तृणमूल की बगावत कथा

Summary :

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस की करारी हार के बाद पार्टी अध्यक्ष ममता बनर्जी अत्यंत मुश्किलों का सामना कर रही हैं। पार्टी के 80 में से 58 विधायक पहले ही बगावत कर अपना अलग गुट बना चुके हैं। इस अलग गुट ने ऋतब्रत बनर्जी को इस गुट का नेता बनाया है और पश्चिम बंगाल विधानसभा अध्यक्ष ने उन्हें नेता प्रतिपक्ष के तौर पर मान्यता भी दे दी है। सोमवार को इंडिया गठबंधन की बैठक में ममता बनर्जी भाग ले रही थी तो दूसरी तरफ पार्टी के 20 सांसद लोकसभा अध्यक्ष को अपनी निष्ठा बदलने का पत्र दे चुके हैं।…

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस की करारी हार के बाद पार्टी अध्यक्ष ममता बनर्जी अत्यंत मुश्किलों का सामना कर रही हैं। पार्टी के 80 में से 58 विधायक पहले ही बगावत कर अपना अलग गुट बना चुके हैं। इस अलग गुट ने ऋतब्रत बनर्जी को इस गुट का नेता बनाया है और पश्चिम बंगाल विधानसभा अध्यक्ष ने उन्हें नेता प्रतिपक्ष के तौर पर मान्यता भी दे दी है। सोमवार को इंडिया गठबंधन की बैठक में ममता बनर्जी भाग ले रही थी तो दूसरी तरफ पार्टी के 20 सांसद लोकसभा अध्यक्ष को अपनी निष्ठा बदलने का पत्र दे चुके हैं। पश्चिम बंगाल की राजनीति ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि आज के दौर में सिद्धांत और विचारधारा की कोई कीमत नहीं है।

आज के दौर में सुविधा की राजनीति जनादेश से कहीं अधिक शक्तिशाली हो चुकी है। पार्टी भी वही है लेकिन वफादारी बदल गई है। पार्टी से अलग होने की घोषणा करने वाले विधायकों और सांसदों की संख्या दो-तिहाई से ज्यादा है इसलिए दलबदल कानून के प्रावधानों का कोई असर उन पर नहीं पड़ेगा। तृणमूल के झंडे और उसकी विचारधारा के नीचे जनता के वोट हासिल कर जीतने वाले जनप्रतिनिधि पार्टी तोड़कर या दलबदल कर लोकतंत्र को ​कितना मजबूत कर पाएंगे, यह सवाल भी अब पुराना हो चुका है। क्योंकि देश में आया राम-गया राम की संस्कृति कोई नई नहीं है।

थोक में दलबदल पहले भी होते रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस की नियति भी महाराष्ट्र की शिवसेना और एनसीपी जैसी हो चुकी है। आज कानून की नजर में (असली शिवसेना) महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के पास है जबकि मराठा क्षत्रप शरद पवार की एनसीपी उन्हीं की परिवार की बहू स्वर्गीय अजित पवार की पत्नी सुनेत्रा पवार के कब्जे में है। अजित प​वार की विमान हादसे में माैत के बाद उनके गुट ने भाजपा से गठबंधन कर लिया और सुनेत्रा प​वार उपमुख्यमंत्री बन गईं। इतिहास को देखा जाए तो ममता बनर्जी ने भी कांग्रेस से विद्रोह कर अपनी पार्टी का गठन किया था। ममता बनर्जी ने पहले भाजपा की मदद लेकर पश्चिम बंगाल में कांग्रेस को कमजोर किया था, फिर उसे पूरी तरह खत्म कर दिया।

1997 में ममता बनर्जी कांग्रेस में पूरी तरह से अलग-थलग पड़ चुकी थीं और वह अपने बागी तेवर दिखाने लगी थीं। मतभेद इतने बढ़ गए कि ममता बनर्जी ने अपनी राह अलग कर ली। ममता बनर्जी ने जनवरी 1998 में कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस बनाई थी। फरवरी में लोकसभा के मध्यावधि चुनाव हुए। यह चुनाव उन्होंने भाजपा से समझौता करके लड़ा था। पश्चिम बंगाल में टीएमसी दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी तब कांग्रेस का केवल एक सांसद जीता था। इसके बाद हुए विधानसभा चुनावों में ममता ने वामपंथियों को साफ किया और कांग्रेस को दूसरे नम्बर पर पछाड़ दिया। कभी ममता ने कांग्रेस की तुलना तरबूज से करते हुए कहा था कि वह ऊपर से हरा लेकिन अन्दर से लाल है। उन्होंने कांग्रेस पर वामपंथियों से सांठगांठ का आरोप लगाया था।

इसमें कोई संदेह नहीं कि ममता बनर्जी ने अपनी पार्टी को लेकर कई गलतियां कीं। लगातार तीन कार्यकाल सत्ता में रहने के बाद भ्रष्टाचार, निरंकुश शासन, असहमति का दमन और महिलाओं के खिलाफ हिंसा के कारण टीएमसी का पतन लंबे समय से तय था। इन सब ने प्रशासन और पार्टी दोनों में जनता के विश्वास को लगातार कमज़ोर किया, वहीं अभिषेक बनर्जी की बढ़ती भूमिका ने वरिष्ठ नेताओं की उस पीढ़ी को पार्टी से दूर कर दिया, जिन्होंने पार्टी को ज़मीनी स्तर से खड़ा किया था। मुख्यमंत्री सुभेंदु अधिकारी राज्य में भाजपा के पहले मुख्यमंत्री कभी ममता बनर्जी के सबसे भरोसेमंद सहयोगियों में से थे।

वे भतीजे के बढ़ते प्रभाव से नाराज़ थे और उन पर केंद्रीय एजेंसियों का दबाव भी था जो उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के गंभीर मामलों की जांच कर रही थीं। टीएमसी को सत्ता के लिए राज्य संसाधनों, स्थानीय प्रशासन और पुलिस तंत्र का इस्तेमाल करने में कोई संकोच नहीं था, लेकिन वह भाजपा का सामना नहीं कर सकी, जो खेल के नियमों को और भी आगे बढ़ाने को तैयार है। टीएमसी बनाम टीएमसी की इस लड़ाई में वैध टीएमसी होने का दावा करने वाले दोनों गुटों की स्थिति को लेकर लंबी कानूनी लड़ाई चलेगी। यह घटनाक्रम पश्चिम बंगाल की दशकों पुरानी जहरीली राजनीतिक संस्कृति को भी उजागर करता है, जो ​हिंसा और अवसरवादिता से ग्रस्त है।

टूट-फूट के बीच केन्द्र सरकार भी अपना समीकरण बनाने में जुटी हुई है। एनडीए सरकार को हाल ही में तब झटका लगा जब संविधान (एक सौ इकतीसवां संशोधन) बिल, या डिलिमिटेशन बिल, जो चुनावी सीमाओं को फिर से बनाने और लोकसभा की ज़्यादा से ज़्यादा सीटों की संख्या 545 से बढ़ाकर 850 करने की कोशिश करता है, वह अप्रैल में लोकसभा में ज़रूरी दो-तिहाई बहुमत से कम रहने पर गिर गया। सरकार इस कानून को फिर से लाने और 2029 के लोकसभा चुनावों से पहले वन नेशन-वन इलेक्शन बिल लाने पर भी विचार कर रही है। हाल के विधानसभा चुनावों में टीएमसी और डीएमके को लगे झटकों के साथ बीजेपी लीडरशिप ने भी डीएमके से संपर्क करना शुरू कर दिया है, जिसने सूत्रों के मुताबिक केंद्र को मुद्दों पर आधारित समर्थन पर विचार करने की इच्छा दिखाई है।

केन्द्र सरकार परिसीमन बिल पर एक संशोधित प्रारूप तैयार कर रही है, ​जिसमें बीएनके जैसी क्षेत्रीय पार्टियों की उठाई गई खास ​​चिंताओं को दूर किए जाने की उम्मीद है। ऐसे में टीएमसी का बागी गुट और डीएमके परिसीमन बिल पर सरकार को समर्थन देता है तो भाजपा ​बिल पास कराने में मुश्किल नहीं आएगी। आज की राजनीति में सत्ता का सिरा थामने की प्रवृत्ति जोर पकड़ रही है। सिद्धांतों, राजनीतिक मर्यादाओं और लोकलज्जा की परवाह किसी को भी नहीं है।

Aditya Chopra

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