मॉनसून और अर्थव्यवस्था

Summary :

माॅनसून के मौजूदा आंकड़ों ने न केवल देशवासियों को बल्कि आर्थिक विशेषज्ञों को चिंता में डाल दिया। अन्नदाताओं और अर्थव्यवस्था के लिए माॅनसून की 42 प्रतिशत कम वर्षा ने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। अनुमान लगाया जा रहा है कि अगर जुलाई माह में भी बारिश कम पड़ती है तो इसका असर खरीफ की फसल पर पड़ेगा, बल्कि इससे उपभोक्ता मांग कम होगी और खाद्य महंगाई का खतरा भी बढ़ जाएगा। कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आशंका व्यक्त कर दी है कि ​देश के 315 जिलों में सामान्य से कम बारिश हो सकती है और सरकार ने 111…

माॅनसून के मौजूदा आंकड़ों ने न केवल देशवासियों को बल्कि आर्थिक विशेषज्ञों को चिंता में डाल दिया। अन्नदाताओं और अर्थव्यवस्था के लिए माॅनसून की 42 प्रतिशत कम वर्षा ने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। अनुमान लगाया जा रहा है कि अगर जुलाई माह में भी बारिश कम पड़ती है तो इसका असर खरीफ की फसल पर पड़ेगा, बल्कि इससे उपभोक्ता मांग कम होगी और खाद्य महंगाई का खतरा भी बढ़ जाएगा। कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आशंका व्यक्त कर दी है कि ​देश के 315 जिलों में सामान्य से कम बारिश हो सकती है और सरकार ने 111 जिलों को अतिसंवेदनशील के रूप में चिन्हित किया है।

केन्द्र सरकार ने खेती पर मंडराते खतरे को देखते हुए आपातकालीन तैयारियां शुरू कर दी हैं और अतिसंवेदनशील जिलों के लिए विशेष जल प्रबंधन कम पानी में पैदा होने वाली फसलों के बीजों की उपलब्धता और बिजली की आपूर्ति सुनिश्चित करने का काम शुरू कर दिया।
जून में कम बारिश होना अच्छा संकेत नहीं है, क्योंकि अधिकांश वैश्विक जलवायु एजेंसियां मौजूदा अल नीनो के अगस्त-सितंबर तक “मजबूत” और अक्तूबर-जनवरी तक “अत्यंत मजबूत” होने का अनुमान लगा रही हैं। दूसरे शब्दों में, खराब शुरुआत से कोई सुधार की उम्मीद नहीं करनी चाहिए और अल नीनो के बढ़ते प्रभाव के साथ सबसे बुरे हालात के लिए तैयार रहना चाहिए। 2023-24 और 2015-16 में आए पिछले दो मजबूत से अत्यंत मजबूत अल नीनो के कारण सूखे के वर्ष रहे।

2026-27 में भी स्थिति अलग नहीं हो सकती है। राहत की बात सिर्फ यह है कि यह लगातार दो अच्छे कृषि वर्षों के बाद आ रहा है: 2024-25 और 2025-26 में भारत और विश्व स्तर पर किसानों ने बंपर फसलें काटीं, जिनमें गेहूं, चावल, मक्का, चीनी और यहां तक कि सोयाबीन, रेपसीड और पाम तेल का रिकॉर्ड उत्पादन हुआ। आश्चर्य की बात नहीं है कि अन्तर्राष्ट्रीय खाद्य पदार्थों की कीमतें कच्चे पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस, कोयला, उर्वरक और धातुओं की तरह नहीं बढ़ी हैं। अमेरिका और इजराइल के बीच ईरान को लेकर हुए युद्ध के बाद इन सभी चीजों की कीमतों में भारी उछाल आया है, जबकि सर्वकालिक उच्च उत्पादन से उपलब्ध प्रचुर मात्रा में भंडार ने खाद्य मुद्रास्फीति में अचानक वृद्धि को रोक रखा है कम से कम अभी तक तो ऐसा ही है।

भारत में रोजमर्रा की जिन्दगी पर जलवायु परिवर्तन की छिपी हुई आर्थिक लागत का असर साफ दिखाई देता है। मानसून में देरी या कमजोर मानसून से फसल की पैदावार कम होती है, बुवाई में बाधा आती है। कृषि उत्पाद घटने से महंगाई का नया दौर शुरू हो जाता है। अत्यधिक भीषण गर्मी के चलते बिजली की मांग बहुत बढ़ जाती है। बिजली ग्रिडों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। पिछले 2 महीनों में भारत में बिजली की मांग 270.8 गीगावाट प्रतिमाह से ऊपर पहुंच चुकी है। अतिरिक्त उत्पादन के लिए बिजली कम्पनियां आयातित ईंधन का सहारा लेती हैं और बिजली की लागत बढ़ जाती है। अंततः इसका बोझ आम जनता पर ही पड़ता है। कम आय वाले परिवारों के लिए बिजली के बढ़ते बि​ल, भोजन और शिक्षा जैसी आवश्यक जरूरतों पर खर्च में कमी का कारण बनते हैं।

अगर मॉनसून खराब रहता है तो इसका असर सिर्फ खाने-पीने की चीजों या एफएमजी सेक्टर पर ही नहीं दिखता, बल्कि अन्य सेक्टर भी इसकी जद में आ जाते हैं। किसानों की कमाई घटने से ट्रैक्टर समेत तमाम कृषि उपकरणों की सेल पर असर होगा जिससे उनके शेयरों में गिरावट देखी जा सकती है। इसके अलावा बैंकिंग और एनबीएफसी कंपनियों पर भी बुरा असर होता है। अगर बुवाई से पहले ही मॉनसून खराब हुआ तो किसान लोन कम लेंगे और अगर बुवाई के बाद ऐसा होता है तो किसानों का नुक्सान होने के चलते लोन की रिकवरी मुश्किल हो जाती है। भारत की कुल जीडीपी में एग्रिकल्चर सेक्टर की हिस्सेदारी करीब 15 फीसदी है। किसानों के लिए बारिश सोने से भी ज्यादा मूल्यवान है।

अनुकूल मॉनसून से गुड्स और सर्विसेज की कीमत भी प्रभावित होती है। अगर बारिश कम होती है तो इंडस्ट्री को मार्केट नहीं मिल पाता है और इंडस्ट्रीज के लिए कच्चे माल की सप्लाई पर भी असर पड़ता है। मॉनसून के नाकाम रहने से देश की जीडीपी ग्रोथ प्रभावित होती है। इसका नॉन एग्रीकल्चर सेक्टर की मांग पर भी असर पड़ता है। पश्चिम एशिया में तनाव के चलते अभी भी उर्वरक संकट बना हुआ है। केन्द्र सरकार को उर्वरक स​ब्सिडी के तौर पर 3.50 लाख करोड़ रुपए खर्च करने पड़ सकते हैं। यह सब्सिडी कम्पनियों को दी जाएगी ताकि वह खाद का पर्याप्त बंदोबस्त करें। यद्यपि देश के खाद्यान्न भंडार भरे पड़े हैं लेकिन भविष्य में कृषि उत्पादन कम होने से भंडारण में कमी आ सकती है।

यद्य​पि अमेरिका-ईरान शांति समझौते के चलते होर्मुज जलडमरूमध्य समुद्री मार्ग खुल जाने से जहाजों की आवाजाही शुरू हो चुकी है लेकिन तेल, गैस, खाद और एलएनजी की आपूर्ति सामान्य होने में अभी वक्त लग सकता है। महंगाई के चलते उपभोक्ता मांग कम हुई तो बाजार में खरीदारी कम हो जाएगी और अर्थव्यवस्था का चक्र प्रभावित होगा। अल नीनो के प्रभाव से राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, बंगाल, बिहार और कर्नाटक में सूखे की स्थिति पैदा हो गई है।

जिसके चलते चावल, दालें और स​ब्जियों की सप्लाई और उपलब्धता प्रभावित होगी। यह भी वास्तविकता है कि खेती की लागत बढ़ चुकी है ​जबकि ​किसानों की आय में कोई बढ़ौतरी नहीं हुई है। इस स्थिति में केन्द्र और राज्य सरकारों की तरफ से कुशल योजना और आपूर्ति पक्ष प्रबंधन की जरूरत है। साथ ही तेजी से फसल सर्वेक्षण और बीमा भुगतान के माध्यम से ​किसानों को नुक्सान से बचने की जरूरत है। एक जुलाई से शुरू होने वाले वीबी-जी आरएएमजी कार्यक्रम को एक आदर्श ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम बनाने की जरूरत है। यक्ष प्रश्न सामने है कि देश का किसान कब जश्न मनाएगा, सरकार को तुरन्त कदम उठाने होंगे।

Aditya Chopra

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