जंग के बारे में एक बहुत पुरानी कहावत है कि जंग में कोई भी जीते, वास्तव में मरता आम आदमी ही है। अमेरिकी मिसाइल ने यदि ईरान में खामेनेई को मारा तो वैसी ही किसी मिसाइल ने बेगुनाह बच्चों की भी जान ले ली! ईरान ने अपने पड़ोसी देशों पर ड्रोन हमले किए तो मरने वालों या घायल होने वालों में ज्यादातर बेगुनाह ही थे। जहाज पर काम करने वालों ने क्या गुनाह किया था कि उन्हें निशाना बनाया गया? दरअसल जंग यह नहीं देखती कि कौन गुनाह कर रहा है और कौन बेगुनाह है! उसका मकसद है दहशत, तबाही और मारना और यह बात आप सब जानते हैं।
हम, आप या हमारा देश भारत जंग का हिस्सा नहीं है लेकिन हम भी इसमें झुलसे जा रहे हैं। हमारे हजारों लोग कहीं जहाजों में तो कहीं किसी देश में फंसे पड़े हैं। मध्य-पूर्व यानी खाड़ी के देशों में करोड़ों भारतीय रहते हैं। हमें उनकी चिंता सता रही है। ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट को बंद किया तो हमारे शांतिप्रिय देश भारत में भी खाना पकाने के गैस की किल्लत आ खड़ी हुई, हालांकि गैस की किल्लत पर भी राजनीति चल रही है। मुझे लगता है कि सरकार को स्थिति बिल्कुल स्पष्ट करनी चाहिए और जनता से सहयोग लेना चाहिए। सड़क किनारे के ढाबे जो आम आदमी को भोजन परोसते हैं, उनके लिए गैस की आपूर्ति सुनिश्चित करना चाहिए।
अमेरिका की एक खासियत है कि वह चित भी अपनी चाहता है और पट भी उसी की होनी चाहिए। इसे समझने के लिए आपको करीब चार दशक पीछे लौटना होगा। 1979 की इस्लामिक क्रांति में अमेरिका की पसंद वाले शाह रजा पहलवी (शाह ऑफ ईरान) का तख्तापलट हो गया और अयातुल्लाह खामेनेई शासक बन बैठे। उन्होंने ईरानवासियों के मानवाधिकार और आजादी छीन ली। शाह के समय के वैज्ञानिकों, डिफेंस सर्विसेज और अन्य प्रमुख लोगों को मौत के घाट उतार दिया। कुछ भाग निकलने में सफल रहे। अगले ही साल अमेरिका ने इराक के शासक सद्दाम हुसैन की पीठ पर हाथ रखा और सद्दाम ने ईरान पर हमला कर दिया।
अमेरिका ने इराक को खूब हथियार दिए, खूब पैसा दिया लेकिन आठ साल चली जंग में ईरान को इराक हरा नहीं पाया, क्यों नहीं हरा पाया? क्योंकि ईरान की मदद इजराइल कर रहा था! इजराइल के पीछे कौन था? जी, अमेरिका था! अब आप सोचेंगे कि अमेरिका ने ऐसा क्यों किया? दरअसल अमेरिका का मकसद ईरान के साथ इराक को भी कमजोर करना था! उस जंग में लाखों-लाख लोग मारे गए और आरोप है कि उसमें रासायनिक हथियारों का भी इस्तेमाल हुआ, जिस सद्दाम को अमेरिका ने मोहरा बनाया था, उसे ही इस इल्जाम में मौत के घाट उतार दिया कि उसने रासायनिक हथियार बनाया है, जबकि इराक के पास आज तक रासायनिक हथियार का एक कतरा तक नहीं मिला, मगर इराक के लोग तबाह हो गए!
अब ईरान की बात कीजिए. महा बम गिराने के बाद खुद ट्रम्प ने कहा कि उसकी परमाणु क्षमताओं को नष्ट कर दिया गया है, फिर बातचीत भी हुई लेकिन ट्रम्प चाहते थे कि ईरान अपने पास बैलिस्टिक मिसाइल भी न रखे! कोई देश अपनी संप्रभुता से इस तरह समझौता कैसे कर सकता है? ईरान ने इनकार कर दिया। उसके बाद तय हो गया था कि अमेरिका हमला करेगा, मगर हमला करने से पहले उसने इस बात का अंदाजा नहीं लगाया कि ईरान अपने आसपास के खाड़ी देशों में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमला करके पूरे इलाके को चपेट में ले लेगा, यहां तक कि दुबई के इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर भी हमले हुए। दुबई निर्विवाद रूप से दुनिया का आर्थिक केंद्र बना हुआ है। दुनिया भर से धन-दौलत यहां पार्क होता है।
उस दुबई पर हमले ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर संकट पैदा किया है, क्या यह भी कोई चाल है? अब यूएई, सऊदी अरब, कुवैत, बहरीन, कतर और जॉर्डन जैसे देश अमेरिका पर दबाव बना रहे हैं कि यह जंग हर हाल में जल्दी रुकनी चाहिए, मगर क्या ट्रम्प उनकी सुनेंगे? ईरान जिस मूड में है, उसने सबके भीतर खौफ पैदा कर दिया है। ईरान को इसका फायदा मिल रहा है। सवाल यह भी है कि क्या अमेरिका ने इस बात का अंदाजा लगाया कि खामेनेई और सिर्फ ईरानी नेताओं की मौत के बाद भी ईरान इस तरह के हमले करेगा? कहना मुश्किल है, मगर निश्चित रूप से ईरान के पीछे चीन और रूस भी खड़ा है।
ईरान का मिसाइल कार्यक्रम वास्तव में चीन की मदद से चलता है और चीन की ताकत से गुर्राने में ईरान क्यों पीछे रहे? अमेरिकी हमले के बाद चीन हथियार लेकर ईरान के साथ नहीं आया है लेकिन ईरान को उसकी खुली मदद जारी है। चीन के सहयोग से बनी ईरान की सस्ती मिसाइलों को मार गिराने के लिए अमेरिका को अपने महंगे हथियारों का उपयोग करना पड़ रहा है। अमेरिका को आर्थिक क्षति पहुंचाना चीन का बड़ा मकसद है। अमेरिकी ठिकानों पर ईरान के जवाबी हमले की सैटेलाइट तस्वीरें चीन ने ही दुनिया को दिखाई हैं ताकि अमेरिका की किरकिरी हो। चीन वास्तव में अमेरिका के मजे ले रहा है।
इधर रूस ने तो अमेरिका को तीसरे विश्वयुद्ध के खतरों से आगाह भी कर दिया है। तो अब बड़ा सवाल यह है कि इस जंग में आगे होगा क्या? क्या ईरान में तख्तापलट का अमेरिकी मकसद पूरा होगा? अमेरिका हवाई युद्ध में पारंगत है, लेकिन इतिहास गवाह है कि हवाई हमलों से तख्तापलट नहीं होता। अमेरिकी सेना बहुत शक्तिशाली है लेकिन भौगोलिक रूप से ईरान ऐसा है कि वह दशकों तक लड़ता रहेगा। जहां तक लोकतंत्र समर्थकों के विद्रोह का सवाल है तो खामेनेई की मौत के बावजूद ईरान की दुर्दांत रिवोल्यूशनरी गार्ड का खौफ ऐसा है कि शायद ही ऐसा संभव हो, ईरान के लोग अभी तबाही की हालत में हैं। नीचे खामनेई के गुर्गे गला रेत रहे हैं तो ऊपर से अमेरिकी मिसाइलें जान ले रही हैं। आम आदमी करे तो क्या?























