जांच में सावधानी तो होनी ही चाहिए !

Summary :

आए दिन जब जांच एजेंसियां कहीं रेड डालती हैं तो जिसके यहां रेड पड़ती है वह तिलमिला जाता है और कहता है कि सरकार उससे बदला ले रही है। ऐसा प्रोपेगंडा विपक्षी पार्टियों द्वारा भी फैलाया जाता है, जबकि यह सच नहीं होता। जांच बदले की नियत से नहीं बल्कि कहीं किसी प्रकार की शिकायत और गड़बड़ी के बाद ही होती है। भारत की तेजी से बदलती आर्थिक और शैक्षणिक व्यवस्था में सरकारी जांच एजेंसियां कानून के शासन को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती हैं। ईडी (प्रवर्तन निदेशालय) सीबीआई (केंद्रीय जांच ब्यूरो) और आयकर विभाग जैसी संस्थाएं वित्तीय अपराधों,…

आए दिन जब जांच एजेंसियां कहीं रेड डालती हैं तो जिसके यहां रेड पड़ती है वह तिलमिला जाता है और कहता है कि सरकार उससे बदला ले रही है। ऐसा प्रोपेगंडा विपक्षी पार्टियों द्वारा भी फैलाया जाता है, जबकि यह सच नहीं होता। जांच बदले की नियत से नहीं बल्कि कहीं किसी प्रकार की शिकायत और गड़बड़ी के बाद ही होती है। भारत की तेजी से बदलती आर्थिक और शैक्षणिक व्यवस्था में सरकारी जांच एजेंसियां कानून के शासन को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती हैं। ईडी (प्रवर्तन निदेशालय) सीबीआई (केंद्रीय जांच ब्यूरो) और आयकर विभाग जैसी संस्थाएं वित्तीय अपराधों, मनी लॉन्ड्रिंग, कर चोरी और फ्रॉड के खिलाफ लगातार संघर्ष करती हैं। इनकी मेहनत, समर्पण और कई बड़ी सफलताओं की सराहना की जानी चाहिए। होता क्या है कि अच्छी नीयत के बावजूद इन एजेंसियों को अत्यधिक सावधानी बरतने की जरूरत है।
एक अधूरी जांच के आधार पर जारी प्रेस रिलीज या तीखा सार्वजनिक बयान कभी-कभी निर्दोष संस्थानों, व्यवसायों और शिक्षा केंद्रों की साख को हमेशा के लिए नष्ट कर सकता है। सालों की मेहनत एक रात में धूल-धूसरित हो सकती है। सिक्के का दूसरा रुख यह है कि कई बार बड़े-बड़े घिसे हुए सियासी दिग्गजों के विरुद्ध जांच की कार्यवाही की गुहार और केस लगाए जाते हैं तो न केवल जांच एजेंसियां बल्कि कोर्ट भी ढीले दिखाई देते हैं और लगता है कि राजनीतिक दबाव डाला जा रहा है, जैसा कि पूर्व मंत्री नजमा हेपतुल्ला के फोटो मॉर्फिंग केस में हुआ कि न तो सीबीआई ने कुछ एक्शन लिया और न ही कोर्ट ने कुछ किया सिवाय तारीख़ पे तारीख़ देने के।
जहां तक आईआईटी और अन्य इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी कराने वाली प्रतिष्ठित संस्था फिटजी से जुड़ा मामला है, वह भी उल्लेखनीय है। 1992 में स्थापित यह संस्थान पिछले 33 वर्ष से लाखों छात्रों को आईआईटी-जी की तैयारी करा रहा है और देश के कोचिंग जगत में अपनी अलग पहचान रखता है। 26 अप्रैल को प्रवर्तन निदेशालय ने अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर विस्तृत प्रेस रिलीज जारी की। इसमें फिटजी पर बड़े पैमाने पर फ्रॉड का आरोप लगाया गया और दावा किया कि 206 करोड़ रुपये की संपत्ति प्रॉसीड्स ऑफ क्राइम के रूप में जब्त की गई है। ईडी ने आरोप लगाया कि संस्थान ने छात्रों को उचित सेवाएं नहीं दीं और व्यवस्थित तरीके से धन का गबन किया। इस खबर का असर तुरंत और विनाशकारी यह रहा कि बच्चों के परिवारों पर सदमा तारी हो गया। लाखों छात्रों और उनके अभिभावकों में हड़कंप मच गया, जिन्होंने वर्षों से इस ब्रांड पर अंधा भरोसा किया था, जो संस्थान देशभर में सफलता का पर्याय माना जाता था, उसकी छवि एक झटके में प्रभावित हो गई।
सुप्रीम कोर्ट में एक वरिष्ठ अधिवक्ता ने ठीक ही कहा कि सरकार की एजेंसियों को ऐसे बयान जारी करने से पहले पर्याप्त एहतियात बरतनी चाहिए। एक रात में किसी भी संगठन की साख को अपूरणीय नुक्सान पहुंच सकता है। फिटजी की तरफ से न्याय में गुहार लगाते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय का रुख किया। उन्होंने तर्क दिया कि प्रेस रिलीज मात्र प्रारंभिक विश्लेषण रिपोर्ट पर आधारित थी। शो-कॉज नोटिस तक जारी नहीं किया गया था, जो प्रक्रिया का उल्लंघन है।
न्यायमूर्ति पुरुषेंद्र कुमार कौरव की पीठ के समक्ष ईडी ने आश्वासन दिया कि सात दिनों के अंदर प्रेस रिलीज हटा ली जाएगी। उच्च न्यायालय ने 6 मई को याचिका का निस्तारण कर दिया। इससे पहले 18 मार्च को कोर्ट ने ईडी की प्रेस रिलीज में राय आधारित टिप्पणियां होने पर कड़ी टिप्पणी की थी। कोर्ट ने 2010 के गृह मंत्रालय के मेमोरेंडम की याद दिलाई, जिसमें जांच एजेंसियों को चल रही जांच के दौरान मीडिया में राय प्रकट करने या जजमेंटल भाषा का इस्तेमाल करने से साफ मना किया गया है। दुर्भाग्यवश तब तक काफी नुक्सान हो चुका था। कई फ्रैंचाइजी पार्टनर पीछे हट गए, बैंक ऋण देने में हिचकिचाने लगे, निवेशक दूर हो गए और कर्मचारियों का मनोबल बुरी तरह गिर गया। सबसे दर्दनाक बात छात्रों और अभिभावकों के विश्वास का टूटना था, जो शिक्षा क्षेत्र की नींव होती है। भारत में कोचिंग उद्योग लाखों युवाओं के भविष्य से सीधे जुड़ा हुआ है। अभिभावक अपनी पूरी पूंजी और बच्चों का बहुमूल्य समय इन संस्थानों पर लगाते हैं। यदि बिना पूरी जांच के इस तरह के बयान बार-बार आएंगे तो पूरे क्षेत्र पर गलत प्रभाव पड़ेगा। न केवल फिटजी बल्कि अन्य प्रतिष्ठित कोचिंग संस्थान, स्टार्टअप और निजी कंपनियां भी इसकी चपेट में आ सकती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि एजेंसियों को 2010 के गृह मंत्रालय के दिशा-निर्देशों का सख्ती से पालन करना चाहिए। प्रेस रिलीज केवल तभी जारी की जानी चाहिए जब पर्याप्त सबूत जुट जाएं और चार्जशीट दाखिल हो चुकी हो। अधिकारियों के प्रशिक्षण कार्यक्रमों में तथ्यात्मक जानकारी और जजमेंटल भाषा के बीच स्पष्ट अंतर सिखाया जाना चाहिए। शिक्षा क्षेत्र में संस्थागत साख की रक्षा राष्ट्रहित में बेहद जरूरी है। फिटजी जैसे संस्थान देश के इंजीनियर, डॉक्टर और सिविल सेवकों को तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते आए हैं।
इस पारिस्थितिकी तंत्र में किसी भी तरह का व्यवधान सिर्फ वर्तमान पीढ़ी को नहीं, बल्कि देश के भविष्य के टैलेंट पूल को प्रभावित करेगा। न्याय में देरी अन्याय है, जैसा कि अंग्रेज़ी कहावत है, “जस्टिस डिलेड इज़ जस्टिस डिनाईड”। यह सत्य है। लेकिन जल्दबाजी में किया गया न्याय निर्दोषों की जिंदगी बर्बाद कर सकता है। जांच एजेंसियां अपने कर्त्तव्य का पालन पूरी निष्ठा और सख्ती से करें लेकिन निष्पक्षता और प्रक्रियागत न्याय को भी सुनिश्चित करें। तभी आम जनता का इन पर विश्वास बना रहेगा और न्याय सही मायनों में न्याय बन पाएगा, तभी यह अति आवश्यक है।

फिरोज बख्त अहमद