पाकिस्तान के कब्जे में कश्मीर का जो हिस्सा है, वहां पाकिस्तानी सेना के जुल्म के किस्सों से मेरा हृदय छलनी हुआ जा रहा है, पिछले दो महीनों के भीतर केवल रावलकोट में ही डेढ़ सौ से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं। हजारों लोगों को गिरफ्तार किया गया है, पीओके में पाकिस्तानी फौज ने क्रूरता की सारी हदें पार कर दी हैं और वहां के लोगों का गुनाह क्या है? वे चाहते हैं कि जिस तरह की समृद्ध जिंदगी भारतीय कश्मीर में लोग जी रहे हैं, वैसी ही जिंदगी उन्हें भी मिले, उतनी न भी मिले तो कम से कम जरूरत भर रोटी और अंधेरा दूर करने के लिए बिजली तो मिले। मगर उन्हें मिल रही हैं पाकिस्तानी फौज की गोलियां और गंदी गालियां।
पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर यानी पीओके और भारतीय कश्मीर में बस कुछ पहाड़ों और नदियों का फासला है, पाकिस्तान यात्रा के दौरान मैंने पीओके जाने की इच्छा जताई थी लेकिन मुझसे कहा गया कि पर्याप्त वक्त नहीं है। मगर मेरे पाकिस्तानी दोस्तों ने बताया कि उस पूरे इलाके को प्रकृति ने जन्नत जैसी खूबसूरती बख्शी है, जिस रावलकोट में पाकिस्तानी फौज खून बहा रही है, उस इलाके को पर्ल वैली यानी मोतियों की घाटी के नाम से भी पुकारा जाता है। मगर पाकिस्तानी फौज ने उसे जहन्नुम बना दिया है, यूं तो पूरे पाकिस्तान में ही महंगाई ने गदर मचा रखा है लेकिन पीओके के साथ पूरी तरह से सौतेला व्यवहार किया जा रहा है। जरूरत के अनुरूप आटा और रसोई गैस तक नहीं पहुंचता। गांवों में कई दिनों तक बिजली नहीं रहती, जबकि पीओके के मैंगला डैम और नीलम-झेलम हाइड्रो प्रोजेक्ट से पाकिस्तान रौशन हो रहा है।
पीओके और भारतीय कश्मीर के बीच बहुत से ऐसे इलाके हैं जहां नदी के किनारे खड़े होकर दूसरी ओर का नजारा यूं ही देखा जा सकता है, लोग देखते हैं कि भारतीय कश्मीर के गांव रौशन हैं और उनके यहां अंधेरा छाया है तो अपनी किस्मत से शिकवा और भारत के साथ रहने की चाहत स्वाभाविक रूप से पैदा होती है। उन्हें पता है कि पाकिस्तानी आतंकवादी उपद्रव के बावजूद भारतीय कश्मीर विकास, सुख और शांति की राह पर आगे बढ़ रहा है। अनुच्छेद 370 समाप्त होने के बाद स्थिति और बेहतर हुई है, कश्मीर घाटी में वंदे भारत ट्रेन तक पहुंच चुकी है। चिनाब नदी पर दुनिया का सबसे ऊंचा रेल ब्रिज बन चुका है जबकि पीओके में रेलवे नेटवर्क ही नहीं है।
मगर पीओके के लोग करें क्या? फिलहाल वे रोटी, बिजली और फौज का जुल्म खत्म करने की मांग कर रहे हैं लेकिन वास्तव में वे भारत में विलीन होना चाहते हैं। भारत की अपनी कूटनीतिक मजबूरियां हैं मगर चाहत पक्की है कि पीओके भारत का हिस्सा बन जाए। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और योगी आदित्यनाथ ऐसी मंशा व्यक्त भी कर चुके हैं। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने तो पीओके को भारत के घर का ही एक ऐसा कमरा बताया है जिस पर बाहरियों ने कब्जा कर लिया है और जिसे एक न एक दिन वापस ले लिया जाना तय है। जम्मू-कश्मीर विधानसभा में पीओके के लिए 24 सीटें भी आरक्षित रखी गई हैं। भारत हर इंसान को बेहतर जिंदगी जीने का हक देने के लिए मानवीयता को उच्च प्राथमिकता देता है। ऐसे में यदि उनके मन में भारत के साथ आ जाने की व्याकुलता है तो इसमें किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
पाकिस्तान इस बात को अच्छी तरह से समझता भी है इसलिए वह लगातार ऐसी हरकतें करता रहता है कि भारत को डिस्टर्ब किया जाए। उसके साथ ऐसी ताकतें भी शामिल हैं जिनमें भारत की उन्नति से भविष्य के लिए खौफ पैदा हो रहा है। इसी खौफ का नतीजा है कि भारत के खिलाफ नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका, मालदीव जैसे देशों का इस्तेमाल करने की कोशिश की गई। नेपाल में जेन-जी ने मंसूबे पर पानी फेर दिया और नेपाल को चीन की छाया से बाहर निकाल लिया। श्रीलंका हमारा दोस्त है लेकिन चीन ने चूंकि उसे पैसा दिया है, इसलिए दबाव में रखने की कोशिश करता है। यानी जो राजनीति गांवों में चलती है, वही दुनिया के स्तर पर भी चलती है, मगर इन ताकतों को यह समझ लेना चाहिए कि आज का भारत दूरदृष्टि और पक्के इरादे वाला भारत है। हम पहलगाम का जवाब ऑपरेशन सिंदूर से देना जानते हैं।
क्या कुछ स्वादिष्ट खिचड़ी पक रही !
पिछले महीने बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने जब यह कहा कि दिसंबर तक वे अपने देश लौट सकती हैं तो लोग अचंभित हो गए । हसीना को तो फांसी की सजा सुनाई जा चुकी है, वे लौटेंगी तो क्या उन्हें फांसी नहीं दे दी जाएगी? मगर जो दिखता है, वही हमेशा होता नहीं है। कट्टरपंथियों ने सपना देखा था कि बांग्लादेश में सरकार बना लेंगे लेकिन अमेरिका के सहयोग से हमारी कूटनीति कामयाब रही और तारिक रहमान बांग्लादेश आ गए और प्रधानमंत्री भी बन गए। मगर वक्त की दो जरूरतें हैं, एक तो विपक्ष का झंडा कट्टरपंथियों के हाथ से छीनना जरूरी है और दूसरा यह कि पाकिस्तान के सहयोग से दुनिया के आतंकी संगठनों ने बांग्लादेश में जो टेरर कैंप चला रखे हैं, उन्हें पूरी सख्ती से नष्ट करना है। हसीना को इसका अच्छा अनुभव है, उनके जमाने में बहुत से आतंकियों को फांसी पर लटकाया गया था। बस असली खेल यही है, खिलाड़ियों ने कमर कस ली है। संभव है कि हसीना बांग्लादेश लौटें और कट्टरपंथियों के सफाये में सहयोगी बन जाएं। राजनीति और कूटनीति में कुछ भी, कभी भी असंभव नहीं होता और हां, हमारे विदेश मंत्री एस. जयशंकर और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल इन दिनों कुछ खास कार्यों में ज्यादा व्यस्त दिख रहे हैं। मुझे नहीं पता कि जयशंकर ने हाल के दिनों मिडिल ईस्ट के देशों की यात्राएं क्यों की हैं, मगर ऐसा लगता है कि कुछ तो खिचड़ी पक रही है, फिलहाल तो इंतजार कीजिए।
मोतियों की घाटी में मौत का मंजर क्यों ?
Summary :
पाकिस्तान के कब्जे में कश्मीर का जो हिस्सा है, वहां पाकिस्तानी सेना के जुल्म के किस्सों से मेरा हृदय छलनी हुआ जा रहा है, पिछले दो महीनों के भीतर केवल रावलकोट में ही डेढ़ सौ से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं। हजारों लोगों को गिरफ्तार किया गया है, पीओके में पाकिस्तानी फौज ने क्रूरता की सारी हदें पार कर दी हैं और वहां के लोगों का गुनाह क्या है? वे चाहते हैं कि जिस तरह की समृद्ध जिंदगी भारतीय कश्मीर में लोग जी रहे हैं, वैसी ही जिंदगी उन्हें भी मिले, उतनी न भी मिले तो कम से कम…



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