एक दावत जिसने पाकिस्तान को हिला दिया

Summary :

एक समय था फारसी पढ़ने-लिखने वालों के लिए तेल बेचना, छोटे दर्जे का काम माना जाता था। तब अक्सर कहा जाता था, ‘पढ़ें फारसी बेचें तेल-यह देखो किस्मत का खेल’, मगर अब सिर्फ तेल के लिए तबाही की जंग चल रही है। ऐसे युद्ध में कभी भी तय नहीं हो पाता कि कितने लोग मरे, कितने घायल हुए। ईरान विश्व की सबसे पुरानी सभ्यताओं में से एक थी। अब अधिकतर खण्डहरों में बदल चुके इस देश में नगरीय सभ्यता का इतिहास भी 4000 वर्ष ईसा पूर्व पुराना है। सिकंदर से लेकर तैमूर और नादिर शाह तक इस देश में तबाही…

एक समय था फारसी पढ़ने-लिखने वालों के लिए तेल बेचना, छोटे दर्जे का काम माना जाता था। तब अक्सर कहा जाता था, ‘पढ़ें फारसी बेचें तेल-यह देखो किस्मत का खेल’, मगर अब सिर्फ तेल के लिए तबाही की जंग चल रही है। ऐसे युद्ध में कभी भी तय नहीं हो पाता कि कितने लोग मरे, कितने घायल हुए। ईरान विश्व की सबसे पुरानी सभ्यताओं में से एक थी। अब अधिकतर खण्डहरों में बदल चुके इस देश में नगरीय सभ्यता का इतिहास भी 4000 वर्ष ईसा पूर्व पुराना है। सिकंदर से लेकर तैमूर और नादिर शाह तक इस देश में तबाही मचाते रहे हैं।

साहित्य, सूफी-दर्शन, अध्यात्म के क्षेत्र में, फिरदौसी, उमर खय्याम, मौलाना रूमी, शम्स तबरीज़ी आदि ने इस देश को एक विशेष रुतबा प्रदान किया था। मगर अब वहां सिर्फ मौत का तांडव चल रहा है। इन दिनों ईरान विश्वभर में खूब चर्चा में है। शिखर नेतृत्व के सफाए के बावजूद अमेरिका व इस्राइल के लिए सरदर्द बना हुआ है मौलाना रूमी का यह देश। इस बार चर्चा एक-दूसरे संदर्भ में, पाकिस्तान में ईरान के पूर्व शासक शाह रजा पहलवी की एक दावत अब भी वहां के साहित्य के इतिहास में दर्ज है। कोई भी घटना अदब की दुनिया में कैसे बयान होती है, यह सत्य कथा बताती है।

शाह रज़ा पहलवी के सम्मान में आयोजित उस दावत ने एक पाकिस्तानी अभिनेत्री को आत्महत्या की कोशिश तक पहुंचा दिया था और इसी से प्रख्यात शायर हबीब जालिब की बग़ावती नज़्म पैदा हुई। नीलो (कहीं कहीं नीलोफर) 1960 के दशक में पाकिस्तान की एक बेहद लोकप्रिय फिल्म अभिनेत्री थीं। उसका जन्म एक कैथोलिक परिवार में सिन्थिया अलेक्ज़ेंडर फर्नान्डिस के नाम से हुआ था। वर्ष 1956 में उसने फिल्मी दुनिया में आते ही अपना फिल्मी नाम नीलो रख लिया और 1965 तक वे पाकिस्तान की सबसे महंगी अभिनेत्रियों में गिनी जाने लगीं।

11 फरवरी 1965 को उसे उस वक्त के पाकिस्तान के सिंध प्रांत के गवर्नर और राष्ट्रपति अयूब ख़ान के कऱीबी सहयोगी आमिर मोहम्मद ख़ान ने बुलावा भेजा। ईरान के शासक शाह रज़ा पहलवी के सम्मान में एक डिनर पार्टी रखी गई थी और नीलो से उसमें नृत्य करने को कहा गया। नीलो प्रगतिशील पीढ़ी से थी। उनका मानना था कि तानाशाहों और शासकों की निजी महफिलों में नाचना किसी भी समर्पित कलाकार की मर्यादाओं के खिलाफ है। इसलिए उसने उस दावत में प्रदर्शन करने से साफ इंकार कर दिया।

यह बात वहां के गवर्नर को बेहद नागवार गुजऱी। पुलिस भेजी गई और नीलो को ​गिरफ्तार कर लिया गया। उसे ज़बरदस्ती उस पार्टी में लाया गया ताकि वह नृत्य करें। इस अपमान और जि़ल्लत से टूटकर नीलो ने नींद की गोलियों की भारी मात्रा खा ली। पुलिस ने जैसे ही उसे नाचने पर मजबूर किया, वह बेहोश होकर फर्श पर गिर पड़ीं। अस्पताल ले जाई गई। जहां डॉक्टरों को उसे बचाने में कई दिन लग गए।
तानाशाहों के सामने उनके इस साहसिक विरोध के अलावा पाकिस्तान की फिल्म इंडस्ट्री की प्रतिक्रिया भी बेहद मज़बूत और एकजुट थी। फिल्मकारों ने नीलो के समर्थन में एक दिन की हड़ताल का ऐलान किया था।

तब के प्रगतिशील शायर हबीब जालिब, जो फिल्मों के लिए भी लिखते थे, उन्हें अस्पताल में देखने जा रहे थे। रास्ते में ही उन्होंने एक बेहद ताक़तवर और बग़ावती नज़्म लिखी- ‘नीलो’।
वह नज़्म कुछ यूं थी-
तू कि नावाकिफ-ए-आदाब-ए-शहंशाही थी
रक्स ज़ंजीर पहन कर भी किया जाता है
तुझ को इंकार की जुरअत जो हुई तो क्यूंकर
साया-ए-शाह में इस तरह जिया जाता है

(तुम शाही हुकूमत के तौर-तरीक़ों से नावाकिफ़़ थीं। भूल गई कि ज़ंजीरों में जकड़ कर भी नाचना पड़ता है। तुम्हें इंकार करने की जुरअत कैसे हुई

बादशाह की सल्तनत में ऐसे नहीं जिया जाता)
अहल-ए-सरवत की ये तजवीज़ है सरकश लड़की
तुझ को दरबार में कोड़ों से नचाया जाए
नाचते-नाचते हो जाए जो पायल ख़ामोश
फिर न ता-ज़ीस्त तुझे होश में लाया जाए
(ऐ बाग़ी लड़की, सत्ताधीशों का ये फैसला है
तुम्हें दरबार में कोड़ों की ताल पर नचाया जाए

और जब नाचते-नाचते तुम्हारी पायल ख़ामोश हो जाए तो फिर जि़ंदगीभर तुम्हें होश में न लाया जाए) लोग इस मंजर-ए-जांकाह को जब देखेंगे

और बढ़ जाएगा कुछ सतवत-ए-शाही का जलाल
तेरे अंजाम से हर शख्स को इबरत होगी
सर उठाने का रिआया को न आएगा खय़ाल
(जब लोग इस दिल दहला देने वाले मंजऱ को देखेंगे तो बादशाह की शान और बढ़ेगी
तुम्हारे अंजाम से हर शख्स सबक लेगा
और प्रजा सिर उठाने की हिम्मत नहीं करेगी)
तब-ए-शाहाना पे जो लोग गिरां होते हैं
हां उन्हें ज़हर भरा जाम दिया जाता है
तू कि नावाकिफ ए-आदाब-ए शहंशाही थी
रक्स ज़ंजीर पहन कर भी किया जाता है
(जो लोग शाही मिज़ाज को चुनौती देते हैं

उन्हें ज़हर से भरा जाम पिलाया जाता हैतुम शाही हुकूमत के तौर-तरीक़ों से नावाकिफ़़ थीं ! ज़ंजीरों में जकड़ कर भी नाचना पड़ता है)बाद में इसकी चर्चा एक फिल्म में भी हुई। वर्ष 1969 में फिल्म ‘जऱक़ा’ रिलीज़ हुई। इसकी फिल्म में नीलो ने खुद मुख्य भूमिका निभाई- एक फिलिस्तीनी लड़की के रूप में। नीलो की वास्तविक जि़ंदगी की इस लड़ाई को अमर बनाने के लिए रियाज़ शाहिद ने हबीब जालिब की इसी नज़्म को फिल्म में गीत के रूप में शामिल किया। गीत का चित्रण पूरी तरह असल घटना से प्रेरित था। फिल्म में नीलो एक फिलिस्तीनी लड़की के किरदार में होती हैं, जिसे ज़ंजीरों में जकड़कर नाचने के लिए मजबूर किया जाता है। हबीब जालिब की नज़्म में थोड़े बदलाव करके इसे गीत बनाया गया। इसे महान गायक मेहदी हसन ने गाया और संगीत रशीद अत्तरे ने दिया। सबसे बड़ा बदलाव गीत की शुरूआती पंक्तियों में था।

जहां मूल नज़्म में था-
तू कि नावाकिफ ए-आदाब-ए शहंशाही थी
रक्स ज़ंजीर पहन कर भी किया जाता है

यह फिल्म इस गीत के ज़रिए अपने ही समाज की हालत पर भी इशारा करती थी। यह पाकिस्तान के कलाकारों की तरफ से अपने तानाशाह शासकों को दिया गया एक सशक्त जवाब था कि कला झुकती नहीं। वहां की नई पीढ़ी के लिए एक दिलचस्प बात बात बन गई। नीलो, पाकिस्तानी फिल्म स्टार शान की मां भी थीं। वैसे यह भी एक हकीकत है कि हमारे इस पड़ौसी मुल्क में शास्त्रीय संगीत पर अब भी पाबंदी है।

Dr. Chander Trikha