आतंकवाद की धरती पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में 21 घंटे हुए शांति पाठ का कोई नतीजा नहीं निकला। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस अपने दल-बल समेत हताश होकर बैरंग लौटे। ईरान के प्रतिनिधिमंडल ने अमेरिका की शर्तों को मानने से साफ इंकार कर दिया। जिस अविश्वास के माहौल में अमेरिका और ईरान में शांति वार्ता हुई, इसकी उम्मीद कम ही थी कि यह सिरे चढ़ेगी। इजराइल द्वारा लेबनान पर लगातार किए जा रहे हमले बड़े अवरोधक साबित हुए। मध्यस्थ बनकर पाकिस्तान को अन्तर्राष्ट्रीय फजीहत झेलनी पड़ी। पाक प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और आर्मी चीफ िमयां मुनीर अमेरिका की चमचागिरि करते दिखाई दिए लेकिन उनके हाथ कुछ न लगा। इजराइल को पाकिस्तान पर कोई विश्वास नहीं था। क्योंकि पाकिस्तान ने आज तक इजराइल को मान्यता नहीं दी है और पाकिस्तानी पासपोर्ट पर भी यह लिखा हुआ है कि यह पासपोर्ट इजराइल की यात्रा के िलए नहीं है। वैसे तो आतंकवाद की खेती करने वाले पाकिस्तान में शांति वार्ता अपने आप में हास्यस्पद रही।
असल में, यह बातचीत कई बड़े और मुद्दों में उलझी रही। सबसे बड़ा विवाद स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर था। यह दुनिया का सबसे अहम तेल मार्ग है और इसी को लेकर दोनों देशों के बीच गहरी खाई है। अमेरिका चाहता है कि यह रास्ता पूरी तरह खुला रहे और किसी तरह की रोक-टोक न हो, जबकि ईरान इस पर अपना नियंत्रण बनाए रखना चाहता है। ईरान ने साफ कर दिया है कि जब तक कोई साझा ढांचा तय नहीं होता, तब तक होर्मुज की स्थिति नहीं बदलेगी।
दूसरा बड़ा विवाद, परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को खत्म या सीमित करे, जबकि ईरान इसे अपना अधिकार मानता है और इससे पीछे हटने को तैयार नहीं है। ईरान स्पष्ट कर चुका है कि वह परमाणु बम नहीं बनाएगा लेकिन यूरेनियम संवर्धन नहीं छोड़ेगा। यही मुद्दा बातचीत में सबसे बड़ा अड़ंगा बना। जेडी वेंस ने भी इशारा किया कि यही मुख्य कारण है जिसकी वजह से समझौता नहीं हो पाया।
इतिहास गवाह है कि अमेरिका ने ईराक, लीबिया, अफगानिस्तान समेत कई देशों को बर्बाद किया है। दरअसल अमेरिका लीबिया मॉडल की तरह ईरान से सब कुछ आत्मसमर्पण कराना चाहता था। अमेरिकी खुफिया विभाग ने पाकिस्तानी परमाणु वैज्ञानिक अब्दुल कादिर खान ने परमाणु तस्करी नेटवर्क द्वारा लीबिया को दी जा रही सहायता का पर्दाफाश किया तो अमेरिका ने लीबिया को रोकने का फैसला किया। 19 दिसम्बर, 2003 को लीबिया के लम्बे समय तक राष्ट्रपति रहे कर्नल मुअम्मर गद्दाफी ने त्रिपोली के सामूहिक विनाश के हथियार कार्यक्रम को त्यागकर और यह सत्यापित करने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय निरीक्षकों का स्वागत करके दुनिया को चौंका दिया कि लीबिया अपनी प्रतिबद्धता का पालन करेगा। गद्दाफी की घोषणा के बाद अमेरिका, ब्रिटेन और अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों के निरीक्षकों ने लीबिया के परमाणु हथियारों के साथ-साथ उसकी सबसे लम्बी दूरी को बैलिस्टिक मिसाइलों को नष्ट करने का काम किया। वाशिंगटन ने लीबिया के साथ द्विपक्षीय संबंधों को सामान्य बनाने की दिशा में कदम उठाए। 2011 में जब लीबिया में गृह युद्ध छिड़ा तो स्थिति काफी बिगड़ गई। तब अमेरिका ने लीबिया से धोखा किया। अमेरिका ने रासायनिक हथियारों का बहाना बनाकर कर्नल गद्दाफी का शासन पलट दिया। विद्रोही बलों ने कर्नल गद्दाफी को ढूंढकर मार डाला। आज तक त्रिपोली में स्थिित नहीं सुधरी। अमेरिका ने इराक में सद्दाम हुसैन का क्या हश्र किया वो सब जानते हैं। ईरान को अमेरिका पर भरोसा नहीं है, इसलिए उसने अपना संवर्धित यूरेनियम ईरान अपनी संप्रभुत्ता अमेरिका को िगरवी कैसे दे सकता है।
पाकिस्तान की सैन्य टुकड़ी का सऊदी अरब पहुंचना संदेह को और गहरा कर गया। भले ही कहा गया िक यह तैनाती पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच हुए संयुक्त रणनीतिक रक्षा समझौते के तहत हुई है। जिसके तहत किसी भी देश के खिलाफ बाहरी हमला दोनों देशों के खिलाफ हमला माना जाएगा। शांति वार्ता टूटने के बाद स्थितियां काफी जटिल हो चुकी हैं। ट्रम्प फिर से ईरान को पाषाण युग में भेजने की धमकियां देने लगे हैं और ईरान का कहना है कि वह फिर से युद्ध के लिए तैयार है। ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट को लेकर भी झुकने से साफ इंकार कर दिया। 28 फरवरी के बाद से ही होर्मुज स्ट्रेट बंद है। ईरान का होर्मुज स्ट्रेट पर नियंत्रण कायम है। हाेर्मुज से ईरान की इजाजत के बगैर कोई जहाज नहीं गुजर सकेगा और वह जहाजों से टोल भी वसूलेगा। वार्ता विफल होने के बाद युद्ध के नए फ्रंट खुलने का खतरा पैदा हो गया है। अगर सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देश युद्ध में कूदते हैं तो पूरी दुनिया के लिए अभूतपूर्व संकट खड़ा हो जाएगा।
दूसरी आेर तुर्किये ने भी इजराइल पर हमले की धमकी दे दी है। इजराइल और हिज्बुल्लाह में वॉर-पलटवार जारी है। युद्ध के लम्बा खिंचने का अर्थ यही है कि अब रण बहुत भीषण होगा। अमेरिका ईरान के परमाणु स्थलों पर अटैक से लेकर ग्राऊंड ऑपरेशन तक करने को तैयार है। होर्मुज को लेकर भी लड़ाई तेज हो सकती है, जिसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा। अमेरिका चीन को भी धमका रहा है कि वह ईरान को हथियार न दे। रूस भी पर्दे के पीछे रहकर खेल खेल रहा है। खाड़ी क्षेत्र वैश्विक शक्तियों का अखाड़ा बनने जा रहा है। आने वाले दिनों में स्थितियां क्या मोड़ लेती हैं, क्या दूसरे दौर की वार्ता के द्वार खुलेंगे? या फिर गतिरोध बना रहेगा, कुछ कहा नहीं जा सकता।




















