क्या हमने भुला दिया है, मुंशी प्रेमचंद को?

Summary :

हाल ही में मुंशी प्रेमचंद (31 जुलाई 1880, 8 अक्टूबर 1936) का 90वां जन्म दिवस था, मगर खेद का विषय यह था कि लगभग सभी ने उन्हें भुला दिया है, सिवाय राष्ट्रीय उर्दू भाषा विकास परिषद के, जिसके द्वारा बड़ी ही भावभीनी श्रद्धांजलि उन्हें उर्दू में दी गई। यूं तो वे उर्दू और हिंदी, दोनों में ही लिखा करते थे। हिंदी और उर्दू साहित्य के वे ऐसे महान कथाकार थे, जिन्होंने भारतीय समाज की वास्तविक तस्वीर को अपनी रचनाओं में जीवंत रूप से प्रस्तुत किया। उन्होंने कभी भी हिंदुओं और मुस्लिमों को अलग नहीं समझा बल्कि भारत नामी दुल्हन की…

हाल ही में मुंशी प्रेमचंद (31 जुलाई 1880, 8 अक्टूबर 1936) का 90वां जन्म दिवस था, मगर खेद का विषय यह था कि लगभग सभी ने उन्हें भुला दिया है, सिवाय राष्ट्रीय उर्दू भाषा विकास परिषद के, जिसके द्वारा बड़ी ही भावभीनी श्रद्धांजलि उन्हें उर्दू में दी गई। यूं तो वे उर्दू और हिंदी, दोनों में ही लिखा करते थे। हिंदी और उर्दू साहित्य के वे ऐसे महान कथाकार थे, जिन्होंने भारतीय समाज की वास्तविक तस्वीर को अपनी रचनाओं में जीवंत रूप से प्रस्तुत किया। उन्होंने कभी भी हिंदुओं और मुस्लिमों को अलग नहीं समझा बल्कि भारत नामी दुल्हन की दो ख़ूबसूरत आंखों की तरह ही समझा।
प्रेमचंद का प्रगाढ़ विश्वास था कि जो साहित्य समाज की जटिल समस्याओं को लेकर उनके समाधान को प्रस्तुत न करें, वह अस्तित्वहीन है। प्रेमचंद का वास्तविक नाम धनपत राय श्रीवास्तव था। उन्होंने प्रारंभ में ‘नवाब राय’ और बाद में ‘प्रेमचंद’ नाम से लेखन किया। प्रेमचंद का जन्म उत्तर प्रदेश के वाराणसी के निकट लमही गांव में हुआ। राष्ट्रीय उर्दू भाषा विकास परिषद के अध्यक्ष, डॉ. शम्स इक़बाल ने अपने व्याख्यान में बताया कि आर्थिक कठिनाइयों और पारिवारिक संघर्षों के बावजूद उन्होंने शिक्षा प्राप्त की और अध्यापक के रूप में कार्य किया।
बाद में प्रेमचंद ने स्वतंत्र रूप से साहित्य सृजन को अपना जीवन समर्पित कर दिया। उनकी रचनाओं का मूल उद्देश्य समाज में व्याप्त गरीबी, शोषण, जातिगत भेदभाव, किसान और मज़दूर की पीड़ा, स्त्रियों की स्थिति तथा नैतिक मूल्यों को उजागर करना था। वे मानते थे कि साहित्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने का माध्यम है। प्रेमचंद की इन सभी बातों का बखान राष्ट्रीय उर्दू भाषा विकास परिषद के अंतर्गत की गई संगोष्ठी में डॉ. संतोष मुखर्जी, प्रो. सगीर इफ्राहीम, प्रो. शहज़ाद अंजुम और प्रो. साहिरा ने प्रेमचंद के जीवन के हर पहलू पर प्रकाश डाला।
इसलिए उन्हें ‘उपन्यास सम्राट’ भी कहा जाता है। उनके अन्य प्रमुख उपन्यासों में गोदान, सेवासदन, रंगभूमि और कर्मभूमि विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। उनकी अन्य प्रसिद्ध कहानियों में पूस की रात, नमक का दारोगा, दो बैलों की कथा और ठाकुर का कुआं, आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी अपने समय में थीं। इन रचनाओं में कुछ तो बात है कि विश्व की लगभग सभी भाषाओं में अनुवाद हुआ है, बताते हैं शम्स इक़बाल।
यदि हम उनकी मात्र एक कहानी ‘ईदगाह’ का गूढ़ अध्ययन करें तो पता चलता है कि किस प्रकार से समाज में फैली ग़रीबी का उन्होंने दिल को छू जाने वाला चित्रण किया है। उसके दो पात्र हामिद और उसकी दादी हैं। ईद वाले दिन जब तवे पर रोटी सेंकते समय दादी का हाथ जल जाता है तो हामिद को बड़ी तकलीफ होती है। जब दादी हामिद को ईदी के पैसे देती हैं कि वह मिठाई खा ले या खिलौने खरीद ले। पैसे लेकर मेले में जाता है और बावजूद नाना प्रकार के प्रलोभनों से ऊपर उठ एक लोहे का सामान बेचने वाले के पास जा कर एक चिमटा ले आता है कि रोटी को तवे पर पलटते समय उनका हाथ न जले। एक ओर ईद की रंगीनियों का उल्लेख और दूसरी ओर हामिद के मन में चल रहे द्वंद्व को न केवल भली भांति दर्शाया है, बल्कि दादी की कृतज्ञ निगाहों को भी शब्दों की कूची से रंगा है।
प्रेमचंद हिंदी और उर्दू दोनों भाषाओं के समान रूप से समर्थ लेखक थे। उन्होंने भारतीय संस्कृति, सांप्रदायिक सौहार्द और मानवीय मूल्यों को अपनी रचनाओं में विशेष स्थान दिया। उनके साहित्य में गरीब, किसान, दलित, स्त्री और वंचित वर्ग की आवाज़ स्पष्ट रूप से सुनाई देती है।
आज उनकी रचनाएं केवल साहित्य का हिस्सा नहीं, बल्कि भारतीय समाज का ऐतिहासिक और नैतिक दस्तावेज़ मानी जाती हैं। मुंशी प्रेमचंद का साहित्य हमें संवेदनशील, न्यायप्रिय और मानवीय बनने की प्रेरणा देता है। उनकी लेखनी आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणास्रोत बनी रहेगी। हमारे शिक्षा तंत्र को चाहिए कि प्रेमचंद को पुनर्जीवित करे। जय हिंद !

फिरोज बख्त अहमद