पश्चिम बंगाल लगातार सुर्खियों में बना हुआ है। ऐसा प्रतीत होता है कि राज्य की समस्याएं समाप्त होने के बजाय हर पल बढ़ती ही जा रही हैं। इस राजनीतिक उथल-पुथल के केंद्र में अभिषेक बनर्जी हैं, जिन्हें मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का उत्तराधिकारी माना जाता है। फिलहाल सभी निशाने उन्हीं पर साधे जा रहे हैं, जबकि पार्टी संभावित विभाजन की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है। पूरे विवाद को एक वाक्य में समेटें तो प्रश्न यही है क्या अभिषेक बनर्जी, जिन्हें लोकप्रिय रूप से ‘भाइपो-भतीजा’ कहा जाता है, को हटाया जाए?
अभिषेक, ममता बनर्जी के भाई अमित बनर्जी के पुत्र हैं। वर्ष 2011 में उन्होंने अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण की। युवा वर्ग में लोकप्रिय छवि के कारण उन्हें तृणमूल युवा संगठन का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया। उन्होंने वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में पहली बार चुनावी मैदान में उतरकर उस समय लोकसभा के सबसे युवा सांसद बनने का गौरव प्राप्त किया। इसके बाद वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने अपनी पारंपरिक सीट डायमंड हार्बर से भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी को पराजित किया। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने लगातार तीसरी बार विजय प्राप्त की और अपने जीत के अंतर को लगभग दोगुना कर दिया। यहां उसी शैली में समाचार, पत्रीय हिंदी अनुवाद प्रस्तुत है।
लेकिन एक बार फिर ममता बनर्जी और राज्य सरकार में अभिषेक बनर्जी की भूमिका पर लौटते हैं। विपक्ष लंबे समय से राज्य सरकार को ‘पिशी-भाइपो सरकार’ अर्थात ‘बुआ-भतीजा सरकार’ कहकर संबोधित करता रहा है। न तो यह आरोप नया है और न ही यह शब्दावली। वर्ष 2021 के विधानसभा चुनावों में भी भारतीय जनता पार्टी ने ‘भाइपो’ शब्द का बार-बार प्रयोग कर ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी पर निशाना साधा था। पश्चिम मेदिनीपुर में एक जनसभा को संबोधित करते हुए तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था, आपको केवल अपने भतीजे की चिंता है। आपकी पूरी चिंता इस बात को लेकर है कि उसे मुख्यमंत्री कब बनाया जाए, जबकि राज्य की जनता लगातार कष्ट झेल रही है।
अमित शाह ने ममता बनर्जी पर वसूली और तुष्टीकरण की राजनीति चलाने का आरोप लगाया था। वहीं अभिषेक बनर्जी पर उन्होंने आम लोगों से धन उगाही करने वाले गिरोहों को संरक्षण देने का आरोप लगाया था। अभिषेक पर कटाक्ष करते हुए शाह ने उन्हें ‘तोलाबाज’ तक कहा था। प्रश्न यह है कि अभिषेक बनर्जी इतने अलोकप्रिय क्यों हैं? इसके पीछे अनेक कारण बताए जाते हैं। इनमें वंशवाद और पार्टी में उनका अत्यंत तेज़ी से उभरना प्रमुख है। किंतु इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि उनके उदय के साथ कई वरिष्ठ नेताओं की भूमिका सीमित होती चली गई। वर्षों तक पार्टी के लिए संघर्ष करने वाले इन नेताओं को यह महसूस हुआ कि उन्हें एक अपेक्षाकृत अनुभवहीन और नए नेता के अधीन कर दिया गया है। स्वाभाविक रूप से इससे असंतोष बढ़ा।
स्थिति तब और जटिल हो गई जब अभिषेक बनर्जी ने राजनीतिक परामर्शदाता संस्था ‘आई-पैक’ को सक्रिय भूमिका दी और पार्टी के भीतर एक समानांतर शक्ति-संरचना विकसित हुई। अनेक नेताओं का मानना है कि यही तृणमूल कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी साबित हुई। इसके साथ भ्रष्टाचार के आरोपों तथा केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो और प्रवर्तन निदेशालय की जांचों ने भी विवाद को और गहरा किया। हालांकि यह चर्चा केवल अभिषेक बनर्जी या उनके पारिवारिक संबंधों तक सीमित नहीं है। यह न तो केवल उनके उत्थान की कहानी है और न ही वर्तमान में तृणमूल कांग्रेस के सामने खड़े संकट की। यह केवल इस प्रश्न तक भी सीमित नहीं है कि पार्टी विभाजन की ओर बढ़ रही है या नहीं।
दरअसल, यह व्यापक परिदृश्य और राजनीतिक संस्कृति में गहराई तक पैठी उस प्रवृत्ति की चर्चा है, जिसमें पारिवारिक निकटता, निजी निष्ठाएं और अवसरवाद अक्सर सिद्धांतों पर भारी पड़ जाते हैं। यह उगते सूरज को प्रणाम करने और उसके अस्त होते ही उससे मुंह मोड़ लेने की मानसिकता की कहानी भी है। यह केवल हार के समय साथ छोड़ देने की बात नहीं है, बल्कि उन समर्थकों की भी कहानी है जो अवसर आने पर विरोधी बन जाते हैं। यह प्रश्न भी उठता है कि क्या निष्ठा वास्तव में शक्ति और सत्ता की ही पर्याय है। इस क्रम की शुरुआत काकोली दस्तीदार से हुई, जिन्होंने खुलकर पार्टी नेतृत्व का विरोध किया और तृणमूल कांग्रेस में अपने सभी संगठनात्मक पदों से इस्तीफा दे दिया। लोकसभा सांसद काकोली दस्तीदार ने तृणमूल कांग्रेस के महिला प्रकोष्ठ की अध्यक्ष पद से इस्तीफा देकर विद्रोह का बिगुल फूंकने वालों में अग्रणी भूमिका निभाई।
पूर्व सांसद और वर्तमान में पश्चिम बंगाल विधानसभा के सदस्य रितब्रत बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस के विधायी दल पर अपना दावा प्रस्तुत करते हुए कहा कि उन्हें पार्टी के 80 में से 58 विधायकों का समर्थन प्राप्त है। 4 जून को विधानसभा अध्यक्ष रथीन्द्र बोस ने रितब्रत बनर्जी को तृणमूल कांग्रेस से संबद्ध विपक्ष का नेता घोषित किया। एक स्तर पर ममता बनर्जी की इस बात के लिए सराहना की जा सकती है कि उन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी अभिषेक का साथ नहीं छोड़ा। किंतु दूसरी ओर उन्हें आत्ममंथन भी करना होगा। उन्हें स्वयं से यह प्रश्न पूछना होगा कि क्या उन्होंने स्वयं को पार्टी के दैनिक संचालन से अलग कर अधिकांश जिम्मेदारियां अपने भतीजे के हाथों में सौंप दीं। क्या उन्होंने पार्टी को एक परिवार विशेष के प्रभाव के अधीन होने दिया?
क्या तथाकथित ‘भतीजा प्रवृत्ति’ ने न केवल उन्हें राजनीतिक रूप से नुकसान पहुंचाया, बल्कि पार्टी की संगठनात्मक शक्ति और उसके भविष्य को भी प्रभावित किया? इन प्रश्नों के उत्तर किसी से छिपे नहीं हैं। किंतु इस पूरे घटनाक्रम से एक महत्वपूर्ण सीख अवश्य मिलती है, अपने परिजनों के उत्थान में सहयोग करना स्वाभाविक है, परंतु भावनाओं को इस हद तक हावी नहीं होने देना चाहिए कि वे राजनीतिक विवेक को धूमिल कर दें, राजनीतिक भविष्य को संकट में डाल दें और किसी दल की बुनियाद को कमजोर कर दें।
कहानी बुआ-भतीजे की
Summary :
पश्चिम बंगाल लगातार सुर्खियों में बना हुआ है। ऐसा प्रतीत होता है कि राज्य की समस्याएं समाप्त होने के बजाय हर पल बढ़ती ही जा रही हैं। इस राजनीतिक उथल-पुथल के केंद्र में अभिषेक बनर्जी हैं, जिन्हें मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का उत्तराधिकारी माना जाता है। फिलहाल सभी निशाने उन्हीं पर साधे जा रहे हैं, जबकि पार्टी संभावित विभाजन की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है। पूरे विवाद को एक वाक्य में समेटें तो प्रश्न यही है क्या अभिषेक बनर्जी, जिन्हें लोकप्रिय रूप से ‘भाइपो-भतीजा’ कहा जाता है, को हटाया जाए? अभिषेक, ममता बनर्जी के भाई अमित बनर्जी के पुत्र हैं।…


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