नए रोल में पाकिस्तान-निभाना नहीं आसान

Summary :

‘जिन्होंने हमेशा अपना जमीर बेच कर कमाई की  उनके दिलों में भी तुम रहे भी तो क्या रहे’ भारतीय विदेश मंत्री ने मध्यस्थता के जिस उपक्रम को महज़ ‘दलाली’ का नाम देकर उससे अपना पल्ला झाड़ लिया, पाकिस्तान जैसे मुल्क ने इस आपदा को मौके में तब्दील करने का बीड़ा उठाया है परंतु पाकिस्तान को यह भी समझना होगा कि अंतर्राष्ट्रीय रणनीति बुनने में इरादे जितने अहम होते हैं, उससे महत्वपूर्ण होती है धारणा। सो पाकिस्तान के लिए अपने मुस्लिम देशाें को यह समझाना इतना आसान कतई नहीं होगा कि उसके न्यूट्रल रुख के बावजूद उसमें से ‘अमेरिका परस्ती’ की…

‘जिन्होंने हमेशा अपना जमीर बेच कर कमाई की 
उनके दिलों में भी तुम रहे भी तो क्या रहे’
भारतीय विदेश मंत्री ने मध्यस्थता के जिस उपक्रम को महज़ ‘दलाली’ का नाम देकर उससे अपना पल्ला झाड़ लिया, पाकिस्तान जैसे मुल्क ने इस आपदा को मौके में तब्दील करने का बीड़ा उठाया है परंतु पाकिस्तान को यह भी समझना होगा कि अंतर्राष्ट्रीय रणनीति बुनने में इरादे जितने अहम होते हैं, उससे महत्वपूर्ण होती है धारणा। सो पाकिस्तान के लिए अपने मुस्लिम देशाें को यह समझाना इतना आसान कतई नहीं होगा कि उसके न्यूट्रल रुख के बावजूद उसमें से ‘अमेरिका परस्ती’ की बू क्यों आती है? हाल में ही यूएई ने पाकिस्तान को दे रखा अपना 3.5 अरब डालर का उधार अचानक से वापिस मांग लिया। यह रकम मामूली नहीं है, यह रकम पाकिस्तान के कुल विदेशी भंडार का लगभग 21 फीसदी बैठती है। विशेषज्ञ भी मानते हैं कि यूएई का यह फौरी कदम पाकिस्तान के न्यूट्रल रुख दिखाने के बाद ही उठाया गया है। ऐसे रिश्तों में केवल कूटनीतिक संतुलन को ही पर्याप्त नहीं मानते। पाकिस्तान की इस मध्यस्थता पहल को अंदरुनी तौर पर चीन का भी समर्थन हासिल बताया जाता है। अमेरिका की ओर से इस दो दिवसीय वार्ता में शिरकत करने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने डिप्टी जेडी वेंस, अपने विशेष दूत स्टीव विटकॉक और अपने दामाद जेराड कुशनर को इस्लामाबाद भेजा है, वहीं ईरान की ओर से इस वार्ता में शिरकत कर रहे हैं ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची और ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद वधेर घालीबफ। पाकिस्तान इस पूरी शांति वार्ता के उपक्रम को अपने लिए एक बड़े मौके की तरह देख रहा है। पाकिस्तान चाहता है कि अगर वह अमेरिका-ईरान युद्ध समाप्त करवाने में कामयाब रहता है तो वह अपने मुल्क की मध्यपूर्व एशिया में बतौर मुख्य खिलाड़ी एक नई ‘रिब्रांडिंग’ करें। शांति वार्ता को अंजाम तक पहुंचाने का क्रेडिट लेता हुआ वह अपनी कमजोर अर्थव्यवस्था को नई संजीवनी देने के लिए खाड़ी देशों के साथ नए रक्षा सौदे करें। अपने मुल्क में उन्हें ज्यादा से ज्यादा निवेश करने के लिए प्रोत्साहित करें। पाकिस्तान को यह भी उम्मीद है कि अमेरिका जैसे संपन्न मुल्क व खाड़ी के कुछ अमीर मुल्क उन्हें सैन्य विस्तार करने के लिए भी फंडिंग दे सकते हैं। वहीं खाड़ी के अमीर देश, तुर्की व अमेरिका ऊर्जा के क्षेत्र में भी उसके यहां निवेश कर सकते हैं, उन्हें आर्थिक सहायता का पैकेज दे सकते हैं। पर पाकिस्तान एक ओर जहां मुस्लिम देशों का महत्वपूर्ण हिस्सा बनना चाहता है, वहीं वह पश्चिमी देशों से भी बराबर का सहयोगी बना रहना चाहता है, यही कूटनीतिक संतुलन साधना उसके लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी। एक सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि पाकिस्तान की सीमा ईरान के साथ लगती है सो, मध्यस्थता में एक छोटी सी चूक उनके लिए बड़ी आफत बन सकती है, सो वह किसी भी हालत में न तो ईरान को नाराज़ करने का जोखिम उठा सकता है और न ही अमेरिका को, पाकिस्तान के लिए यह लगभग दो नावों पर सवारी जैसी स्थिति है, जरा भी फिसले तो डूबना निश्चित है।
कांग्रेस से आंखें फेरता अब्दुल्लाह परिवार : सियासत में यह रिवायत बेहद आम है कि ’मतलब निकल गया तो जानते नहीं’ इस दफे का जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव जीतने की होड़ में नेशनल कांफ्रेंस नेता उमर अब्दुल्लाह कभी राहुल गांधी की चिरौरी करते नज़र आते थे, आज अब्दुल्लाह परिवार पर्दे के पीछे से राग भगवा गाने में सिद्दहस्त हो गया है। उमर दिल्ली आकर सीधे गृह मंत्री से मिलते हैं और अपने निष्कंटक राज्य के लिए शुभेच्छाओं की पोटली भर कर श्रीनगर में लैंड करते हैं। कायदे से तो कांग्रेस को राज्य में पॉवर शेयरिंग का वास्तविक साझेदार होना चाहिए, पर अब्दुल्लाह पिता-पुत्र की जोड़ी यहां कांग्रेस की मामूली मांगों पर कान नहीं धरती है। राज्य में एनसी-कांग्रेस गठबंधन की इस सरकार के दो वर्ष पूर्ण होने जा रहे हैं, पर लगता नहीं कि पिता-पुत्र की यह जोड़ी महत्वपूर्ण शासकीय मुद्दों पर भी कांग्रेस से कोई परामर्श लेती है। राज्य के लेफ्टिनेंट गवर्नर मनोज सिन्हा और सीएम अमर अब्दुल्लाह के बीच सीधी रार छिड़ी है, इसी विवाद के कारण ही एडवोकेट जनरलों की नियुक्ति भी लंबे समय से लंबित पड़ी हुई है। अभी हाल में ही अतिरिक्त व डिप्टी एडवोकेट जनरलों समेत लॉ, ऑफिसर्स की टीम की नियुक्ति को हरी झंडी मिली है, पर हैरानी की बात है कि इन नियुक्तियों में भी कांग्रेस अपने लिए कोई एक स्लॉट भी हासिल नहीं कर पाई। राज्य के कांग्रेस प्रमुख तारिक हामिद कर्रा जिन्हें राहुल गांधी की निजी पसंद बताया जाता है, उन्होंने कुछ नामों की सिफारिश की थी, पर उनकी सिफारिशों को बड़ी बेरहमी से ठंडे बस्ते के हवाले कर दिया गया। यानी कांग्रेस यहां चाह कर भी अपना एक भी लॉ-ऑफिसर नियुक्त नहीं करवा पाई। वैसे भी कर्रा श्रीनगर के बजाए जम्मू में ही ज्यादा दिखते हैं, कांग्रेस के पास अभी भी जम्मू में कुछ प्रभाव वाले क्षेत्र जरूर बचे हैं, अगर कर्रा सिर्फ इन्हीं की रक्षा कर पाए तो यह एक बड़ी बात होगी।
क्या नई पार्टी बना सकते हैं राघव चड्ढा? : आप से बगावती तेवर अख्तियार करने के बाद पार्टी नेता राघव चड्ढा इन दिनों एक नए धुरंधर मुड में आ गए हैं, उनकी यह अदा नए जेनरेशन की युवा पीढ़ी को खूब भा रही है, बकौल चड्ढा ’वे घायल हैं, इसीलिए इतने घातक हैं।’ राघव से जुड़े विश्वस्त सूत्र खुलासा करते हैं कि जिस तरह से इन दिनों सोशल व डिजिटल मीडिया में उनकी लोकप्रियता में इज़ाफा हुआ है, इससे उनका दिल बल्लियों उछल रहा है। वे ‘जेन जी’ व युवा पीढ़ी को साधने के लिए अपनी एक नई राजनीतिक पार्टी का ऐलान कर सकते हैं, उनकी यह नई पार्टी आने वाले पंजाब चुनाव में अपने लिए कोई महती भूमिका तलाशना चाहेगी। वहीं राघव के सलाहकारों का एक वर्ग वह भी है जो यह सलाह दे रहा है कि उन्हें अपनी नई पार्टी बनाने के झंझटों में न फंस कर फिलहाल सीधे भाजपा में जाना चाहिए। जहां उनका भविष्य ज्यादा सुरक्षित है। वहीं आने वाले पंजाब विधानसभा चुनाव में वे भाजपा के लिए एक तुरूप का इक्का साबित हो सकते हैं और चुनाव से पहले आप में एक बड़ी टूट को अंजाम दे सकते हैं। आप नेताओं को भी राघव के इरादों की भनक है, चुनांचे सार्वजनिक मंचों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर उन्हें काउंटर करने की जिम्मेदारी पार्टी ने अपने दिग्गजों को सौंप रखी है। राघव को सोशल मीडिया के माध्यम से आप ​दिग्गजों ने अपनी तरह से समझा दिया है कि वह क्या कुछ करते रहे हैं। चड्ढा के बागी तेवरों पर आप के दिग्गजों की नजर है।
बड़े वोट प्रतिशत से फायदा किसका : 10 अप्रैल को संपन्न हुए असम, केरल व पुडुचेरी के मतदान प्रतिशत में एक अप्रत्याशित वृद्धि दर्ज हुई। चुनाव आयोग के एसआईआर यानी विशेष गहन पुनरीक्षण पूरा होने के बाद बिहार समेत केरल व असम और एक केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में चुनाव हुए हैं। सनद रहे कि बिहार में भी एसआईआर के बाद संपन्न हुए मतदान के बाद वोट प्रतिशत लगभग 10 फीसदी बढ़ गया था। जाहिर तौर पर इसका फायदा राज्य के सतारूढ़ गठबंधन यानी जदयू-भाजपा को मिला।
केरल में पिछली बार का 75 फीसदी मतदान प्रतिशत बढ़कर इस बार 78 फीसदी, असम में यह 82 से बढ़कर 85 फीसदी और पुडुचेरी में 85 से बढ़कर 90 फीसदी हो गया। पुडुचेरी में कांग्रेस, डीएमके और वीसीके अलायंस में साफ तनाव दिख रहा था। कांग्रेस ने खुद 16 सीटें ले लीं और वीसीके लिए 1 सीट छोड़ी जबकि पिछली बार कांग्रेस 14 सीटों पर लड़कर केवल 2 ही सीटें जीत पाई थी। केरल में वामपंथी मोर्चा लगातार 10 वर्षों से शासन में है। पिछली बार मुस्लिम समुदाय से एकजुट वोट वामपंथियोंं को मिले थे, इस बार राज्य के सीएम पेरियार विजयन ने जिस तरह हिंदू मतदाताओं को लुभाने के प्रयास किए हैं उससे लगता है कि मुस्लिम वोट एकजुट हो कांग्रेस के पाले में गए हों। असम में इस बार ऊपरी असम में कांग्रेस ने गौरव गोगोई की अगुवाई में पूरा दम लगाया है। कांग्रेस को भरोसा है कि वहां के 10 फीसदी शेयर वाले अहोम वोट उसकी झोली में गिरे हों, वहीं भाजपा रणनीतिकार इस बात को लेकर बम-बम हैं कि असम में पहले जहां 39 विधानसभा सीटें ऐसी थीं जहां मुस्लिम वोटर निर्णायक थे तो इस दफे एसआईआर के बाद मुस्लिम दबदबे वाली ऐसी सीटों की संख्या घटकर मात्र 22 रह गई है, वहीं बोडोलैंड की 12 सीटों पर जहां बीपीएफ यानी ‘बोडोलैंड पीपल्स फ्रंट’ और यूपीपीएल यानी ‘प्रमोद बोडो की युनाइटेड पीपल्स फ्रंट लिबरल’ के बीच सीधी टक्कर है। बीपीएफ का जहां भाजपा के साथ चुनावी तालमेल है, वहीं प्रमोद बोरो भी हिमंता बिस्वा सरमा के सीधे संपर्क में बताए जाते हैं। यानी यूपीपीएल भी चुनाव के बाद भाजपा को सपोर्ट कर सकती है, वहीं ऊपरी असम में भी अहोम वोटरों से कहीं ज्यादा चाय बागानों का वोट है। इन्हें एक तरह से भाजपा समर्थित वोट माना जाता है, वहीं पूरे असम में भाजपा का जितना चुनावी बजट है, कांग्रेस का चुनावी बजट उसका 5 फीसदी ही माना जा रहा है। एक तरह से कांग्रेस असम में कम संसाधनों में चुनाव लड़ रही थी। इस चुनाव में एक संकेत और मिला है कि महिला वोटरों के मतदान प्रतिशत में एक बड़ा उछाल आया है। इसी ट्रेंड को बंगाल में दीदी और तमिलनाडु में स्टालिन लपकना चाहते हैं। दीदी पहले से ही प्रदेश की महिलाओं को केंद्र में रखकर कई योजनाओं का सूत्रपात कर चुकी हैं। वहीं स्टालिन ने भी बिहार की तर्ज पर महिला वोटरों को लुभाने के लिए हर परिवार के मुखिया को 8 हजार रुपयों का फ्री-कूपन देने का काम किया है। यह कूपन एक तरह से कैश ही है जिससे परिवार फ्रिज, टीवी मिक्सी जैसी घर की जरूरी वस्तुएं खरीद सकता है। यानी हर पार्टी ने मान लिया है कि चुनाव में महिला वोटर्स सबसे निर्णायक साबित होते हैं।
बिस्वा पर विश्वास क्यों नहीं : भाजपा को अब भी पूरी उम्मीद है कि असम में एक बार फिर से भाजपा की वापसी होगी, भले ही भाजपा की अपनी सीटें थोड़ी कम हो सकती हैं, पर उसे अपने सहयोगी दलों के दम पर फिर से सरकार बनाने का पूरा भरोसा है लेकिन भाजपा से जुड़े विश्वस्त सूत्र दावा करते हैं कि ‘अगर इस दफे असम में फिर से भाजपा सरकार आई तो राज्य में नेतृत्व परिवर्तन हो सकता है।’ हिमंता बिस्वा सरमा की जगह कोई नया सीएम बनाया जा सकता है।’ हाल के दिनों में अपनी पत्नी और भाई को लेकर हिमंता विवादों में घिरे रहे, खुद पर लगे आरोपों का बचाव भी उन्होंने जिस उग्र अंदाज में किया यह भाजपा आला कमान को पसंद नहीं आया। सूत्र यह भी बताते हैं कि बड़े नेता उनसे एक दूरी बनाकर चल रहे हैं।
…और अंत में : एक भाजपा शासित राज्य के यह मुख्यमंत्री भले ही फिलवक्त अपनी गद्दी बचा पाने में कामयाब रहे हों, पर पार्टी में उनके विरोधियों ने भी अब तलक हथियार नहीं डाले हैं। सूत्रों की मानें तो इस दफे बस अपने आकाओं की वज़ह से इस भगवा सीएम को अभयदान मिल गया और उन्हें अपना कैबिनेट विस्तार करने की अनुमति भी मिल गई। अपने सनातन विरोधियों पर नकेल कसने के लिए माना जाता है कि मुख्यमंत्री पूजा-अनुष्ठान व तांत्रिक उपक्रमों का भी उतना ही सहारा लेते हैं। सूत्र बताते हैं कि हर दिन इनके लिए 50 से ज्यादा मंदिरों में पूजा-अर्चना व अनुष्ठान कराए जा रहे हैं, जिसका रोजाना खर्च ही लाखों में आता है।
(एनटीआई)

त्रिदीब रमण