेचने, निर्माण और कृषि जैसे अनौपचारिक क्षेत्रों में काम करने वाली महिला श्रमिकों को अभी भी सुरक्षित और स्वच्छ शौचालयों की सुविधा प्राप्त करने में कठिनाई होती है। कुछ अनुमानों के अनुसार, भारत के 5 करोड़ स्ट्रीट वेंडरों में से एक तिहाई महिलाएं हैं, और अनौपचारिक निर्माण श्रमिकों में 30 प्रतिशत महिलाएं हैं। इन श्रमिकों के लिए, अपने ठेले या निर्माण स्थल से समय निकालकर शौच के लिए सुरक्षित स्थान ढूंढना उनके उत्पादन में कमी और मजदूरी के नुकसान का जोखिम पैदा करता है। यह समस्या कृषि क्षेत्र तक भी फैली हुई है, जहां महिलाओं को अक्सर मजदूर और फसल काटने वाली के रूप में काम पर लगाया जाता है।
सरकारी शिक्षण संस्थाओं से लेकर अन्य महकमों तक में महिला शौचालय न होने के समाचार और जानकारियां प्रकाश में आती रहती हैं। कई सरकारी और ग्रामीण स्कूलों में आज भी लड़कियों के लिए अलग शौचालय नहीं हैं, जिसके कारण पीरियड्स के दौरान छात्राएं स्कूल छोड़ देती हैं या अनुपस्थित रहती हैं। नीति आयोग की दो माह पहले जारी रिपोर्ट में यह चिंताजनक खुलासा किया गया था कि देश के 98552 सरकारी स्कूलों में लड़कियों के लिए पृथक शौचालय नहीं है। जबकि 61 हजार से ज्यादा सरकारी स्कूलों में जो शौचालय हैं, वे उपयोग योग्य नहीं है।
सरकारी दफ्तर हों या फिर सरकारी महकमे अथवा सरकारी स्कूल। सब जगह महिला शौचालयों की उपलब्धता जरूरी है। मुख्य बाजारों व दूसरे सार्वजनिक स्थलों पर यह सुविधा न होने पर महिलाएं कितना असहज महसूस करती होंगी, यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। महिलाओं की सुरक्षा, कार्यस्थल पर समान व्यवहार और समान वेतन तथा विधायिकाओं में भी उनके पर्याप्त प्रतिनिधित्व की मांग को लेकर तो बातें खूब होती हैं लेकिन उनकी गरिमा व सेहत से जुड़ी इस मूलभूत जरूरत की लगातार अनदेखी की जाती रही है। जहां शौचालय बने भी हैं, वहां पानी की कमी, टूटे दरवाजे, अंदर से लॉक न होना और बिजली की व्यवस्था न होना बड़ी समस्याएं हैं। जिन सरकारी कार्यालयों में अलग-अलग शौचालय की व्यवस्था है भी, वहां पर उनको साफ-सुथरा रखने की व्यवस्था नहीं है। सार्वजनिक बुनियादी ढांचे को डिजाइन करते समय महिलाओं की जैविक और व्यावहारिक ज़रूरतों जैसे सैनिटरी पैड बदलने या डिस्पोजल की सुविधा को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। असल में, शौचालय केवल सुविधा का विषय नहीं है, बल्कि एक बुनियादी आवश्यकता है जो मानवाधिकारों का एक पहलू है।
संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उचित स्वच्छता तक पहुंच को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी गई है, जो जीने और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देता है। हालांकि मोदी सरकार की पहल से ‘स्वच्छ भारत अभियान’ के तहत घरों और कई सार्वजनिक स्थानों पर बड़े पैमाने पर शौचालयों का निर्माण हुआ है, लेकिन अभी भी शहरी और भीड़भाड़ वाले इलाकों में सुधारों की सख्त ज़रूरत है। सरकार ने महिलाओं को सार्वजनिक स्थलों पर यौन उत्पीड़न एवं हिंसा से सुरक्षा प्रदान करने और उनके स्वास्थ्य व गरिमा को अक्षुण्ण रखने के लिए सुरक्षित और निजी स्वच्छता सुविधाओं से युक्त पिंक टॉयलेट उपलब्ध कराने की पहल की है, जहां सेनेटरी वेंडिंग मशीन और महिला केयरटेकर होती हैं। मार्च 2022 में, केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने सभी सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों और वित्तीय संस्थानों को महिला बैंक कर्मचारियों के लिए अलग शौचालय उपलब्ध कराने के लिए आवश्यक कदम उठाने को कहा था। डॉक्टर बताते हैं कि पृथक और साफ शौचालय न होने से खासतौर से महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए बहुत नुकसानदेह हैं। गंदा शौचालय का इस्तेमाल, पर्याप्त पानी ना पीना या देर तक पेशाब को रोक कर रखना महिलाओं के मूत्र प्रणाली में संक्रमण का खतरा पैदा करता है। महिलाएं बाहर होने पर पानी पीना कम कर देती हैं या लंबे समय तक यूरीन रोककर रखती हैं, जिससे किडनी और पेट से जुड़ी बीमारियां होती हैं। यह ऐसी समस्या है जिसका सामना करीब आधी महिलाओं की आबादी कम से कम एक बार जरूर करती है। वहीं संयुक्त या असुरक्षित शौचालयों के कारण महिलाओं को मानसिक तनाव और सुरक्षा जैसे छेड़खानी या यौन उत्पीड़न का डर बना रहता है।
सुप्रीम कोर्ट ने कोई पहली बार अदालतों में महिला शौचालयों की कमी की ओर ध्यान दिलाया हो ऐसा नहीं है। साल भर पहले भी राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया गया था कि वे शौचालयों के निर्माण व रखरखाव के लिए पर्याप्त धनराशि आवंटित करें। तब भी ऐसे ही मामले की सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया था कि कई अदालतों में तो महिला जजों तक के लिए पृथक शौचालय नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट के सेंटर फॉर रिसर्च एंड प्लानिंग द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट “स्टेट ऑफ द जुडिशरी : रिपोर्ट ऑन इंफ्रास्ट्रक्चर, बजटिंग, ह्यूमन रिसोर्सेज एंड आईसीटी” में कहा गया है कि देश के केवल 6.7 फीसदी जिला न्यायालय परिसरों में मौजूद शौचालय ही महिलाओं के अनुकूल हैं, जबकि देश के 19.7 फीसदी जिला न्यायालयों में महिलाओं के लिए अलग शौचालय की व्यवस्था नहीं है। रिपोर्ट के मुताबिक कभी-कभी, शौचालय न्यायिक अधिकारियों के कक्षों से जुड़े नहीं होते हैं, जिसकी वजह से पुरुष और महिला दोनों न्यायाधीशों को साझा शौचालय का उपयोग करना पड़ता है। ताजा मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि फंड की कमी की कोई दलील सुनी नहीं जाएगी। विभिन्न राज्यों के उच्च न्यायालयों ने स्थानीय प्रशासन को सार्वजनिक स्थानों और बाज़ारों में महिलाओं के लिए अनिवार्य रूप से सुरक्षित और स्वच्छ शौचालय बनाने के आदेश दिए हैं।
महिला गरिमा की दिशा में सुप्रीम निर्देश
Summary :
भारत में महिलाओं के लिए सार्वजनिक स्थानों पर पृथक, सुरक्षित और स्वच्छ शौचालयों की कमी एक गंभीर समस्या है, लेकिन प्राय: लोग इसके बारे में खुलकर बात नहीं करते। अक्सर इसे छोटी या सामान्य समस्या मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। जबकि यह मुद्दा महिलाओं के स्वास्थ्य, सुरक्षा, सम्मान और मौलिक अधिकारों से गहराई से जुड़ा हुआ है। यह समस्या सिर्फ शहरों तक सीमित नहीं है, बल्कि गांवों में हालात और भी खराब हैं। सार्वजनिक स्थानों पर महिला शौचालयों की कमी और उनकी बदहाली महिलाओं को बीमार बना रही है। विडंबना यह है कि शौचालय निर्माण की दिशा में काफी…



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