तो क्या लाहौर आज भारत का अंग होता?

लाहौर

भारत विभाजन को 8वां दशक पूरा होने को है लेकिन सवालों के बेताल अभी भी कंधों पर सवार रहते हैं। वर्ष 2026 की 16वीं अगस्त को 80वां वर्ष प्रारंभ हो जाएगा। नए-नए पृष्ठ खुलने लगते हैं। लगता है यह सिलसिला जारी रहेगा। कारण यही है कि यह विभाजन कृत्रिम था। केवल कुछ गिने-चुने राजनीतिज्ञों की महत्वाकांक्षाओं से ऊपज़ी चंद लकीरें जो आड़ी-तिरछी भी थीं, खींच दी गई थी। एक भरे-पूरे महाद्वीप की छाती पर जिस एक किस्से को मैं यहां बयां कर रहा हूं, वह भी ऐसे ही एक सिलसिले की प्रामाणिक कड़ी है।

यह किस्सा वर्ष 1971 का है। इसका पूरा विवरण प्रख्यात पत्रकार श्री कुलदीप नैय्यर ने अपनी एक चर्चित पुस्तक ‘दी स्कूप’ में दिया है। उस दिन श्री कुलदीप नैय्यर लंदन की बांड स्ट्रीट स्थित उस शख्स के फ्लैट पर गए थे जिसने भारत विभाजन की निर्णायक लकीर खींची थी। इस मुलाकात के चार मुख्य बिन्दू थे। पहला बिन्दू लाहौर से जुड़ा हुआ था। रैडक्लिफ ने उस दिन रहस्योद्घाटन किया था ‘मैंने तो लगभग पूरा लाहौर आपको दे डाला था। यह फैसला, आबादी, ‘कल्चर’, हिन्दुओं की सम्पत्ति पर आधारित था।’ मगर बाद में सीमा-आयोग के मेरे एक सहयोगी ने आपत्ति उठाई थी, यदि लाहौर भी पाकिस्तान को न मिला तो प्रस्तावित पाकिस्तान के पास तो कोई भी बड़ा शहर भी नहीं बचेगा।

रैडक्लिफ ने तब यह भी बताया था कि इसी के बदलेे से कलकत्ता पहले ही भारत के खाते में डाल दिया गया था। रैडक्लिफ ने स्वीकार किया था कि उसे इतना महत्वपूर्ण काम निपटाने के लिये सिर्फ10-11 दिन ही दिए गए थे। उस स्थिति में तो मेरे पास जिला स्तर के सही नक्शे भी नहीं थे। नैय्यर के अनुसार रैडक्लिफ के चेहरे पर इस बात का मलाल एवं पछतावा साफ झलक रहा था कि उसके द्वारा खींची गई लकीर के कारण लगभग 10 लाख लोगों की जानें चली गई थीं।

उसने बताया कि उसके अनुसार लाहौर में हिंदू और सिख बहुसंख्यक थे और संपत्ति में भी काफी समृद्ध थे। नैय्यर बताते हैं कि वह लंदन में अंतिम ब्रिटिश गवर्नर-जनरल लॉर्ड माउंटबेटन से मिलने गया था। मैं जानना चाहता था कि भारत और पाकिस्तान की सीमा रेखाएं कैसे खींची गईं। हालांकि सीमा आयोग में चार और सदस्य थे दो भारत से, मेहर चंद महाजन और तेजा सिंह, और दो पाकिस्तान से, दीन मोहम्मद और मोहम्मद मुनीर, वे सभी सेवारत न्यायाधीश थे। यह निर्णय रैडक्लिफ ने लिया था क्योंकि आयोग विभाजित था, एक तरफ भारत के सदस्य थे और दूसरी तरफ पाकिस्तान के। उन्होंने किस मापदंड का प्रयोग किया? मैं यह जानने के लिए उत्सुक था। मुझे यह जानकर बहुत आश्चर्य हुआ कि भारत और पाकिस्तान के बीच सीमाएं निर्धारित करते समय रैडक्लिफ के पास कोई निश्चित नियम नहीं थे।

सीमांकन करने से पहले ही उन्होंने पर्याप्त जानकारी एकत्र कर ली थी। दोनों पक्षों ने विस्तार से अपनी बात रखी। उन्होंने भी काफी अध्ययन किया था। जैसा कि उन्होंने बताया, उनके काम का सबसे पेचीदा हिस्सा पंजाब और बंगाल के आखिरी हिस्से का धार्मिक आधार पर विभाजन करना था। इसलिए लाहौर को भारत को देने और फिर उसे पाकिस्तान के पक्ष में बदलने का उनका निर्णय समझ में आता है। उन्होंने किसी न किसी तरह का संतुलन बनाए रखने की कोशिश की थी।

मैंने पूछा -क्या आप भारत और पाकिस्तान के बीच खींची गई सीमा रेखाओं से संतुष्ट थे? मेरे पास कोई विकल्प नहीं था, मेरे पास समय इतना कम था कि मैं इससे बेहतर काम नहीं कर सकता था। अगर मुझे उतना ही समय दिया जाता, तो मैं वही काम करता। हालांकि, अगर मुझे दो से तीन साल मिलते तो शायद मैं अपने काम में और सुधार कर पाता, रैडक्लिफ ने कहा। सीमांकन करने से पहले उन्होंने उत्तरी भारत के कुछ हिस्सों के ऊपर केवल एक बार डकोटा विमान उड़ाया था। उन्होंने कहा-यदि कुछ लोगों की आकांक्षाएं पूरी नहीं हुई, तो इसका दोष उन राजनीतिक व्यवस्थाओं में है जिनसे मेरा कोई लेना-देना नहीं है। रैडक्लिफ ने टाई के साथ जैकेट पहनी हुई थी जो एक तरह का औपचारिक पहनावा था।

लंबे समय तक न्यायाधीश रह चुके होने के कारण शायद विदेशियों से मिलते समय जैकेट पहनना उनकी आदत थी लेकिन उनके व्यवहार में कोई औपचारिकता नहीं थी। उनसे बातचीत के दौरान मैंने उन्हें एक सरल और स्पष्टवादी व्यक्ति पाया। जब मैंने उनके फ्लैट की घंटी बजाई तो उन्होंने खुद दरवाजा खोला। कमरा पुराने फर्नीचर से भरा हुआ था, जिसे उन्होंने शायद वर्षों में इकट्ठा किया होगा। बैठक का कमरा सादा लग रहा था। उसके पास कोई नौकर नहीं थी क्योंकि वे खुद रसोई में जाते थे, (जिसे मैं बैठक में सोफे से देख सकता था) चाय बनाने के लिए केतली को चूल्हे पर रखने के लिए।

रैडक्लिफ को अपना काम पूरा करने के लिए बहुत कम समय दिया गया था। इसमें देरी इसलिए हुई क्योंकि पंजाब और बंगाल की प्रांतीय विधानसभाओं को दोनों प्रांतों के विभाजन के लिए मतदान करना था, जो एक कानूनी बाध्यता थी। रैडक्लिफ शिमला में थे जब माउंटबेटन ने उन्हें सीमा आयोग के अध्यक्ष के रूप में नामित किया। उन्होंने मुझे बताया कि वे जुलाई में पंजाब में काम करना पसंद करते। उन्होंने कहा-गर्मी के कारण जून में फील्ड सर्वे करना असंभव था लेकिन माउंटबेटन ने रैडक्लिफ से कहा कि वे काम में एक दिन की भी देरी नहीं कर सकते।

रैडक्लिफ ने मुझे बताया कि वे सीमा आयोग के सदस्यों से खुश नहीं थे। उनका कहना था कि वे सिर्फ अपने देश का पक्ष रख रहे थे। रैडक्लिफ ने भारतीय सीमा आयोग के सदस्य मेहरचंद महाजन की बहुत प्रशंसा की, जो बाद में भारत के मुख्य न्यायाधीश बने। उन्होंने महाजन की विद्वत्ता और कानूनी ज्ञान से रैडक्लिफ को प्रभावित किया। मैंने रैडक्लिफ से कहा, ‘पाकिस्तान के मुसलमानों को इस बात की शिकायत है कि आपने भारत का पक्ष लिया। उनका जवाब था ‘उन्हें मेरा आभारी होना चाहिए क्योंकि मैंने उन्हें लाहौर दिलाने के सफल प्रयास किए, जबकि वह भारत का ही हिस्सा होना चाहिए था।

वैसे भी मैंने हिंदुओं की तुलना में मुसलमानों का अधिक पक्ष लिया।’ 22 जुलाई, 1947 को रैडक्लिफ को लिखे पत्र में माउंटबेटन ने कहा कि लाहौर में उनकी पंजाब विभाजन समिति के साथ चर्चा हुई थी। माउंटबेटन ने आगे कहा, ‘पंजाब विभाजन समिति में इस बात पर जोर दिया गया कि यदि 15 अगस्त से ठीक पहले अंतिम समय में ‘अवार्ड’ की घोषणा की गई तो अशांति का खतरा बहुत बढ़ जाएगा। मुझे पता है कि आप इसे पूरी तरह समझते हैं, लेकिन मैंने आपसे वादा किया था कि मैं इस बारे में फिर से बात करूंगा और कहूंगा कि अवार्ड की घोषणा के लिए आप जितने भी अतिरिक्त दिन का समय निकाल सकें, हम सभी उसके लिए आभारी होंगे।

क्या 10 तारीख तक इसे जारी करने की कोई संभावना है?’ अगले दिन जवाब देते हुए रैडक्लिफ ने कहा ‘अवार्ड प्रदान करने की यथाशीघ्र तिथि के महत्व को मैं निश्चित रूप से ध्यान में रखूंगा। मुझे नहीं लगता कि मैं 10 तारीख को उपस्थित हो पाऊंगा। लेकिन मुझे लगता है कि मैं 12 तारीख को उपस्थित हो सकता हूं और यदि संभव हुआ तो मैं उससे पहले वाली तारीख को उपस्थित होऊंगा।

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