जून 2026 में, भारत अपने शीर्ष 120 डीप-टेक वेंचर्स को शिक्षा मंत्रालय की पहल ‘भारत इनोवेट्स 2026’ के तहत फ्रांस के नीस शहर ले जाएगा। फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों की मौजूदगी में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की घोषित यह पहल महज एक शो नहीं, बल्कि एक घोषणा है। भारत अब सिर्फ़ टेक्नोलॉजी का बाज़ार नहीं रहा, बल्कि टेक्नोलॉजी बनाने वाला देश बन गया है। भारत से नीस ले जाए जा रहे 13 अहम विषयों में से एक विषय ब्लू इकोनॉमी (समुद्री अर्थव्यवस्था) अपने बड़े मौकों के कारण खास है। आईआईटी मद्रास को इस विषय के लिए नोडल संस्थान होने पर गर्व है।
भारत की तटरेखा 11,099 किलोमीटर लंबी है, यहां 1298 द्वीप हैं और 23 लाख वर्ग किलोमीटर का विशेष आर्थिक क्षेत्र (ईईजेड- एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक ज़ोन) है। देश के कुल व्यापार का लगभग 95 प्रतिशत हिस्सा समुद्र के रास्ते होता है। तटीय इलाकों में रहने वाले लाखों परिवार अपनी आजीविका के लिए समुद्र पर निर्भर हैं। भारत की समुद्री अर्थव्यवस्था में अपार संभावनाएं हैं। भारत सरकार ने इसे स्पष्ट रूप से समझा है और अब इस समझ को साहसी और समन्वित नीतियों में बदल रही है।
सागरमाला कार्यक्रम के तहत 13 बड़े और 200 से ज़्यादा छोटे बंदरगाहों का आधुनिकीकरण किया जा रहा है। इसमें लगभग 5.8 लाख करोड़ रुपये की लागत वाली 839 परियोजनाएं शामिल हैं, जो बंदरगाहों को भीतरी इलाकों से जोड़ते हैं और बंदरगाह-आधारित औद्योगीकरण को बढ़ावा देते हैं। ‘डीप ओशन मिशन’ के तहत वैज्ञानिकों को स्वदेशी ‘मत्स्य’ सबमर्सिबल का इस्तेमाल करके गहरे समुद्र की खोज करने के लिए फंड दिया जा रहा है, जिससे रणनीतिक संसाधन और अत्याधुनिक समुद्री विज्ञान की संभावनाएं खुल रही हैं। ‘प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना’ के तहत 20,050 करोड़ रुपये से ज़्यादा की परियोजनाओं को मंज़ूरी दी गई है, जो मछली पालन और तटीय आजीविका में बदलाव ला रहे हैं। ‘पीएम गति शक्ति’ फ्रेमवर्क बंदरगाहों, रेलवे, सड़कों और लॉजिस्टिक्स को एक ही डिजिटल मैप से जोड़ता है और हरित सागर दिशा-निर्देश देश के बंदरगाहों को निरंतरता (सस्टेनेबिलिटी) की ओर ले जा रही हैं। केंद्रीय बजट 2026-27 में मछली पालन क्षेत्र के लिए अब तक की सबसे ज़्यादा 2,761.80 करोड़ रुपये की सालाना बजटीय सहायता का प्रस्ताव रखा गया है। गुजरात और तमिलनाडु के तटों पर 2030 तक 30 गीगावाट की ऑफशोर विंड (समुद्र में हवा से बिजली बनाने) क्षमता हासिल करने का लक्ष्य रखा गया है। भारत अब खुलकर 100 अरब डॉलर की ‘ब्लू इकोनॉमी’ (समुद्री अर्थव्यवस्था) की बात कर रहा है।
आईआईटी मद्रास : शोध में सबसे आगे
आईआईटी मद्रास पिछले लगभग पांच दशकों से इस मुकाम तक पहुंचने की तैयारी कर रहा है। इस साल अपनी गोल्डन जुबली मना रहा हमारा ‘ओशन इंजीनियरिंग विभाग’ एशिया की सबसे बड़ी ‘शैलो वेव बेसिन रिसर्च फैसिलिटी’ और एक ही जगह सात ‘हाइड्रोडायनामिक टेस्ट फैसिलिटी’ का केंद्र है। यहां के शोधकर्ता शिप हाइड्रोडायनामिक्स, ऑफशोर स्ट्रक्चर, समुद्री रिन्यूएबल एनर्जी, कोस्टल इंजीनियरिंग, अंडरवाटर एकोस्टिक्स, ऑटोनॉमस मरीन व्हीकल और अन्य क्षेत्रों में काम करते हैं। ग्लोबल ओशन इकोनॉमी में मुकाबला करने के लिए भारत को इसी तरह के इंफ्रास्ट्रक्चर की ज़रूरत है। आईआईटी मद्रास में स्थित और पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय से वित्तपोषित ‘नेशनल टेक्नोलॉजी सेंटर फॉर पोर्ट्स, वॉटरवेज़ एंड कोस्ट्स’ (एनटीसीपी डब्ल्यूसी) ऐसी रिसर्च का बेहतरीन उदाहरण है जिसका सीधा राष्ट्रीय असर होता है। सरकार की ‘इंस्टीट्यूट ऑफ एमिनेंस’ पहल के तहत वित्तपोषित हमारा ‘एमई2एमई सेंटर ऑफ एक्सीलेंस’ समुद्री ऑटोनॉमस व्हीकल बना रहा है, तमिलनाडु तट पर वेव एनर्जी डिवाइस की टेस्टिंग कर रहा है, और बंदरगाह परिचालन व समुद्र की निगरानी के लिए एआई-आधारित उपकरण विकसित कर रहा है।
आईआईटी मद्रास के पूर्व छात्रों और फैकल्टी की 2015 में शुरू की गई ‘प्लानिस टेक्नोलॉजीज’ रिमोट से चलने वाले व्हीकल और ऑटोनॉमस अंडरवाटर सिस्टम बनाती है। ये सिस्टम एआई डायग्नोस्टिक्स का इस्तेमाल करके पुल, बांध, पोर्ट और ऑफशोर रिग्स जैसे पानी के नीचे मौजूद इंफ्रास्ट्रक्चर की जांच करते हैं। इसके पास 21 पेटेंट हैं, इसने 10 से ज़्यादा देशों में 500 जगहों पर 25,000 घंटे से ज़्यादा समय तक काम किया है और 100 करोड़ रुपये से ज़्यादा की फंडिंग जुटाई है। यह अंडरवाटर आरओवी बनाने वाली भारत की पहली कंपनी है और इसकी शुरुआत आईआईटी मद्रास की एक प्रयोगशाला में हुई थी।
केंद्र सरकार के शिक्षा मंत्रालय के ‘भारत इनोवेट्स 2026’ में हिस्सा लेने वाले स्टार्टअप्स के अलावा, आईआईटी मद्रास ‘ब्लू-इकोनॉमी’ (समुद्री अर्थव्यवस्था) से जुड़े एंटरप्रेन्योरशिप के बड़े इकोसिस्टम को भी मज़बूत कर रहा है। विशाखापत्तनम की स्टार्टअप वीर्य पारमिता एनर्जी (वीपीई) ने आईआईटी मद्रास के शोधकर्ताओं के साथ मिलकर एक औपचारिक जॉइंट डेवलपमेंट प्रोजेक्ट के तहत ‘सिंधुजा-I’ ओशन वेव एनर्जी कन्वर्टर को विकसित किया है।
ब्लू इकोनॉमी के क्षेत्र में फ्रांस भारत का एक स्वाभाविक साझेदार है। फ्रांस के पास दुनिया के सबसे बड़े एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक ज़ोन (ईईजेड) में से एक है, ऑफशोर एनर्जी और ओशन साइंस में गहरी विशेषज्ञता है, और आईएफआरई एमईआर से लेकर आईएनआरआईए तक ऐसे संस्थान हैं जो भारत की खूबियों को और बेहतर बनाते हैं। ‘इंडिया-फ्रांस ईयर ऑफ़ इनोवेशन’ आपसी सद्भावना से आगे बढ़कर सहयोग की ओर बढ़ने का सही मौका है। समुद्री रिन्यूएबल एनर्जी, ऑफ़शोर टेक्नोलॉजी और तटीय इलाकों को मज़बूत बनाने के क्षेत्रों में मिलकर शोध करना एक स्वाभाविक शुरुआत है। डीप-सी प्रौद्योगिकी का मिलकर विकास करना भी एक और अहम क्षेत्र है, जिसमें दोनों देशों की महत्वाकांक्षाएं तो हैं, लेकिन चुनौतियां भी साझा हैं। भारत के जो स्टार्टअप हम नीस ले जा रहे हैं, उनके लिए फ्रांस यूरोप के इनोवेशन मार्केट, फंडिंग नेटवर्क और इंडस्ट्रियल पार्टनर तक पहुंच उपलब्ध कराता है। हम फ्रांस और दुनिया के साथ मिलकर एक ऐसी ‘ब्लू इकॉनमी’ बनाने के लिए उत्सुक हैं जो हमारे देश की महत्वाकांक्षाओं के अनुरूप हो।
-प्रो. वी. कामाकोटी
डायरेक्टर, आईआईटी मद्रास


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