भारत-अमेरिका के बीच नये व्यापार समझौते पर नई दिल्ली में अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधिमंडल के साथ सोमवार से अन्तिम बातचीत शुरू हो गई है अतः इस मोर्चे पर भारत को अपने राष्ट्रीय आर्थिक हित इस प्रकार सुरक्षित और संरक्षित रखने होंगे जिससे भविष्य की पीढि़यों के लिए द्विपक्षीय स्तर पर आर्थिक सम्बन्धों की वह दिशा प्रशस्त हो सके जिसमें भारत की अर्थव्यवस्था और इसके संप्रभु अधिकारों पर किसी प्रकार से भी अंगुली न उठ सके। इस सन्दर्भ में पिछले वर्ष दोनों देशों के बीच जो अन्तरिम समझौता हुआ था उसे लेकर भारत के विपक्षी दलों खासकर कांग्रेस पार्टी में भारी रोष था और उसने इस समझौते की तीखी आलोचना यह कहते हुए की थी कि इससे भारत के कृषि क्षेत्र व मध्यम श्रेणी के निर्यात समर्पित उद्योगों पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा। विगत वर्ष अगस्त में हुए अन्तरिम समझौते में अमेरिका ने भारतीय आयात दुतरफा शुल्क प्रणाली के तहत 50 प्रतिशत शुल्क दरें लगाने की घोषणा कर दी थी। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने यह व्यवस्था अपने देश के उद्योग व वाणिज्यिक हितों को सुरक्षित रखने की गरज से की थी जिसका भारतीय अर्थव्यवस्था के मानकों पर प्रतिकूल असर पड़ा था परन्तु ट्रम्प प्रशासन की इस शुल्क नीति को जब अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई तो उसने इसे अवैध करार दे दिया और निर्णय दिया की अमेरिकी सरकार विदेशों से आयातित सामान पर 10 प्रतिशत शुल्क ही लगा सकती है।
ट्रम्प ने जो दुतरफा शुल्क प्रणाली लागू की थी वह अपने देश के अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक इमरजेंसी कानून के तहत लागू की थी। इस व्यापार समझौते में भारत पर यह प्रतिबन्ध भी लगाया गया था कि वह रूस से कच्चा पैट्रोलियम तेल नहीं खरीदेगा। वाणिज्य समझौते के इस प्रवधान को भारतीय संप्रभुता के विरुद्ध बताया गया परन्तु विगत फरवरी महीने में जब अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय ने ट्रम्प प्रशासन द्वारा विदेशों से किये गये व्यापार समझौतों को रद्द कर दिया तो अमेरिका की तरफ से कहा गया कि वह भारतीय आयातित माल पर 18 प्रतिशत की दर से शुल्क लगायेगा मगर शर्त यह होगी कि भारत रूस से कच्चा तेल खरीदना धीरे-धीरे बन्द कर दे। इसके साथ ही अमेरिका से भारत को आगामी पांच वर्षों के दौरान 500 अरब डाॅलर के मूल्य की वस्तुओं का आयात करना पड़ेगा जिनमें ऊर्जा सम्बन्धी उत्पाद भी शामिल होंगे। जाहिर है कि एेसे उपबन्धों से भारत की अर्थव्यवस्था पर प्रभाव पड़ना लजिम था। मगर इसी बीच एक घटनाक्रम यह हुआ कि अमेरिका ने पश्चिम एशिया में ईरान के विरुद्ध युद्ध शुरू कर दिया जिससे विश्व के बहुत से देशों में ऊर्जा संकट की स्थिति बनती चली गई और भारत भी इससे अछूता नहीं रहा। मगर विगत वर्ष की अमेरिकी व्यापारिक घोषणाओं की वजह से भारत में विदेशी पूंजी निवेश के पलायन में वृद्धि दर्ज होने लगी और इसकी मुद्रा रुपये के मूल्य में डाॅलर के मुकाबले गिरावट दर्द होने लगी परिणामतः रुपये की कीमत में विगत वर्ष के दौरान 12 प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई और अब इसकी विनिमय दर 95 रुपए प्रति डालर के आसपास है परन्तु देश की मोदी सरकार ने इस स्थिति की गंभीरता को समझते हुए अमेरिका के साथ नये व्यापार समझौते की तरफ बढ़ना इस प्रकार शुरू किया कि भारतीय आर्थिक हितों का संरक्षण हर हालत में हो सके। यही वजह है कि भारत ने रूस से कच्चा तेल खरीदना बदस्तूर जारी रखा, हालांकि इसके लिए कहा जा रहा है कि ईरान युद्ध की वजह से अमेरिका ने भारत को रूस से कच्चा तेल खरीदने की फौरी छूट दे दी थी परन्तु अब भारत की वाणिज्य नीति यह है कि वह अपने आर्थिक हितों को देखते हुए रूस से कच्चे तेल का आयात मन मुताबिक करेगा।
अमेरिकी सर्वोच्च न्यायलय ने आगामी 24 जुलाई तक के लिए नई 10 प्रतिशत शुल्क प्रणाली लागू करने के आदेश दिये थे जिसकी मियाद जल्दी ही खत्म होने जा रही है अतः अमेरिका व भारत चाहते हैं कि नया समझौता जल्दी ही हो जाना चाहिए जिसकी वजह से अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधिमंडल भारत यात्रा पर है। इससे पूर्व भारत का प्रतिनिधिमंडल अमेरिका की यात्रा पर होकर आ चुका है लेकिन दूसरी ओर ट्रम्प सरकार अपने देश के व्यापार कानून की धारा 301 के तहत विदेशों से व्यापार समझौते करना चाहती है जिसे अमेरिकी कांग्रेस की पूरी सहमति प्राप्त है। विशेषज्ञों के अनुसार यह धारा और भी ज्यादा सख्त हो सकती है क्योंकि इसके तहत अमेरिकी सरकार अपने राष्ट्रीय आर्थिक व वाणिज्यिक हितों के संरक्षण के लिए दुतरफा शुल्क प्रणाली से भी ज्यादा कठोर कदम उठा सकती है। इसके अन्तर्गत ट्रम्प प्रशासन को यह अधिकार है कि वह अमेरिका को अपना माल निर्यात करने वाले उन देशों की जांच करे जो अमेरिकी बाजार में अपना माल बहुतायत में फैंक देते हैं। उसने 301 के तहत एेसे 16 देशों के विरुद्ध जांच चला रखी है, जिनमें चीन, यूरोपीय संघ, सिंगापुर, इंडोनेशिया, मलेशिया, कम्बोडिया, थाईलैंड, दक्षिण कोरिया, वीयतनाम, ताईवान और बांग्लादेश के साथ भारत भी शामिल है। इसके साथ ही वह 60 देशों के खिलाफ यह भी जांच करा रहा कि कहीं इनमें दबाव डाल कर या जबर्दस्ती लोगों से काम तो नहीं कराया जाता है। अतः एेेसी परिस्थितियों में भारत की सोच यह है कि भारतीय आयात पर अन्य एशियाई देशों के आयात के मुकाबले कम शुल्क दरें होनी चाहिए जिससे अमेरिका को निर्यात करना भारतीय उद्यमियों के लिए प्रतियोगी बना रहे क्योंकि अमेरिका के साथ भारत का व्यापार सन्तुलन लाभ में चलता है और यह भारतीय निर्यात का दुनिया में सबसे बड़ा बाजार है। अतः भारत को अमेरिका के साथ व्यापार समझौता इस तरह करना होगा कि इसकी संप्रभुता पूरी तरह अक्षुण्य रहे और साथ ही अमेरिका इसके कृषि क्षेत्र में किसी प्रकार का हस्तक्षेप न कर सके क्योंकि ट्रम्प अमेरिका को पुनः महान बनाने के चक्कर में व्यापार को एक अस्त्र के रूप में प्रयोग करने की नीति के पक्षधर हैं।
भारत-अमेरिकी व्यापार
Summary :
भारत-अमेरिका के बीच नये व्यापार समझौते पर नई दिल्ली में अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधिमंडल के साथ सोमवार से अन्तिम बातचीत शुरू हो गई है अतः इस मोर्चे पर भारत को अपने राष्ट्रीय आर्थिक हित इस प्रकार सुरक्षित और संरक्षित रखने होंगे जिससे भविष्य की पीढि़यों के लिए द्विपक्षीय स्तर पर आर्थिक सम्बन्धों की वह दिशा प्रशस्त हो सके जिसमें भारत की अर्थव्यवस्था और इसके संप्रभु अधिकारों पर किसी प्रकार से भी अंगुली न उठ सके। इस सन्दर्भ में पिछले वर्ष दोनों देशों के बीच जो अन्तरिम समझौता हुआ था उसे लेकर भारत के विपक्षी दलों खासकर कांग्रेस पार्टी में भारी रोष…


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