स्वतन्त्रता के बाद भारत को जो लोकतान्त्रिक प्रणाली हमारी आजादी की लड़ाई के पुरोधा हमें सौंप कर गये हैं उसमें अहिंसा इसके लिए खाद-पानी का काम करती है। बेशक आजादी की लड़ाई की कई धाराएं थीं जिनमें क्रान्तिकारी व नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की आजाद हिन्द फौज का भी उल्लेखनीय योगदान था परन्तु जिस नेतृत्व के पीछे देश के गरीब मजदूर से लेकर संभ्रान्त व कुलीन तक कहे जाने वाले लोग इकट्ठा हुए उसका नाम महात्मा गांधी था। महात्मा गांधी राष्ट्रपिता इसीलिए कहलाये कि उन्होंने आजादी की लड़ाई को जन आन्दोलन में तब्दील कर दिया था। उनकी इस ताकत को सबसे पहले नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने ही पहचाना और विदेश में आजादी की लड़ाई लड़ते हुए भारतीयों के नाम अपने रेडियो सन्देश में महात्मा गांधी को ‘राष्ट्रपिता’ कह कर सम्बोधित किया। राष्ट्रपिता का यह प्रण था कि उनका स्वतन्त्रता आन्दोलन केवल अहिंसक तरीके से ही चलेगा इसी वजह से उन्होंने 1922 के लगभग शुरू हुए असहयोग आन्दोलन में हिंसा भड़क जाने की वजह से उसे वापस ले लिया था जिससे उस समय के कुछ बड़े कांग्रेसी नेता भी असहमत थे। इन नेताओं में देशबन्धु चितरंजन दास का नाम सबसे प्रमुख था। कहने का मतलब यह है कि गांधी बाबा हमें जो लोकतन्त्र सौंप कर गये हैं उसमें हिंसा के लिए लेशमात्र भी स्थान नहीं है।
यही वजह है कि आजादी मिलने के बाद पहले लोकसभा चुनाव होने से पूर्व ही तत्कालीन प्रधानमन्त्री स्व. पं. जवाहर लाल नेहरू ने 26 जनवरी, 1950 को अंगीकृत भारतीय संविधान में पहला संशोधन किया जिसमें यह प्रावधान था कि हिंसात्मक विचार फैलाने वाला कोई भी राजनीतिक दल भारतीय चुनावों में हिस्सा नहीं ले सकता। इस संशोधन के बाद ही आजादी मिलते ही प्रतिबन्धित हुई भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने भारत के संविधान और चुनावी व्यवस्था के जरिये सत्ता परिवर्तन के प्रति अपनी निष्ठा व्यक्त की। अतः भारत ने जो लोकतान्त्रिक प्रणाली अपनाई उसमें आम नागरिक अपने एक वोट के अधिकार का इस्तेमाल करके शान्तिपूर्ण तरीके से अपनी मनपसन्द के राजनीतिक दल की सरकारें स्थापित कर सकते थे। भारत को आजादी मिले 78 वर्ष से अधिक का समय हो चुका है और इस दौरान देश व विभिन्न राज्यों में चुनावों के माध्यम से विभिन्न राजनीतिक दलों की सरकारें बनती-बिगड़ती रही हैं और इनके बीच हार-जीत होती रही है परन्तु हारने वाली राजनीतिक पार्टी को भी सत्ता में आने वाली पार्टी बराबर का सम्मान देती रही है और उसकी खामियों के खिलाफ पूर्ण अहिंसक तरीके से ही जनता को बताती रही है।
लोकतन्त्र में यह लड़ाई निरन्तर चलती रहती है जिसकी वजह से सत्तारूढ़ दल अदलते-बदलते रहते हैं। यह देश मूलतः गांधी का ही देश है और गांधी जी ने आजादी मिलने के मुहाने पर बैठे भारत में एक अमेरिकी पत्रकार लुई फिशर को दिये गये लम्बे साक्षात्कार में कहा था कि वह अपने विरोधी के विचार उसे अपने से ऊंचे आसन पर बैठा कर सुनना पसन्द करेंगे। लोकतन्त्र कभी भी हिंसात्मक तरीकों से नहीं चलता, बल्कि यह आपसी संवाद व परिसंवाद से चलता है इसीलिए यह उक्ति बनी है कि प्रजातन्त्र में सरकारें बल प्रयोग से नहीं बल्कि इकबाल से चलती हैं। मगर हम देख रहे हैं कि प. बंगाल में हाल ही में हुए चुनावों में हारी हुई तृणमूल कांग्रेस पार्टी के नेता अभिषेक बनर्जी और पार्टी सांसद कल्याण बनर्जी पर हिंसक हमला हुआ। इतना ही नहीं उनके घायल होने पर जब उन्हें निजी अस्पताल में भर्ती कराने का प्रयास किया गया तो दो अस्पतालों ने उनका उपचार करने से ही इन्कार कर दिया। इसकी जितनी निन्दा की जाये वह कम है।
सवाल यह है कि यदि चुनावों के दौरान अभिषेक बनर्जी के खिलाफ लोगों में गुस्सा था तो वह चुनाव परिणामों में बाहर निकल गया इसके बाद उनके खिलाफ भीड़ द्वारा हिंसक कार्रवाई करना उस पश्चिम बंगाल की संस्कृति का ही अपमान है जिसने सैकड़ों की तादाद में स्वतन्त्रता सेनानी दिये हैं। उन पर हमले की घटना की निन्दा विपक्षी नेताओं के साथ प्रदेश भाजपा अध्यक्ष ने भी की है, अतः सत्ता पर काबिज हुई भाजपा सरकार का यह कर्त्तव्य बनता है कि वह चुनाव बाद हिंसा पर काबू रखने के लिए आवश्यक कदम उठाये और राज्य की राजनीति में नई नजीर पेश करे क्योंकि राज्य में 2021 में जब पिछले चुनाव हुए थे तो तृणमूल कांग्रेस की सरकार दोबारा गठित हुई थी और चुनावों के बाद व्यापक हिंसा भी हुई थी जिसे रोकने के लिए तत्कालीन मुख्यमन्त्री सुश्री ममता बनर्जी ने अपेक्षित कदम नहीं उठाये थे अतः वर्तमान मुख्यमन्त्री श्री सुभेन्दु अधिकारी को नई नजीर पेश करते हुए चुनाव हारी हुई पार्टी के नेताओं के लिए शान्तिपूर्ण माहौल पैदा करना चाहिए।
वैसे प. बंगाल में 1967 के बाद से राजनीतिक हिंसा का माहौल बनना शुरू हुआ और इसी दौरान इस राज्य से नक्सलवादी आन्दोलन भी निकला जिस पर 70 के दशक में काबू पाया गया लेकिन 1977 से 2011 तक राज्य में वामपंथियों के शासन के दौरान राजनीतिक संस्कृति कहीं न कहीं हिंसा के आवेश में आती रही। इसके बाद ममता दीदी के 15 वर्षों के शासन के दौरान भी इस संस्कृति में बुनियादी फर्क नहीं आ पाया जिसे अब बदले जाने की सख्त जरूरत है। इस संस्कृति को बदलने के लिए राज्य में सक्रिय सभी राजनीतिक दलों को जमीनी स्तर से काम करना चाहिए जिससे आम लोग उस मानसिकता से बाहर आ सकें जिसमें हारे हुए दल के साथ हिंसक व्यवहार करने की प्रवृत्ति छिपी हुई है। श्री बनर्जी लोकसभा के सदस्य हैं और सदन में अपनी पार्टी के सांसदों के नेता भी हैं अतः लोकसभा अध्यक्ष का भी यह कर्त्तव्य बनता है कि वह उनकी कुशलक्षेम पूछें और राज्य सरकार से उनकी सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए कहें क्योंकि लोकसभा अध्यक्ष ही इस सदन के सभी सदस्य सांसदों के अधिकारों के संरक्षक हैं। हमारे लोकतन्त्र में शूरू से ही यह परंपरा रही है कि सत्तारूढ़ दल में बैठे नेता विपक्षी नेताओं की कुशलक्षेम का ध्यान रखते आये हैं जैसे कि पिछले दिनों कांग्रेस नेता श्रीमती सोनिया गांधी के बीमार होने पर प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी ने उनके स्वास्थ्य के बार में श्री राहुल गांधी से जानकारी प्राप्त की थी। लोकतन्त्र में राजनीति में दुश्मनी नहीं होती बल्कि प्रतिद्वंद्विता होती है और उसका आधार वैचारिक होता है।
लोकतन्त्र में हिंसा निषेध
Summary :
स्वतन्त्रता के बाद भारत को जो लोकतान्त्रिक प्रणाली हमारी आजादी की लड़ाई के पुरोधा हमें सौंप कर गये हैं उसमें अहिंसा इसके लिए खाद-पानी का काम करती है। बेशक आजादी की लड़ाई की कई धाराएं थीं जिनमें क्रान्तिकारी व नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की आजाद हिन्द फौज का भी उल्लेखनीय योगदान था परन्तु जिस नेतृत्व के पीछे देश के गरीब मजदूर से लेकर संभ्रान्त व कुलीन तक कहे जाने वाले लोग इकट्ठा हुए उसका नाम महात्मा गांधी था। महात्मा गांधी राष्ट्रपिता इसीलिए कहलाये कि उन्होंने आजादी की लड़ाई को जन आन्दोलन में तब्दील कर दिया था। उनकी इस ताकत को…


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