नकली दवाओं से खतरे में जान

Summary :

आप जो दवाई खा रहे हैं, कभी सोचा है कि उसकी गुणवत्ता कितनी सही है। अक्‍सर हम दवाई खाते वक्‍त यह मानकर चलते हैं कि यह सभी सरकारी मानकों को पूरा करती ही होगी लेकिन यह 100 प्रतिशत सही नहीं है। केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन की जांच में चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। पाया गया कि जिस दवाई को हम खा रहे हैं उनमें से कई दवाएं खुद बीमार हैं ! देशभर से लिए गए दवा सैंपल्स में से कुल 196 सैंपल नॉट ऑफ स्टैंडर्ड क्वालिटी यानी तय मानकों पर खरे नहीं उतरे। केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन यानी…

आप जो दवाई खा रहे हैं, कभी सोचा है कि उसकी गुणवत्ता कितनी सही है। अक्‍सर हम दवाई खाते वक्‍त यह मानकर चलते हैं कि यह सभी सरकारी मानकों को पूरा करती ही होगी लेकिन यह 100 प्रतिशत सही नहीं है। केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन की जांच में चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। पाया गया कि जिस दवाई को हम खा रहे हैं उनमें से कई दवाएं खुद बीमार हैं ! देशभर से लिए गए दवा सैंपल्स में से कुल 196 सैंपल नॉट ऑफ स्टैंडर्ड क्वालिटी यानी तय मानकों पर खरे नहीं उतरे। केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन यानी सीडीएससीओ की ओर से मार्च माह के लिए जारी ड्रग अलर्ट में देश में बनी कई दवाइयों की क्वालिटी को लेकर सवाल उठे हैं। रिपोर्ट डराती है कि कुल 141 दवाओं के नमूने मानकों पर खरे नहीं उतरे हैं। इनमें शुगर, हार्ट, उच्च रक्तचाप, मिर्गी जैसे गंभीर रोगों का उपचार करने वाली दवाइयां भी शामिल हैं। इनमें इंजेक्शन व कफ सिरप भी शामिल हैं। कमोबेश यही स्थिति विटामिन व आयरन की गोलियों की भी रही। जिन राज्यों में उत्पादित घटिया दवाओं का खुलासा हुआ, उनमें हिमाचल प्रदेश पहले पायदान पर रहा, फिर उत्तराखंड, गुजरात, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, केरल, पुडुचेरी, तेलंगाना, सिक्किम, झारखंड, दिल्ली, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, ओडिशा आदि राज्य शामिल हैं। यानी एक-दो राज्य नहीं, तमाम राज्यों के दवा उत्पादक इस अपवित्र कर्म में शामिल हैं। यूं कहें कि दाल में काला नहीं है बल्कि पूरी दाल ही काली है। विडंबना देखिए कि कफ सिरप के 17 नमूने फेल हुए हैं।
अब यह साफ हो गया कि अफ्रीका व सेंट्रल एशिया के कुछ देशों तथा भारत के कुछ राज्यों में कफ सिरप पीने से बच्चों की मौत के जो आरोप भारतीय दवा कंपनियों पर लगे थे, वे गलत नहीं थे जिससे पूरी दुनिया में भारतीय दवा उद्योग की छवि खराब हुई। इतना ही नहीं, टूथपेस्ट, मेहंदी व साबुन के नमूने तक फेल हुए हैं। राजस्थान के कोटा स्थित न्यू मेडिकल अस्पताल में सीजेरियन डिलीवरी के बाद पांच प्रसूताओं की मौत के मामले में जांच रिपोर्ट ने चौंकाने वाला खुलासा किया है। रिपोर्ट के अनुसार महिलाओं को लगाया गया ऑक्सीटॉसिन इंजेक्शन नकली था। जांच में पाया गया कि इंजेक्शन में दवा की जगह पानी भरा हुआ था, जिसके कारण प्रसव के बाद होने वाला रक्तस्राव नियंत्रित नहीं हो सका और महिलाओं की हालत लगातार बिगड़ती चली गई, अंततः पांच प्रसूताओं की मौत हो गई ।
मध्य प्रदेश में अमानक दवाइयों की सप्लाई करने के कारण तीन वर्षों के लिए ब्लैकलिस्ट की गई दवा निर्माता कंपनी यूनिकेयर इंडिया लिमिटेड से छत्तीसगढ़ में हर महीने लगभग छह करोड़ रुपये की दवाइयों की भारी-भरकम खरीदी जारी रहने का एक बड़ा मामला प्रकाश में आया है। मध्य प्रदेश पब्लिक हेल्थ सर्विसेस कार्पोरेशन लिमिटेड ने गुणवत्ता परीक्षण में लगातार तीन बैच फेल पाए जाने के बाद इस कंपनी को प्रतिबंधित करने का कड़ा आदेश आठ मई 2026 को जारी किया था। कंपनी पर आरोप है कि उसने अस्पतालों में सप्लाई की जाने वाली लैक्टुलोज दवा के अमानक बैच उपलब्ध कराए थे। कह सकते हैं कि दवा के नाम पर दर्द देने का कारोबार देश के विभिन्न भागों में खूब फल-फूल रहा है जो नियामक एजेंसियों की कारगुजारियों पर सवाल उठाता है। कह सकते हैं कि यह अब सिर्फ स्वास्थ्य का ही मुद्दा नहीं रहा, यह जिंदगियों से खिलवाड़ के साथ देश की अर्थव्यवस्था को भी चोट पहुंचाता है। निस्संदेह, घटिया दवाओं से किसी का बीमार होना एक व्यक्ति या परिवार की ही त्रासदी नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है। चूंकि भारत एक बड़ा दवा निर्यातक देश है और उसे विश्व का औषधि कारखाना कहा जाता है, दुनियाभर में भारत की दवाओं का निर्यात होता है, ऐसे समय में बार-बार नकली दवाओं का भंडाफोड़ होना या कैंसर जैसी असाध्य बीमारी की नकली दवाओं का व्यापार करने वालों का पर्दापाश होना, न केवल चिन्ता का विषय है, बल्कि एक जघन्य अपराध है। यह भारत की साख को भी आहत करता है।
पिछले दिनों वजन घटाने वाले नकली इंजेक्शनों की बड़ी खेप की बरामदगी हुई। देश में घातक दवाओं को बेचने वाला एक तंत्र सुनियोजित तरीके से काम कर रहा है। कोई मरे या जीए, उनकी बला से। उन्हें तो अपने मुनाफे से मतलब है। दरअसल, यह संकट एक राज्य का नहीं, पूरे देश के सामने मौजूद है। नियामक एजेंसियों की लापरवाही, कड़े कानूनों का अभाव व दोषियों को समय पर कड़ी सजा न मिलना इस अमानवीय धंधे के फलने-फूलने की वजह बन रहा है। निस्संदेह मानवता के खिलाफ होने वाले इस आपराधिक कृत्य में चिकित्सा तंत्र से जुड़े लोगों की भूमिका भी होगी। घटिया दवाओं का मिलना इस बात की ओर संकेत करता है कि व्यवस्था में शामिल काली भेड़ें इस अपवित्र कारोबार को प्रश्रय दे रही हैं।
इंसानी जीवन मूल्यों में किस हद तक गिरावट आई है कि कुछ लालची लोग मुनाफे के लिये दूसरे लोगों के जीवन से खिलवाड़ करने से भी गुरेज नहीं करते हैं। नकली दवाओं का अवैध कारोबार एक गंभीर जन-स्वास्थ्य खतरा बनता जा रहा है जिससे निपटने के लिए सरकार को ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपनानी चाहिए। नकली दवाओं के निर्माण और बिक्री में लिप्त अपराधियों को सख्त सजा जैसे आजीवन कारावास या मृत्युदंड देने का प्रावधान किया जाना चाहिए। नकली दवाओं के मामलों के त्वरित निपटारे के लिए विशेष अदालतों का गठन हो ताकि मुकदमों में सालों का समय न लगे और दोषियों को जल्द से जल्द सजा मिले। सभी प्रमुख और आवश्यक दवाओं की पैकेजिंग पर ‘यूनिक बारकोड’ या ‘क्यूआर कोड’ लागू किया जाना चाहिए। इससे मरीज और अधिकारी दवा की सत्यता की जांच आसानी से कर सकेंगे। इसके अलावा राज्य और केंद्रीय स्तर पर ‘फ्लाइंग स्क्वॉड’ का गठन किया जाए, जो बिना किसी पूर्व सूचना के मेडिकल स्टोर्स और दवा निर्माण इकाइयों का औचक निरीक्षण कर सके।

Aakash Chopra