एसआईआर पर सुप्रीम निर्णय

Summary :

बीते एक साल से विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की देशभर में चर्चा है। पिछले साल जून में ये प्रक्रिया बिहार में शुरू की गई और उसके बाद इसे नौ राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में करवाया गया। विपक्ष एसआईआर पर लगातार सवाल उठाता रहा है। हाल में पश्चिम बंगाल में हुए विधानसभा चुनाव में भी एसआईआर को लेकर काफी चर्चा रही। कुछ ही दिन पहले 27 मई को सुप्रीम कोर्ट ने एक निर्णय में एसआईआर को वैध करार दिया है। ऐसे में अहम सवाल यह है कि इस निर्णय के क्या मायने हैं? क्या सुप्रीम कोर्ट के निर्णय…

बीते एक साल से विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की देशभर में चर्चा है। पिछले साल जून में ये प्रक्रिया बिहार में शुरू की गई और उसके बाद इसे नौ राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में करवाया गया। विपक्ष एसआईआर पर लगातार सवाल उठाता रहा है। हाल में पश्चिम बंगाल में हुए विधानसभा चुनाव में भी एसआईआर को लेकर काफी चर्चा रही। कुछ ही दिन पहले 27 मई को सुप्रीम कोर्ट ने एक निर्णय में एसआईआर को वैध करार दिया है। ऐसे में अहम सवाल यह है कि इस निर्णय के क्या मायने हैं? क्या सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद विपक्षी दलों द्वारा एसआईआर को लेकर उठाये गये सवाल और संदेह दूर हो गये हैं? क्या विपक्ष अब एसआईआर का विरोध नहीं करेगा?
सर्वोच्च अदालत ने चुनाव आयोग के एसआईआर को पूरी तरह वैध और संवैधानिक करार दिया है। इसे स्वतंत्र, निष्पक्ष, पारदर्शी चुनाव और शुद्ध, साफ मतदाता सूची के संदर्भ में चुनाव आयोग का संवैधानिक अधिकार भी माना है। संविधान के अनुच्छेद 324 और जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 21 (3) का किसी भी तरह उल्लंघन स्वीकार नहीं किया है। ‘वोट चोरी’ और ‘नागरिकता छीन लेने’ सरीखे विपक्ष के आरोपों और याचिकाओं को भी खारिज कर दिया है। न्यायिक पीठ का मानना है कि मतदाता सूची से नाम कटने का अर्थ यह नहीं है कि आप भारत के नागरिक नहीं हैं। नागरिकता का अंतिम फैसला सक्षम अथॉरिटी यानी केंद्रीय गृह मंत्रालय लेगी। अलबत्ता आयोग नागरिकता की सीमित जांच कर सकता है, ताकि पात्र मतदाता तय किया जा सके। नागरिकता का विचाराधीन निर्णय आगामी 2029 के लोकसभा चुनाव और उसके बाद के विधानसभा चुनावों तक ले लिया जाना चाहिए।
लब्बोलुआब यह है कि एसआईआर संवैधानिक है और आगे भी जारी रहेगा। सर्वोच्च अदालत ने किसी भी प्रकार की ‘रोक’ से साफ इंकार कर दिया। अधिकांश याचिकाएं बिहार के संदर्भ में थीं, लिहाजा एसआईआर के तहत जिन 7.2 करोड़ नाम मतदाता सूचियों से काट दिए गए हैं, उन पर सर्वोच्च अदालत ने कुछ नहीं कहा। सवाल मौजू है कि क्या वे लोग विदेशी नागरिक या घुसपैठिए हैं? क्या उनके नाम न्यायिक समीक्षा के चक्रव्यूह में फंस कर रह जाएंगे? आयोग ऐसे लोगों का अधिकृत आंकड़ा ही दे दे, बेशक व्यक्ति की पहचान न बताए। यदि इन नामों में से अधिकांश भारत के नागरिक हैं, तो वे मतदाता क्यों नहीं हैं? बुनियादी संवैधानिक व्यवस्था यही है कि जो पात्र नागरिक है, वह मतदाता भी है, लेकिन एसआईआर की प्रक्रिया पर सवाल खड़े किये हैं।
चुनाव आयोग में कोई एक व्यक्ति नहीं होता है। वह एक संस्था है और उसके अपने अधिकार हैं, लेकिन वह भी अपने संवैधानिक अधिकारों से ऊपर नहीं जा सकता है। चुनाव आयोग संविधान के तहत मिले अधिकारों का पालन करता है। हालांकि, जब वह सख्ती से नियमों का पालन करता है तो इससे कुछ राजनीतिक दलों के नेताओं के पेट में दर्द होने लगता है। चुनाव आयोग 14 राज्यों और संघशासित क्षेत्रों में एसआईआर का अभियान समाप्त कर चुका है। 19 राज्यों और केंद्र शासित क्षेत्रों में अभी बाकी है। वहां जून से अभियान शुरू हो रहा है।
जहां तक विपक्ष के विरोध का सवाल है, उसके पास कोई ठोस मुद्दा नहीं है। ऐसे में चर्चा में बने रहने के लिए वो समय-समय पर सरकार और संवैधानिक संस्थाओं की साख धूमिल करने की नीयत से तर्क और तथ्य हीन मुद्दे उठाते रहता है। विपक्षी दलों ने 2019 और 2024 के आम चुनाव में संविधान को खतरे में बता रहे थे। अभी एसआईआर के विषय को लेकर दुष्प्रचार किया गया। एसआईआर के बाद कई राज्यों में हुए चुनाव में मतदाताओं को लाभ ही हुआ है। चुनावी व्यवस्था में पारदर्शिता को बढ़ावा मिला है, मतदान का प्रतिशत भी बढ़ा है। असल में विपक्ष जहां जीत जाता है वहां उसे सारी व्यवस्था सही और संवैधानिक लगती है। हार जाने पर अपनी कमियों और गलतियों पर गंभीरता से चिंतन मंथन की बजाय वो व्यवस्था और संवैधानिक संस्थाओं को कठघरे में खड़ा करने लगा है।
बिहार और पश्चिम बंगाल में हुए एसआईआर में बड़ी संख्या में युवा मतदाताओं के नाम जुड़े हैं, जबकि मृत, डुप्लीकेट और लंबे समय से बाहर रह रहे लोगों के नाम कटे हैं। वहां किसी एक पार्टी को सीधा फायदा या नुकसान होने की बात साफ तौर पर सामने नहीं आई। यूपी में भी यही पैटर्न दोहराया जा सकता है, लेकिन यहां का पैमाना और सियासी दांव कहीं बड़े हैं। इस बात के कई प्रमाण सामने आ चुके हैं कि विपक्ष विदेशी घुसपैठियों को भारत का मतदाता बनाना और उन्हें नागरिकता दिलाना चाहते हैं। विपक्ष के ऐसे कृत्यों से देश की आंतरिक सुरक्षा को खतरा होगा और सामाजिक सद्भाव बिगड़ेगा, चुनाव भी स्वतंत्र और निष्पक्ष नहीं होंगे। जो भारतीय नहीं हैं और भारतीय नागरिकता का प्रमाण नहीं दे पा रहे हैं, ऐसे लोग घुसपैठिए हैं, लेकिन उनको विपक्ष समर्थन दे रहा है। खासकर पश्चिम बंगाल में बांग्लादेशी घुसपैठियों को कवर देने का काम ममता बनर्जी की पार्टी ने किया।
पश्चिम बंगाल में भाजपा की सरकार के गठन के बाद बांग्लादेशी घुसपैठिए वापस भाग रहे हैं। सीमा पर घुसपैठिओं की कतारें विपक्ष को आइना दिखाने का काम कर रही हैं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के संदर्भ में बात करें तो मुद्दा सिर्फ इतना नहीं है कि एसआईआर पर लगाए गए विपक्ष के आरोप निराधार सिद्ध हुए हैं, बल्कि मामला उससे कहीं अधिक गंभीर है। आज विपक्षी दलों का चरित्र जनता के सामने तार-तार हो गया है। सवाल आखिर में यही है कि मतदाताओं की संख्या घटने या बढ़ने से फायदा किसे होगा। इसका जवाब अभी किसी के पास नहीं है। यह इस बात पर निर्भर करेगा कि किन इलाकों में, किस सामाजिक वर्ग के और किस उम्र के मतदाताओं के नाम सूची से बाहर होते हैं या जुड़ते हैं।
एक स्वस्थ लोकतंत्र और लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए शुद्ध मतदाता सूची अनिवार्य है। आजाद भारत में पहली बार एसआईआर नहीं हो रहा। इससे पहले भी एसआईआर की प्रक्रिया हो चुकी है। मतदाता सूची का अपडेट नियमित प्रक्रिया है। ऐसे में विपक्ष को दिक्कत किस बात की है? असल समस्या यह है कि अपनी जिम्मेदारी निभाने के बजाय विपक्ष हर मुद्दे पर भागने, हंगामा करने और संसद का बहिष्कार करने की राजनीति में मशगूल है।

Team Desk