संविधान सभा, चुनाव आयोग व कानून

Summary :

भारत में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार व अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के मसले पर जो राजनैतिक तूफान उठा हुआ है उसकी जङें संविधान सभा तक फैली हुई हैं। आज का भारत जिस बहस में फंसा हुआ है उसकी परिकल्पना संविधान सभा के एक माननीय सदस्य स्व. शिब्बन लाल सक्सेना ने 78 साल पहले ही कर ली थी। श्री सक्सेना संविधान सभा के एेसे विलक्षण प्रतिभा के धनी सदस्य थे जिन्होंने लगभग सभी संवैधानिक पदों की नियुक्तियों के बारे में हुई बहस में बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया था। इनमें लोकसभा अध्यक्ष का पद भी शामिल था। श्री शिब्बन लाल…

भारत में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार व अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के मसले पर जो राजनैतिक तूफान उठा हुआ है उसकी जङें संविधान सभा तक फैली हुई हैं। आज का भारत जिस बहस में फंसा हुआ है उसकी परिकल्पना संविधान सभा के एक माननीय सदस्य स्व. शिब्बन लाल सक्सेना ने 78 साल पहले ही कर ली थी। श्री सक्सेना संविधान सभा के एेसे विलक्षण प्रतिभा के धनी सदस्य थे जिन्होंने लगभग सभी संवैधानिक पदों की नियुक्तियों के बारे में हुई बहस में बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया था। इनमें लोकसभा अध्यक्ष का पद भी शामिल था। श्री शिब्बन लाल सक्सेना एेसी महान शख्सियत थे जो आजादी के बाद भी लोकसभा के कई बार सदस्य रहे और एक बार उत्तर प्रदेश विधानसभा के सदस्य भी रहे। उन्होंने कांग्रेस का सांसद रहते हुए इन्दिरा गांधी की इमरजेंसी का विरोध किया और जब 1977 में बाबू जगजीवन राम ने कांग्रेस छोड़ कर अपनी अलग पार्टी ‘कांग्रेस फार डेमोक्रेसी’ बनाई तो वह भी इस पार्टी में शामिल हो गये और बाद में लोकसभा का चुनाव जनता पार्टी के टिकट पर लड़ा।
श्री सक्सेना 60 और 70 के दशक में उत्तर प्रदेश की राजनीति में गांधीवादी तरीके से अनशन करने के लिए प्रसिद्ध माने जाते थे। संविधान सभा में उनकी भूमिका के बारे में प्रख्यात अंग्रेजी स्तम्भकार लेखक व अर्थशास्त्री श्री इन्दु प्रकाश ने खासा प्रकाश डाला है। श्री सक्सेना की प्रतिभा का अन्दाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि वह 1930-31 में गोरखपुर के सेंट एंड्रयू कालेज में दर्शन शास्त्र व गणित के प्रोफेसर थे। वह जीवन पर्यन्त अविवाहित ही रहे और पूरा जीवन उन्होंने गरीब- गुरबों व वंचितों की राजनीति को गांधीवादी सिद्धान्त अपनाते हुए समर्पित कर दिया हालांकि उनका जन्म आगरा के एक रईस कायस्थ परिवार में हुआ था। उन्होंने अपने जीवन का पहला आन्दोलन 1919 में जलियांवाला कांड के विरोध में प्रख्यात पत्रकार श्री गणेश शंकर विद्यार्थी के नेतृत्व में कानपुर में किया। उनके जीवन के बारे में विस्तार से लिखने का उद्देश्य यही है कि वह गांधीवादी राजनीति के स्वतन्त्र भारत में उत्प्रेरक माने जाते थे।
संविधान सभा में जब 15 जून 1949 के दिन भारत के चुनाव आयोग की नियुक्ति के बारे में यह प्रस्ताव रखा गया कि भारत के राष्ट्रपति इसकी नियुक्ति करेंगे तो श्री शिब्बन लाल सक्सेना ने इसका विरोध किया और कहा कि इसका मतलब यह हुआ कि संसदीय प्रणाली के लोकतन्त्र में जो भी उस समय की सरकार होगी वह अपनी अनुकूलता के अनुसार देश में होने वाले चुनावों के लिए अपनी मनमर्जी का ‘रेफरी’ चुनेगी। जबकि वह चुनावों में अपनी लड़ाई अन्य पार्टियों से करेगी। श्री सक्सेना ने तत्कालीन प्रधानमन्त्री श्री जवाहर लाल नेहरू की नेकनीयती पर किसी भी प्रकार का प्रश्नचिन्ह न लगाते हुए सवाल खड़ा किया कि मगर कल को एसा हो सकता है कि जो पार्टी सत्ता में हो वह अगला चुनाव जीतने के लिए अपनी पार्टी के किसी कट्टर समर्थक को मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त कर दे। यह बात उन्होंने चेतावनी देते हुए कही। साथ ही उहोंने यह भी कहा कि वर्तमान प्रधानमन्त्री इन सभी आग्रहों से बहुत दूर हैं मगर मुख्य चुनाव आयुक्त जैसे संवैधानिक पद पर नियुक्ति को किसी एक व्यक्ति के रहमोकरम पर नहीं छोड़ा जा सकता है क्योंकि संविधान की रक्षा करने की जिम्मेदारी से वह भी बंधा होगा। हम जो संविधान बना रहे हैं वह आज के लिए नहीं बल्कि हमेशा के लिए बना रहे हैं।
श्री सक्सेना ने प्रस्ताव रखा कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति संसद में दो-तिहाई बहुमत से होनी चाहिए। मगर इसका अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि चुनाव आयुक्त संसद के प्रति जवाबदेह होगा बल्कि यह होगा कि किसी एक पार्टी के लिए अपने मनपसन्द का युनाव आयुक्त बनाना असंभव हो जायेगा। मगर संविधान सभा में श्री सक्सेना का यह संशोधन प्रस्ताव पारित नहीं हो सका और वह गिर गया। इसके अगले दिन प्रख्यात विधिवेत्ता श्री हृदयनाथ कुंजरू ने पुनः यह सवाल खड़ा किया और कहा कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के मामले से राज्य सरकारों को इस वजह से अलग रखा गया है कि वे राजनैतिक पूर्वाग्रहों से ग्रस्त हो सकती हैं मगर इस बात की क्या गारंटी है कि केन्द्र सरकार राजनैतिक पूर्वाग्रह से ग्रस्त नहीं होगी ? श्री कुंजरू चाहते थे कि चुनाव आयुक्तों को अपना कार्य पूरी निडरता व निष्पक्षता और तटस्थता से करने देने के लिए जरूरी संवैधानिक सुरक्षा भी प्रदान की जाये। इस पद पर केवल एेसे ही व्यक्तियों को बैठाने की प्रणाली शुरू की जाये जिनकी विश्वसनीयता पर कोई भी शक की अंगुली न उठा सके वरना लोकतन्त्र के स्रोत में ही जहर घुल जायेगा।
संविधान निर्माता बाबा साहेब अम्बेडकर ने सदस्यों की इन चिन्ताओं को सम्मान सहित संज्ञान में लेते हुए कहा कि वे इन चिन्ताओं को गलत नहीं मानते हैं मगर वह वर्तमान में बीच के रास्ते के तौर पर व्यवस्था कर रहे हैं कि संविधान में चुनाव आयोग की स्थापना की जायेगी और मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाना आसान काम नहीं होगा मगर भविष्य में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति किस प्रकार होगी, इसका फैसला संसद पर ही छोड़ा जाता है। चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति सम्बन्धी प्रक्रिया के सन्दर्भ में संविधान का 324वां अनुच्छेद बनाया गया। मगर इस अनुच्छेद के तहत आजादी के बाद से बनी किसी भी सरकार ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के बारे में कानून नहीं बनाया। जब 2023 में इस मामले से सम्बन्धित याचिका सर्वोच्च न्यायालय में आयी तो तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश श्री चन्द्रचूड़ की पीठ ने फैसला दिया कि जब तक संसद अनुच्छेद 324 के तहत कानून नहीं बनाती है तब तक चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति एक समिति करे जिसमें प्रधानमन्त्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता व मुख्य न्यायाधीश शामिल हों। इसके बाद मोदी सरकार ने संसद में कानून बना कर चुनाव आयुक्तों की प्रक्रिया को अधिकृत रूप दिया और नियुक्ति समिति में प्रधानमन्त्री व एक मन्त्री और विपक्ष के नेता को रखा, जिस पर विपक्ष ने हो-हल्ला मचाना शुरू किया। वर्तमान सन्दर्भों में विपक्षी दलों ने हाल ही में हुए चुनावों की विश्वसनीयता पर ही प्रश्नचिन्ह लगाये रखा है और आरोप है कि चुनाव आयोग विशेष मतदाता गहन पुनरीक्षण के नाम पर वैध मतदाताओं के नाम मतदाता सूचियों से काट रहा है। अभी तक जिन 30 राज्यों व केन्द्र शासित क्षेत्रों में पुनरीक्षण का काम हो चुका है वहां 13 करोड़ 27 लाख मतदाताओं के नाम कट चुके हैं जबकि भारत में कुल मतदाताओं की संख्या 98 करोड़ से ऊपर बताई जाती है। विपक्षी दल कह रहे हैं कि जिन- जिन राज्यों में भी हालिया चुनाव हुए हैं वहां सभी में मतदान पुनरीक्षित सूचियों के आधार पर ही हुए अतः ये चुनाव विश्वसनीय नहीं माने जा सकते क्योंकि प्रत्येक राज्य में लाखों मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग ही नहीं कर सके।
दूसरी ओर एेसे सभी मामले सर्वोच्च न्यायलय में लम्बित हैं यहां तक कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति का मामला भी। अतः सारा मामला कानूनी पचड़े में हैं। मगर इस सबसे ऊपर यह तय है कि चुनाव आयोग वर्तमान में भी न तो किसी पार्टी और न सरकार के प्रति जवाबदेह है। इसकी जवाबदेही केवल संविधान के प्रति है और यह संविधान से ही सीधे शक्ति लेकर अपना कार्य निष्पादन करता है।

Team Desk