वोट डलवाने वालों के वोट नहीं

पश्चिम बंगाल के प्रथम चरण के चुनाव में लगभग 92 प्रतिशत रिकॉर्ड मतदान के बाद चुनाव आयोग अपनी पीठ थपथपा रहा है। चारों तरफ इस बात पर चर्चाएं हो रही हैं और आंकलन लगाए जा रहे हैं कि इतना ज्यादा मतदान तृणमूल कांग्रेस के पक्ष में जाएगा या वहां पहली बार भाजपा सरकार बना लेगी। इस बात का श्रेय चुनाव आयोग को दिया जा सकता है कि इस बार चुनावों में कोई हिंसा नहीं हुई और किसी भी मतदान केंद्र पर दोबारा मतदान कराने की नौबत नहीं आई। चुनाव आयोग ने मतदान के पहले दौर के लिए सुरक्षाबलों की 2500 कम्पनियां तैनात की थीं। अब सबकी नजरें 29 अप्रैल को होने वाले दूसरे दौर के मतदान पर लगी हुई हैं। भारत के मुख्य न्यायाधीश माननीय सूर्यकांत ने भी बंपर वोटिंग को लेकर खुशी जताई। इसके बावजूद पश्चिम बंगाल में एसआईआर को लेकर खड़े किए गए सवाल अब भी बने हुए हैं।
हैरानी की बात तो यह है कि पश्चिम बंगाल में चुनाव की ड्यूटी करने वाले 65 अ​िधकारियों के नाम अचानक मतदाता सूची से हटा दिए गए। इसके बाद इन अधिकारियों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। एसआईआर में करीब 91 लाख नाम हटाए गए। इन हटाए गए नामों में इन 65 अधिकारियों का नाम भी शामिल है जो सभी सरकारी कर्मचारी हैं। लगभग 27 लाख दूसरे लोग जिनके नाम अभी विचारार्थ रखे गए हैं वे भी वोट नहीं डाल पाएंगे। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने इन अधिकारियों को अपना मामला अपीलीय ट्रिब्यूनल में ले जाने को कहा है। इन मतदान अधिकारियों के मतदाता फोटो पहचान पत्र अमान्य हो गए हैं। इस पूरे मामले ने एक नई बहस छेड़ दी है। यह कितना शर्मनाक है कि दूसरे के वोट डलवाने के मामले में इन अधिकारियों पर भरोसा किया जा सकता है लेकिन अपने वोट देने के मामले पर उन पर भरोसा नहीं किया जा सकता। कुछ लोगों का आरोप है कि चुनाव आयोग उन समूहों के लिए वो​टिंग मुश्किल कर रहे हैं जो शायद भाजपा का समर्थन नहीं करते। यह विवाद इस बात पर सवाल खड़े कर रहा है कि मतदाता सूची की सफाई कितने निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से की गई है। भारतीय नागरिकों के लिए मतदाता पहचान पत्र एक महत्वपूर्ण पहचान दस्तावेज है जो उन्हें चुनाव में मतदान करने का अधिकार देता है। हो सकता है कि मतदान अधिकारियों ने खुद व्यस्त रहते हुए अपने वोट चैक करने में लापरवाही बरती हो। इसका फैसला तो बाद में होगा लेकिन इन सबके नाम बिना कारण बताए हटाना प्रथम दृ​ष्टया मनमाना है। इस मामले पर सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इन सभी को न्यायाधिकरण के समक्ष जाकर उपायों का पालन करने को कहा है लेकिन जस्टिस बागची की टिप्पणी काफी अहम है कि चुनाव महत्वपूर्ण है लेकिन मतदाता सूची में बने रहने का अधिकार अधिक मूल्यवान है और इस पर विचार किया जाएगा। पहले दौर का मतदान सम्पन्न होने तक अपीलीय ट्रिब्यूनलों के पास 34 लाख अपीलें लंबित हैं। जिनमें से पहले चरण में 138 मामलों का निपटारा करते हुए 136 मतदाताओं के नाम पुनः शामिल किए गए थे। मतदाता सूचियों के एसआईआर को लेकर मुख्य चुनाव आयोग ज्ञानेश कुमार की आलोचना के कई कारण हैं। भारत में पूर्व में जनगणना का नेतृत्व करने वाले कई अधिकारियों का कहना है कि एसआईआर का संचालन जल्दबाजी और अव्यावहारिक ढंग से किया गया जिससे चुनाव अधिकारियों का तनाव बढ़ा और कुछ ने तो आत्महत्या कर ली।
चुनाव से पहले निर्वाचन आयोग ने विशेष रूप से गैर भाजपा शासित पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में बड़े पैमाने पर सरकारी अधिकारियों के तबादले किए जिनकी चुनाव संचालन में कोई भूमिका नहीं होती जिससे यह तबादले समझ से परे और पक्षपातपूर्ण लगते हैं। चुनाव आयोग ने केरल में मामूली फेरबदल किए और असम को मामूली निर्देश मिले। पश्चिम बंगाल में तो मोटरसाइकिलों पर दोहरी सवारी पर पाबंदी, पर्यटकों पर पाबंदियां और अपार्टमेंट परिसरों में गैर प्रवासियों के प्रवेश पर रोक तक लगाई गई। पश्चिम बंगाल ही नहीं अन्य राज्यों में भी एसआईआर प्रतिक्रिया पर सवाल उठाए गए। पश्चिम बंगाल में जिन 34 लाख लोगों के नाम अभी लंबित रखे गए हैं, वह सभी लोग ​जीवित हैं और बंगाल में रहते हैं। अब यह लोग मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज कराना चाहते हैं। इन चुनावों में उनके वोट डालने का अर्थ यही है कि चुनाव आयोग ने जीते जी मतदाताओं से वोट देने का अधिकार छीन कर मतदाता की हत्या की है। लाखों लोगों को मताधिकार से वंचित करना लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है। देखना होगा कि बनाए गए ट्रिब्यूनल कितने लोगों को दोबारा से मतदाता बनाते हैं। चुनाव सुधारों के लिए आज भी लोग मुख्य चुनाव आयुक्त रहे टीएन शेषण, टीएस कृष्णमूर्ति और जेएन लिंगदोह को याद करते हैं। लोकतंत्र में चुनाव आयोग की विश्वसनीयता कायम रहनी चाहिए। अगर चुनाव आयोग की साख ही नहीं बची तो लोकतंत्र को गंभीर खतरा पैदा हो जाएगा। चुनाव आयोग को निष्पक्ष, स्वतंत्र और पारदर्शी ढंग से चुनाव कराने चाहिए। बड़ी विसंगतियों से लोगों का भरोसा ही उठ जाएगा।

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