मोदी की शैली: बटी हुई दुनिया में गठबंधन बनाने का कौशल

Summary :

श्री नरेन्द्र मोदी ने कूटनीति की एक खास शैली विकसित की है। यह शैली व्यक्तिगत, ऊर्जा से भरी, व्यावहारिक और तमाम विरोधाभासों से लैस होने के बावजूद भी बेहद सहज है। श्री मोदी सहजता से पुतिन को गले लगाते हैं, शी जिनपिंग के साथ बातचीत करते हैं, वाशिंगटन के साथ कारोबार करते हैं, यूरोप को आकर्षित कर लेते हैं, खाड़ी देशों के साथ संबंधों को प्रगाढ़ करते हैं और इन सबके बाद भी खुद को ‘ग्लोबल साउथ’ की एक सशक्त आवाज के रूप में स्थापित कर लेते हैं। वे विभिन्न देशों के बीच के आपसी संबंधों में विश्वास तो रखते…

श्री नरेन्द्र मोदी ने कूटनीति की एक खास शैली विकसित की है। यह शैली व्यक्तिगत, ऊर्जा से भरी, व्यावहारिक और तमाम विरोधाभासों से लैस होने के बावजूद भी बेहद सहज है। श्री मोदी सहजता से पुतिन को गले लगाते हैं, शी जिनपिंग के साथ बातचीत करते हैं, वाशिंगटन के साथ कारोबार करते हैं, यूरोप को आकर्षित कर लेते हैं, खाड़ी देशों के साथ संबंधों को प्रगाढ़ करते हैं और इन सबके बाद भी खुद को ‘ग्लोबल साउथ’ की एक सशक्त आवाज के रूप में स्थापित कर लेते हैं। वे विभिन्न देशों के बीच के आपसी संबंधों में विश्वास तो रखते ही हैं, साथ ही साथ नेताओं के बीच के आपसी संबंधों पर भी उतना ही भरोसा करते हैं। वह नामों को याद रखना जानते हैं, उन्हें भाव-भंगिमाओं पर ध्यान देना आता है, प्रतीकों के प्रभावी उपयोग की जानकारी उन्हें है और इस बात की भी बखूबी समझ है कि चाय पर की गई एक बातचीत वह सबकुछ हासिल कर लेने में सक्षम है जो शिष्टता से तैयार किया गया एक राजनयिक वक्तव्य भी नहीं कर सकता। नई दिल्ली में हाल ही में संपन्न हुए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान इनमें से कई खूबियों की झलक एक साथ देखने को मिलीं। ब्रिक्स के सदस्य देश अलग-अलग राजनीतिक प्रणालियों का अनुसरण करते हैं। उनके रणनीतिक हितों और दुनिया को देखने के दृष्टिकोण में भी अंतर है। और तो और पश्चिम एशिया से लेकर चीन तथा रूस तक तनाव की स्थिति बनी हुई है। फिर भी प्रत्येक सदस्य देश ने ‘नई दिल्ली घोषणापत्र’ पर हस्ताक्षर किए। श्री मोदी ने तीन दिनों में व्यक्तिगत रूप से 15 द्विपक्षीय बैठकें कीं। वे एक के बाद एक नेताओं से मिलते रहे। इन सभी नेताओं के हित काफी भिन्न-भिन्न थे और यह सब करते हुए उन्होंने भारत के हितों को पूरी मजबूती से केन्द्र में रखा। श्री मोदी को निशाना बनाकर फेंका गया आलोचना का हर पत्थर उनकी कूटनीति की दीवार का ही एक पत्थर सा दिखाई दिया।
मोदी की शैली में गर्मजोशी और मजबूत इरादों का एक रोचक मेल दिखता है। उनके गले मिलने, हाथ मिलाने और तस्वीरें खिंचवाने पर लोगों का ध्यान तो जाता है लेकिन इन सबके पीछे विदेश नीति को लेकर एक बहुत ही अनुशासित सोच काम करती है। मोदी ने कूटनीति की एक सीधी-सी बात समझी है कि जब सरकारों के बीच मतभेद हों तो उनके नेताओं का फोन पर एक-दूसरे से बात करना बहुत ही मददगार साबित होता है। पिछले कुछ सालों में उन्होंने इन रिश्तों को बनाने व मजबूत करने में काफी राजनीतिक मेहनत की है। अमेरिका के अलग-अलग राष्ट्रपतियों के साथ उनके अच्छे समीकरण, पुतिन के साथ लगातार बातचीत, शी जिनपिंग के साथ संवाद और यूरोप, अफ्रीका व खाड़ी देशों के नेताओं से संपर्क साधना – ये सब इसी रणनीति का हिस्सा हैं। वह ऐसी जगहों पर भी जाने को तैयार रहते हैं जहां भारत का कोई प्रधानमंत्री शायद ही कभी गया हो। वर्ष 2025 में उन्होंने तीन दशकों के बाद घाना और 26 साल बाद त्रिनिदाद एवं टोबैगो का द्विपक्षीय दौरा किया। ऐसे दौरों से आपसी सद्भावना बढ़ती है और उन देशों के साथ भारत के संबंध मजबूत होते हैं जिन पर अक्सर बड़ी ताकतों का ध्यान कम ही जाता है। उनकी यह व्यक्तिगत शैली, ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ के उनके व्यापक सिद्धांत के साथ अच्छी तरह मेल खाती है। मोदी की यह इच्छा है कि भारत सिर्फ “दूसरों के बनाए नियमों का अनुसरण करनेवाला देश” बनने के बजाय “नियमों को तय करने वाला देश” बने। वह चाहते हैं कि भारत दुनिया के सामने बचाव की मुद्रा में रहने के बजाय पूरे आत्मविश्वास के साथ खड़ा हो। इसका सीधा मतलब है कि भारत ‘क्वाड’ के जरिए अमेरिका के साथ मिलकर काम करे। रूस के साथ अपने पुराने रिश्ते बनाए रखे। ब्रिक्स के जरिए चीन के साथ जुड़े। यूरोप तथा खाड़ी देशों के साथ साझेदारी को मजबूत करे और यह सब करते हुए, वह ‘ग्लोबल साउथ’ के मंचों के जरिए विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की हिमायत भी करे। श्री मोदी का दृष्टिकोण यह रहा है कि किसी एक गुट के साथ अपने-आप जुड़ने के बजाय, हर मुद्दे पर भारत के हितों के आधार पर अपना रुख तय किया जाए। यह एक बेहद ही व्यावहारिक रवैया है और इसमें हर मुद्दे को उसके गुण-दोषों तथा भारत के हितों के आधार पर परखा जाता है। यही कारण है कि श्री मोदी के काल में ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ की नीति अपेक्षाकृत अधिक सक्रिय और मुखर नजर आई है इससे उन्हें इस बात की आजादी मिली है कि वह एक देश के साथ रक्षा के क्षेत्र में, दूसरे के साथ ऊर्जा के क्षेत्र में और तीसरे के साथ तकनीक के क्षेत्र में सहयोग कर सकें। साथ ही किसी दूसरे मुद्दे पर उनसे असहमत होने की दृढ़ता भी दिखा सकें।
गठबंधन बनाने का उनका स्वाभाविक कौशल खास तौर पर 2023 में भारत की जी20 की अध्यक्षता के दौरान दिखाई दिया। यूक्रेन युद्ध ने रूस और पश्चिमी देशों के बीच दूरियां इस कदर बढ़ा दी थीं कि आम सहमति बनने की उम्मीद कम ही थी। मोदी का रूख हमेशा की तरह लगातार कोशिश करने वाला था। उन्होंने सभी पक्षों को बातचीत में शामिल रखा और जिन मुद्दों पर सहमति बन सकती थी, उन पर काम किया। आखिरकार, भारत ‘नई दिल्ली लीडर्स डिक्लेरेशन’ को मंजूर करा पाने में सफल रहा। यह श्री मोदी की अथक कोशिशों का ही नतीजा था कि ‘अफ्रीकी यूनियन’ जी20 का स्थायी सदस्य बन सका। उन्होंने इस शिखर सम्मेलन में ‘अफ्रीकी यूनियन’ के अध्यक्ष का व्यक्तिगत रूप से स्वागत किया। इससे ‘ग्लोबल साउथ’ की आवाज को मुखर करने के प्रति भारत की प्रतिबद्धता रेखांकित हुई। भारत ने ‘वॉयस ऑफ ग्लोबल साउथ’ नाम की पहल के जरिए इसके लिए आधार तैयार किया था और 120 से अधिक देशों से परामर्श किया था। ‘अफ्रीकी यूनियन’ को जी20 में शामिल करने से एक पूरे महाद्वीप को वैश्विक स्तर पर निर्णय लेने की प्रक्रिया में अपेक्षाकृत अधिक प्रतिनिधित्व मिला। इससे मोदी की कूटनीति की एक अहम खूबी – व्यापक गठबंधन बनाना और सत्ता के पारंपरिक केन्द्रों से बाहर के देशों की आवाज की सार्थकता को सुनिश्चित करना – भी सामने आई।
प्रतीकवाद उनकी राजनीति और कूटनीति का एक अहम हिस्सा है। गले मिलने, व्यक्तिगत रूप से स्वागत करने, उपहारों का चुनाव करने, सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक स्थलों का दौरा करने और यहां तक कि उनकी भाषा के इस्तेमाल का लक्ष्य भी बातचीत के कमरे से परे जाकर संवाद स्थापित करना होता है। उनकी विदेश नीति का अक्सर एक ऐसा पहलू होता है जो सीधे जनता से जुड़ा होता है। ‘वसुधैव कुटुंबकम’ ने भारत की जी20 की अध्यक्षता को एक ऐसी सोच दी जिसे आसानी से समझा जा सका। “एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य” ने भारत के एक पुराने विचार को आधुनिक कूटनीतिक भाषा में रूपांतरित किया। इसी तरह, ‘योग दिवस’ भी असाधारण रूप से वैश्विक पैमाने पर ‘सॉफ्ट पावर’ को प्रदर्शित करने का जरिया बना। कोविड के दौरान ‘वैक्सीन मैत्री’ ने इस बात का स्पष्ट संदेश दिया कि भारत की प्रगति से दूसरों को भी लाभान्वित होना चाहिए। ये तरीके इसलिए कारगर साबित हुए हैं क्योंकि श्री मोदी यह बखूबी समझते हैं कि आज कूटनीति बातचीत के कमरों, टेलीविजन के स्टूडियो और लाखों मोबाइल-फोन के स्क्रीनों पर साथ-साथ चलती है। दुनिया के बहुत कम नेता इन तीनों प्रकार के दर्शकों के प्रति इतने सजग रहे हैं। कामकाज की इस शैली के पीछे जबरदस्त ऊर्जा और सहनशक्ति भी निहित है। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान तीन दिनों के भीतर पंद्रह द्विपक्षीय बैठकें लगातार सक्रिय रहने के उनके तौर-तरीके का हिस्सा हैं। मोदी विदेश नीति को केवल राजनयिकों को सौंपी जाने वाली गतिविधि के बजाय प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी मानते हैं। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से पहले भारत के 30 शहरों में 400 से अधिक बैठकें और कार्यक्रम हुए लेकिन अहम मौकों पर उन्होंने व्यक्तिगत रूप से इस कवायद को वह गति प्रदान की जो अकेले राजनयिक नहीं दे सकते थे। वह इस बात को समझते हैं कि राजनयिकगण भाषा तो तैयार कर सकते हैं लेकिन उसे महत्वाकांक्षा और राजनीतिक पूंजी प्रदान तो नेता ही कर सकता है। बुनियादी तौर पर परस्पर विरोधी हितों वाले नेताओं के साथ जुड़ने की उनकी क्षमता आज की दुनिया में विशेष रूप से मूल्यवान है। ब्रिक्स स्वयं लगभग आधी मानवता और वैश्विक जीडीपी के लगभग 40 प्रतिशत हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है। इस समूह को संचालित करना एक कठिन कार्य है, क्योंकि इसके सदस्य देशों की महत्वाकांक्षाएं, गठबंधन और शिकायतें अलग-अलग हैं। मोदी की उपलब्धि ऐसे क्षेत्रों को खोजने की रही है जहां ये परस्पर विरोधी हित आपस में मिलते हैं – जैसे व्यापार, तकनीक, महत्वपूर्ण खनिज, खाद्य एवं ऊर्जा सुरक्षा, सशक्त आपूर्ति शृंखला और वैश्विक संस्थानों में सुधार और श्री मोदी ने अपना ध्यान इन्हीं क्षेत्रों पर केन्द्रित रखा। अब जबकि श्री नरेन्द्र मोदी अपना जन्मदिन मना रहे हैं तो उनकी राजनीतिक विरासत पर निश्चित रूप से बहस होगी। हालांकि, विदेश नीति में उनकी अपनी अलग छाप साफ दिखाई देती है। एक दशक से भी अधिक समय में उन्होंने भारतीय कूटनीति को व्यापक पहचान, आत्मविश्वास और महत्वाकांक्षा प्रदान की है। उन्होंने खुद प्रधानमंत्री को भारत का मुख्य कूटनीतिक संप्रेषक बना दिया है और विचारधारा व भौगोलिक सीमाओं से परे संबंधों को प्रगाढ़ बनाने के लिए काफी कुछ किया है। उनके कामकाज के तरीके में एक गुजराती व्यापारी की व्यावहारिकता, लोगों एवं प्रतीकों की अहमियत की परख रखने वाले एक राजनेता का कौशल और एक राजमर्मज्ञ की यह समझ शामिल है कि सभी देश आखिरकार अपने हितों को ही प्राथमिकता देते हैं। वे सौदे पर नजर रखते हुए गर्मजोशी भी बरत सकते हैं, लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए लचीलापन अपना सकते हैं और मौजूदा हालात की सीमाओं को समझते हुए महत्वाकांक्षी भी बने रह सकते हैं।
शायद यही ‘मोदी-शैली’ का सार है। आज की बंटी हुई दुनिया में, वे दूरियां बनाने के बजाय जुड़ने, अड़ियल गुटों में शामिल होने के बजाय नए रिश्ते बनाने और दीवारें खड़ी करने के बजाय पुल बनाने को प्राथमिकता देते हैं। वे यह समझ गए हैं कि जब किसी देश के दुनिया भर में मजबूत रिश्ते हों तो उसकी रणनीतिक स्वायत्तता का महत्व और बढ़ जाता है।
उनकी कूटनीति में व्यावहारिकता और महत्वाकांक्षा का मेल है। वे प्रतिस्पर्धी ताकतों के साथ जुड़ते हैं, ‘ग्लोबल साउथ’ की आवाज को मुखर करते हैं और लगातार भारत के प्रभाव को बढ़ाते हैं। एक दशक से अधिक समय में उन्होंने न केवल दुनिया के साथ भारत के जुड़ने के तरीके को बदला है, बल्कि उतनी ही अहमियत के साथ, दुनिया के भारत के साथ जुड़ने के तरीके को भी बदला है। आज भारत अपेक्षाकृत अधिक आत्मविश्वास के साथ बात करता है, प्रतिस्पर्धी भू-राजनैतिक गुट उसे अपने साथ जोड़ने की कोशिश करते हैं और वैश्विक चर्चा को आकार देने में भारत की भूमिका लगातार बढ़ रही है।

(लेखक, आरपीजी एंटरप्राइजेज के चेयरमैन हैं)

Team Desk