‘याद रखना जब मांगने से भी कागज़-कलम न मिले तो
अपनी उंगुलियों को भी खूं में डुबोना पड़ता है
इबारतों के लिए शहर की दीवारें पड़ जाए कम तो
हर लफ्ज़ को आसमां में बिछाना पड़ता है’
‘एनसीयूआई’ यानी नेशनल कॉपरेटिव यूनियन ऑफ इंडिया के चुनाव में पहली बार भाजपा व संघ की आमने-सामने की भिड़ंत के दीदार हो रहे हैं। केंद्रनीत भाजपा सरकार के लिए भी सहकारी आंदोलन या उससे अर्जित समितियां उसकी नाक का सवाल बन गई हैं। ताजा मामला एनसीयूआई के संपन्न हुए हालिया चुनाव का है, फिलवक्त यह मामला कोर्ट में जा चुका है और अगले कुछ दिनों में ही इस पर न्यायालय का फैसला आने वाला है। दरअसल इस विवाद की शुरुआत तब हुई जब केंद्र सरकार ने अपनी तीन नवगठित सहकारी समितियों को भी एनसीयूआई चुनाव में वोटिंग के अधिकार दे दिए, जबकि एनसीयूआई पर दबदबा रखने वाली संघ पोषित ‘सहकार भारती’ की राय इससे अलहदा थी, इसका मानना था कि ‘इन तीनों नवगठित सहकारी समितियों यानी राष्ट्रीय सहकारी निर्यात लिमिटेड (एनसीईएल), राष्ट्रीय सहकारी आर्गेनिक लिमिटेड (एनसीओएल) और भारतीय बीज सहकारी समिति लिमिटेड (बीबीएसएसएल) को कम से कम इस बार वोटिंग का अधिकार नहीं मिलना चाहिए।’ पर इन तीनों नवगठित समितियों ने भी इस चुनाव में अपने वोट के अधिकार का प्रयोग कर लिया, जबकि कोर्ट की राय भी इस मामले में पहले से सहकार भारती के साथ थी, सो फिलवक्त गेंद कोर्ट के पाले में है।
सूत्रों की मानें तो भले ही एनसीयूआई के बोर्ड पर सहकार भारती का दबदबा हो पर केंद्र सरकार अपने प्रिय व इसके मौजूदा अध्यक्ष दिलीप संघानी की ही वापसी चाहती है, जो गुजरात के अमरेली से भाजपा के सांसद व विधायक रह चुके हैं, ये 2007 में राज्य की नरेंद्र मोदी सरकार में कृषि, सहकारिता व कानून मंत्री भी रह चुके हैं। वहीं संघ की पहली पसंद डीएन ठाकुर यानी दीनानाथ ठाकुर हैं, जिन्होंने भारत के सबसे बड़े सहकारिता संगठन सहकार भारती की लंबे समय तक अगुवाई की है, ये मूल रूप से बिहार के रहने वाले हैं। इस खेल में तीसरे खिलाड़ी के तौर पर एस. विशाल सिंह की भी एंट्री हो चुकी है, जो चर्चित भाजपा नेता बृजभूषण शरण सिंह के दामाद भी हैं और वर्तमान में एनसीसीएफ के अध्यक्ष हैं।
माना जाता है कि संघ की ओर से इसके नंबर दो दत्तात्रेय होसाबोले स्वयं इस पूरी चुनावी प्रक्रिया पर नज़र रख रहे हैं, दत्तात्रेय ने ही भाजपा के संगठन महामंत्री बीएल संतोष को यह अहम जिम्मेदारी सौंपी हुई है कि वे इस चुनाव में संघ के हितों का ध्यान रखें, संतोष के साथ कुलवंत चहल ने भी इसके प्रबंधन में दिन रात एक कर दिया था। कहते हैं अकेले सहकार भारती के इस चुनाव में इतने वोट हैं कि सरकार के लिए भी इसे किनारे लगा पाना आसान नहीं होगा।
कृभको में भी मामला गरम है
कृभको यानी कृषक भारती सहकारी लिमिटेड के मौजूदा अध्यक्ष वी. सुधाकर चौधरी आने वाले इस सितंबर माह में अपने कार्यकाल का एक वर्ष पूरा कर लेंगे, पर सूत्रों की मानें तो कृभको में सब कुछ सामान्य ढंग से नहीं चल रहा है, माना जाता है कि पिछले काफी समय से बोर्ड बनाम अध्यक्ष की भिड़ंत की वज़ह से कई अहम फैसले अटक जा रहे हैं। दरअसल, कृभको पर लंबे समय तक सपा के पूर्व सांसद चंद्रपाल यादव का एक अघोषित कब्जा रहा है।
जब सितंबर 2025 में भी कृभको बोर्ड के नए चुनाव हुए तो माना जाता है कि इसके 11 में से 10 वोट चंद्रपाल की तरफदारी वाले थे। उन्हें चुनौती मिल रही थी तो बस आंध्र के वी. सुधाकर चौधरी से जिन्हें चंद्रबाबू नायडू व वेंकैया नायडू का बहुत खास व्यक्ति माना जाता है। सूत्रों की मानें तो स्वयं चंद्रबाबू ने भाजपा के एक बड़े नेता को फोन कर सुधाकर चौधरी को कृभको का नया अध्यक्ष बनाए जाने की गुजारिश की थी। कहते हैं इसके बाद बड़े नेता ने इन 11 बोर्ड मेम्बर को तलब कर उनसे पूछा कि ‘वे नए अध्यक्ष के तौर पर किसको देखना चाहते हैं’, तो 11 में से 10 मेंबर ने इकट्ठा होकर कहा कि आप इस सुधाकर चौधरी को छोड़ कर हम 10 में से किसी को भी बना दो, हमें कोई आपत्ति नहीं होगी।
इस पर उक्त नेता ने पूरा गेम पलटते हुए कहा-अगर हम सुधाकर चौधरी को ही बनाना चाहें तो?’ दूसरी ओर से सन्नाटा छा गया, चौधरी कृभको के नए चेयरमैन घोषित हो गए। पर बाकी के मेंबर अब भी चौधरी के फैसलों को सहज़ता से नहीं ले पा रहे, चुनांचे वहां हमेशा टकराव की स्थिति बनी रहती है, तमाम बड़े फैसले अटक-अटक कर आगे बढ़ते हैं।
स्पीकर की चाय को बाय !
संसद का यह मानसून सत्र बेहद हंगामेखेज रहा, पक्ष-विपक्ष के दरम्यान ऐसी टंकार अतीत में बहुत कम देखने को मिली है। 22 जुलाई से लेकर 13 अगस्त तक संसद का मानसून सत्र आहूत था, इनमें से बस 19 दिन सदन चला। आखिरी दिन यानी 13 अगस्त को तो बस एक मिनट के लिए सदन चला। संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू की मानें तो इस मानसून सत्र में लोकसभा की उपयोगिता 19 फीसदी तो राज्यसभा की 39 फीसदी रही। 13 अगस्त को ही लोकसभा व राज्यसभा का कार्यकाल अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हो जाने के बाद लोकसभा स्पीकर ने पारंपरिक चाय पार्टी का आयोजन किया, ऐसा हमेशा से एक परंपरा के तौर पर होता रहा है, पर पक्ष-विपक्ष में कटुता का जरा आलम देखिए कि कांग्रेस समेत पूरे विपक्ष (डीएमके को छोड़ कर) ने स्पीकर की इस चाय पार्टी का बायकॉट कर दिया।
डीएमके की एकमात्र प्रतिनिधि के तौर पर कनिमोझी इस पारंपरिक मिलन समारोह में नज़र आईं। जबकि सत्ता पक्ष की ओर से पीएम मोदी, राजनाथ सिंह समेत कई वरिष्ठ मंत्री इसमें मौजूद थे। राज्यसभा के सभापति सीपी राधाकृष्णन ने भी उच्च सदन के सदस्यों के लिए ऐसे ही एक पारंपरिक टी-पार्टी का आयोजन किया था, जिसमें सोनिया गांधी के साथ कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे भी नज़र आए।
हिल रहीं हैं सम्राट के सल्तनत की चूलें
बांकीपुर उपचुनाव के हार का दंश बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के हौसलों को बेदम कर रहा है, आम तौर पर उपचुनावों की हार-जीत को भाजपा हाईकमान कभी इतनी भी गंभीरता से नहीं लेता जैसा वह बांकीपुर के साथ कर रहा है, और करे भी क्यों न यह िशकस्त कोई मामूली थोड़े ही हैं, वे तो अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष की सीट गंवा बैठे हैं। सो, सम्राट चौधरी को दिल्ली दरबार में तलब किया गया, उनसे कहा गया कि ’आप तो अपने को ‘एक्शन मैन’ बताते थे, कहते थे हमेशा रिजल्ट दूंगा, यही है आपका रिजल्ट?’ कहते हैं बचाव में सम्राट ने कह दिया कि ‘हमने टिकट एक ‘गलत च्वॉइस’ को दे दी थी? उनको तो क्षेत्र में भी कोई जानता भी नहीं था।’
भाजपा चाणक्य के सब्र का बांध टूट चुका था, उन्होंने किंचित सख्त लहज़े में कहा-आपकी जिम्मेदारी यहां पार्टी को जिताने की थी, बीच में यह व्यक्ति कहां से आ गया? इसके बाद सम्राट के गद्दी संभालने के बाद के हालात पर चर्चा हुई, दिल्ली ने कहा कि आप न भ्रष्टाचार पर काबू कर पा रहे हैं और न ही राज्य में बढ़ते अपराधों पर ही लगाम कस पा रहे हैं। कहते हैं चाणक्य ने सम्राट को यह भी आगाह किया है कि राज्य का यह पहला चुनाव है जब अगड़े वोटर्स भी हमारा साथ छोड़ विपक्षी पाले में चला गया है। सो, सम्राट को यह हिदायत मिली है कि वे अपने काम-काज का अंदाज बदलें, वरना दिल्ली उन्हें बदलने में एक मिनट की देर नहीं लगाएगा।
जदयू का अस्तित्व बना रहेगा
बांकीपुर चुनाव की हार से भाजपा ने एक सबक और कंठस्थ कर लिया है कि जदयू का अस्तित्व मिटाना भाजपा के हक में नहीं। नहीं तो पहले सम्राट ने इसी वादे के साथ अपने सिंहासन का अंगीकार किया था कि ‘आने वाले वक्त में वे पूरी जदयू पार्टी का विलय भाजपा में करवा देंगे।’ अब भाजपा रणनीतिकारों को इस बात का बखूबी इल्म हो चुका है कि एक मजबूत जदयू ही राज्य में कमल को मजबूती दे सकता है। क्योंकि नीतीश कुमार की अपनी एक ईमानदार छवि है, इसी वज़ह से वे सामान्य रूप से पिछड़ी जातियों में भी पसंद किए जाते रहे हैं, अगड़े वोटरों को भी उनसे कभी एलर्जी नहीं रही और महिला वोटरों ने तो जाति-धर्म से ऊपर उठ कर उनका साथ दिया है।
छवि की इस प्रतिद्वंद्विता में सम्राट नीतीश से काफी पीछे छूट जाते हैं। भाजपा को एक डर यह भी सता रहा है कि अगर जदयू का विलय पूरी तरह भाजपा में हो गया तो पिछड़े वोटर जदयू से छिटक कर तेजस्वी के पाले में जा सकते हैं। रही बात अगड़े वोटरों की तो उन्हें साधना तो और भी जरूरी है क्योंकि आने वाले यूपी चुनाव में वहां अगड़े वोटरों की तादाद बिहार के अगड़े वोटरों से लगभग दुगुनी है, जैसे वैश्य बिहार में पिछड़ी जाति में शुमार हैं तो यूपी में यह अगड़ी जाति का हिस्सा हैं।’ सो, काफी सोच-विचार करने के बाद अब भाजपा रणनीतिकार भूले-बिसरा, नीतीश कुमार को ठंडे बस्ते से निकाल कर झाड़ पोंछ कर चमका रहे हैं, बांकीपुर हार के तुरंत बाद शायद इसीलिए नीतीश को ‘दिल्ली’ ने फीडबैक के लिए बुलाया था।



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