कट्टरपंथी संगठनों व सेना के अघोषित आतंक के बावजूद देश पाकिस्तान में बरसों बाद इस बार लाहौर में ‘मेला चरागां’ की रौनक लौट आई। बेहद दिलचस्प है यह हकीकत कि सूफी संत माधोलाल हुसैन की पुण्य तिथि (उर्स) पर पिछले चार सौ वर्षों से प्रेम और प्रकाश (मुहब्बत और रोशनी) का यह अद्भुत मेला हर साल मार्च के अंतिम सप्ताह में लगाया जाता है।
16वीं सदी का यह किस्सा सम्राट अकबर के शासनकाल का है। आध्यात्मिक दोस्ती की इस विलक्षण दास्तान में सूफी-अध्यात्म दर्शन की अनूठी प्रस्तुति पिछले लगभग 400 वर्षों से देखने को मिलती रही है।
आपसी संबंधों में वर्तमान तल्खी से पहले इस ‘मेला चरागां’ के उर्स में भारतीय कव्वाल एक बड़ी संख्या में वहां जाते रहे थे। इस बार अधिकांश कव्वाल खाड़ी देशों से आए। उनके जोश पर ईरान-अमेरिका युद्ध की दहशत भी नहीं थी। दरअसल वे लोग तबाही के उस मंज़र को कुछ दिन तक भुलाए रखने और पूरे मध्य-एशिया में शांति बहाली के लिए दुआएं मांगने ही ‘माधोलाल हुसैन’ की दरगाह पर आए थे। लाहौर के ‘जश्ने-चरागां’ का मुख्य समारोह शहर के बाहरी क्षेत्र में बागबानपुरा नामक इलाके में उर्स के रूप में 16वीं सदी के सूफी फकीर शाह हुसैन की दरगाह पर मनाया जाता है।
वर्ष 1958 में एक हादसे के बाद तत्कालीन राष्ट्रपति ने इस पर पाबंदी लगा दी थी। सात साल बाद जब पाबंदी हटी तो लाहौर की सड़कों पर हज़ारों लोग शाह हुसैन और उनके हमसफर माधो लाल हुसैन के नाम पर आस्था और अकीदत के तराने गाते हुए उमड़ पड़े थे। ढोल व चिमटों की थापों पर वे गा रहे थे-
‘माधो लाल/ माधो लाल/
हो गए पूरे सत्त साल/
महंगी रोटी, महंगी दाल/
माधो लाल/माधो लाल/’
और तालियां बजाते, ढोल पीटते लोग शाह हुसैन की दरगाह की ओर चल पड़े थे। बागबानपुरा का नाम वहां अब भी कायम है। यह कस्बा लाहौर शहर से वैसे लगभग पांच किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इसे बसाने के लिए मियां महमूद यूसुफ नाम के एक शख्स ने शहंशाह शाहजहां से खास तौर पर ज़मीन मांगी थी। इसके एवज़ में उस शख्स ने लाहौर के पास अपने गांव इशाकपुर वाली ज़मीन शहंशाह को दे दी थी, जहां शाहजहां ने शालीमार बाग का निर्माण कराया था।
तीन दिवसीय मेला चरागां इस कस्बे में स्थित शाह हुसैन की दरगाह पर चलता है। मेला इस बार गत 25 मार्च को लगा। उस दिन वहां पूरी दरगाह लाल गुलाबों की पत्तियों से भर गई थी। कव्वालियां व नातें निरंतर जारी रहती हैं, एक अंतर्राष्ट्रीय मुशायरा भी हुआ जिसमें शुरूआत शाह हुसैन के कलाम से होती है। गत वर्ष ‘कहे शाह हुसैन’ के शीर्षक से एक नाटक का भी मंचन हुआ था।
इसी बहाने थोड़ा जि़क्र शाह हुसैन व माधो लाल के बारे में भी ज़रूरी है। 16वीं सदी के पंजाबी सूफी शायर शाह हुसैन को अब भी पूरी अकीकत (श्रद्धा) से याद किया जाता है। शालीमार बाग की बगल में शाह हुसैन की मज़ार है, जहां ‘मेला चरागां’ मनाया जाता है। यह एक दिलचस्प बात है कि शाह हुसैन के साथ उसके दोस्त माधो लाल को भी याद किया जाता है। माधोलाल हिन्दू ब्राह्मण था और शाह हुसैन हालांकि उम्र में बड़े थे, फिर भी उसे अपना ‘यार’ मानते थे। इसी रिश्ते के हवाले से कुछ लोग शाह हुसैन को माधो लाल हुसैन के नाम से भी पुकारते हैं। यह मेला हर वर्ष मार्च में आयोजित होता है। उस दिन ढोल बजते हैं और लोग ‘धमाल’ मचाते हैं। धमाल भी एक तरह का नृत्य है। इसमें गज़ब की मस्ती होती है। इस बार यह मेला तीन दिन तक चला। जि़या उल हक के शासन में भी एक बार इस मेले पर पाबंदी लगा दी गई थी। यह पाबंदी मज़ार पर ढोल बजाने और ‘धमाल’ मचाने पर लगी थी। लगभग सात साल लोग तरसते रहे। जब पाबंदी समाप्त हुई तो हज़ारों की संख्या में तरसे हुए लाहौरी पुरुष और औरतें मज़ार की ओर ढोल-धमाकों के साथ चल पड़े। ढोलों की थाप पर जवान लोग गाते, वही नगमा गाते-
माधो लाल ! माधो लाल !
महंगी रोटी महंगी दाल
मेला चरागां की खूबसूरती यह है कि इसमें औरतें भी खुलकर हिस्सा लेती हैं।
शाह हुसैन के बगल में ही माधो लाल की मज़ार भी है। अब यह बहस बेमानी है कि क्या माधो लाल को दफनाया गया था या पहले चिता जली थी। हकीकत यही है कि दोनों दोस्त जि़न्दगी भर भी साथ रहे और मरने के बाद भी साथ-साथ। मेला चरागां लाहौर के बचे खुचे सौहार्दपूर्ण चरित्र और फिरकापरस्ती की मुखालफत का एक जीता जागता सबूत है और लाहौर आवाम हर साल यहां आकर इस वैचारिकता पर पूरी अकीकत व जोश के साथ मुहर लगाते हैं। मेला चरागां के जश्नों में आगे-आगे रहने वाले पंजाबी विद्वान नज़म हुसैन सईद के घर पर हर सप्ताह ‘संगत’ के नाम से एक नशिस्त (गोष्ठी) होती थी जिसमें नज़्में पढ़ी जाती थी, गुरु ग्रंथ साहब के कुछ अंशों पर चर्चा होती है और ‘बानी’ में से ही कुछ ‘सबद’ गाए जाते हैं। चर्चा-परिचर्चा के मुख्य केंद्र साईं मियां मीर, शाह हुसैन और गुरु अर्जुन देव रहते थे। पंजाबियत लाहौरियों की रग-रग में है। सईदा दीप इस साल भी साल 23 मार्च को अपने दोस्तों के साथ कैंडल मार्च करती हुई शादमान चौक गई थी और वहां पर लाहौर की अनेक नाटक मंडलियां, शहीदों पर आधारित नुक्कड़ नाटकों का मंचन करती रहीं। उस दिन ‘इन्कलाब जि़न्दाबाद’, ‘शहीदे आज़म जि़न्दाबाद’ के नारे शादमान चौक में गूंजे थे। इन्हीं दिनों पतंगबाज़ी भी खूब चली। हालांकि अदालती तौर पर पतंगबाज़ी पर सख्त पाबंदी है मगर अपने घरों की छतों से कानून को ठेंगा दिखाते हुए यह मस्ती जारी रही। ये पाबंदी 2007 में पतंगबाज़ी के दौरान हुए एक हादसे के दिन लगाई गई थी। उस दिन 11 लोग पतंगबाजी के बाद हुई फायरिंग में मारे गए थे। उस फायरिंग का सबब भी पतंगबाज़ी ही थी। यानी पतंग कटी तो समझा जाता कि नाक कटी। पतंग, इज्ज्ज़त, आबरू का परचम मानी जाती थी। वैसे नवम्बर के महीने में लाहौर में हर वर्ष विश्वस्तरीय कला मेला (वर्ल्ड परफार्मिंग ऑर्ट्स एंड कल्चरल फेस्टिवल) लगता है। इसका आयोजन ‘अलहमरा कल्चरल काम्प्लैक्स’ में किया जाता है। इस परिसर में कई थियेटर हैं, जिनमें ओपन एयर थियेटर भी शामिल हैं। दस दिन तक चलने वाले इस मेले में संगीत, नाटक, नृत्य, लोकनृत्य, एकल नृत्य और कठपुतली नाच आदि आयोजित होते हैं। इस मेले की एक विशेषता यह है कि इसमें लगभग 80 प्रतिशत कार्यक्रम अन्तर्राष्ट्रीय कलाकारों द्वारा प्रस्तुत किए जाते हैं।
खूब रौनक रही ‘मेला चरागां’ पर लाहौर में
Summary :
कट्टरपंथी संगठनों व सेना के अघोषित आतंक के बावजूद देश पाकिस्तान में बरसों बाद इस बार लाहौर में ‘मेला चरागां’ की रौनक लौट आई। बेहद दिलचस्प है यह हकीकत कि सूफी संत माधोलाल हुसैन की पुण्य तिथि (उर्स) पर पिछले चार सौ वर्षों से प्रेम और प्रकाश (मुहब्बत और रोशनी) का यह अद्भुत मेला हर साल मार्च के अंतिम सप्ताह में लगाया जाता है। 16वीं सदी का यह किस्सा सम्राट अकबर के शासनकाल का है। आध्यात्मिक दोस्ती की इस विलक्षण दास्तान में सूफी-अध्यात्म दर्शन की अनूठी प्रस्तुति पिछले लगभग 400 वर्षों से देखने को मिलती रही है। आपसी संबंधों में…


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