कैसे मनाएंगे विभाजन की शताब्दी?

Summary :

यद्यपि यह 20 वर्ष बाद का विषय है मगर इस बारे में दिमागी मगजपच्ची का सिलसिला जारी हो चुका है। प्रश्न यह है कि वर्ष 2047 अर्थात भारत-विभाजन की शताबदी के अवसर पर भारत, पाकिस्तान व बंगला देश में आम आदमी की प्रतिक्रिया क्या होगी? यही संभावना है कि तब तक मेरे जैसे ऐसे लोग शेष नहीं बचे होंगे जो विभाजन की त्रास्दी के प्रत्यक्षदर्शी हों। जो इक्का-दुक्का बचे भी होंगे, शायद वे भी कुछ सटीक बता पाने की स्थिति में नहीं होंगे। मगर विभाजन की विभीषिका के त्रास्दी-पूर्ण इतिहास का दस्तावेजीकरण हो चुका होगा। अब भी ललक बनी हुई…

यद्यपि यह 20 वर्ष बाद का विषय है मगर इस बारे में दिमागी मगजपच्ची का सिलसिला जारी हो चुका है। प्रश्न यह है कि वर्ष 2047 अर्थात भारत-विभाजन की शताबदी के अवसर पर भारत, पाकिस्तान व बंगला देश में आम आदमी की प्रतिक्रिया क्या होगी?
यही संभावना है कि तब तक मेरे जैसे ऐसे लोग शेष नहीं बचे होंगे जो विभाजन की त्रास्दी के प्रत्यक्षदर्शी हों। जो इक्का-दुक्का बचे भी होंगे, शायद वे भी कुछ सटीक बता पाने की स्थिति में नहीं होंगे। मगर विभाजन की विभीषिका के त्रास्दी-पूर्ण इतिहास का दस्तावेजीकरण हो चुका होगा। अब भी ललक बनी हुई है दोनों देशों के आम नागरिकों में कि क्या अच्छे पड़ौसी के रूप में वे दोनों देश और अब तीसरा बांग्लादेश परस्पर सुख-दुख बांट पाएंगे या फिर नफरत, हिकारत और टकराव का सातवां दरिया बहता रहेगा? अब तक विभाजन 1947 पर अंग्रेजी, हिंदी, उर्दू व पंजाबी में कृतियों की एक बाढ़ आ चुकी है। सभी में लेखकों, पत्रकारों व राजनेताओं की अपनी-अपनी जुगाली है लेकिन ऐसा भी नहीं कि घटनाओं, शख्सियतों, प्रामाणिक बयानों का दस्तावेजीकरण नहीं हुआ। फर्क सिर्फ निष्कर्षों का है।
वर्ष 1947 की 14-15 अगस्त को पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में त्रास्दी एवं जश्न का मिश्रित रूप देखने में आया था। दुष्यंत कुमार की एक काव्य पंक्ति उन दिनों की एक झलक देती है-
‘कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं
गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं’
स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री अर्द्धरात्रि (14-15 अगस्त) को अपना बहुचर्चित सम्बोधन ‘दी ट्रायस्ट ऑफ डेस्टिनी’ संसद के केंद्रीय कक्ष में और अगले दिन लाल किले की प्राचीर से दे रहे थे, सिर्फ 24 घंटे पूर्व पाकिस्तान के प्रथम गवर्नर जनरल मुहम्मद अली जिन्ना अपने नवघोषित देश पाकिस्तान के करोड़ों लोगों से मुखातिब हो रहे थे। ब्रिटेन का यूनियन जैक सभी सरकारी इमारतों से विदाई ले चुका था और अब उसका केवल नाम ही इतिहास की पुस्तकों में शेष बचा था। तीसरी ओर देश के रक्तिम विभाजन की लकीरों को अंतिम रूप देने में व्यस्त था। रैडक्लिफ जो उस समय भी आतंकित था कि उसके द्वारा खींची जा रही लकीरों पर कैसी प्रतिक्रिया होने वाली थी। वह अपनी विभाजन-लकीरों को अंतिम रूप 17 अगस्त की सायं तक ही दे पाया था। यह भी विचित्र विसंगति है कि 17 अगस्त की शाम से पहले नेहरू व जिन्ना दोनों को ही पता नहीं था कि उनके नए देश की सीमाएं कहां तक होंगी।
पुरानी दम तोड़ती पीढ़ी ने अपनी अगली तीन पीढि़यों को भी अतीत से मुक्त नहीं होने दिया। दो बार भूगोल बदला है, मगर इतिहास अभी तक विस्मृति के हाशिए पर अतीत को बुहार नहीं पा रहा। शायद यह मुमकिन भी नहीं है। भारतीय उपमहाद्वीप ने 75 वर्ष पूर्व जो भोगा, जिया था, वह किसी न किसी रूप में फिर से कुनमुनाने लगता है। कभी विश्वभर में नए-नए रूपों में उभरने वाली शरणार्थी-गाथाओं के बहाने कभी राखीगढ़ी व हड़प्पा के संदभोज में तो कभी करतारपुर-कॉरिडोर के बहाने, अतीत बार-बार स्वयं को दोहराता है। फिलहाल यह तो तय है कि 15 अगस्त, 1947 के पूर्व की स्थिति बहाल नहीं हो सकती। इतिहास में ‘रिवर्स गियर’ का प्राय: कोई प्रावधान नहीं होता। वैसे भूगोल में जर्मनी ने भी बर्लिन की दीवार तोड़ी, सोवियत संघ व यूगोस्लोविया व चैकोस्लोवाकिया में बदलाव भी आए और वर्ष 1971 में बांगला देश स्वतंत्र राष्ट्र बना। यह कहावत कि ‘इतिहास अपने आपको दोहराता है’ इस संदर्भ में लागू नहीं होती। वर्ष 1965 व 1971 में जो कुछ हुआ उसकी आशंकाएं आगे भी कुनमुनाती हैं। वर्ष 1971 में उस भूखण्ड का एक और टुकड़ा अलग हुआ। भविष्य के गर्भ में क्या है, कुछ कहना संभव नहीं है लेकिन टकराव व नफरत के सिलसिले जारी रहे तो कुछ भी संभव है।
भारतीय पंजाब ने आतंकवाद के दशक में जो कुछ झेला या उससे पूर्व 1971 में जो कुछ हुआ या जो कुछ अब भी भारत-पाक सीमा, विशेष रूप से कश्मीर क्षेत्र में जारी है। उग्र आशंकाएं हैं कि अभी भी टूटन संभव है। यह टूटन बलूचिस्तान में होती है या किसी भारतीय क्षेत्र में इसके लिए कोई हरकत पाकिस्तान की ओर होती है, दोनों ही स्थितियों में इस उपमहाद्वीप की साझी संस्कृति की फुलकारी उधड़ती है। यह समूची कवायद सिर्फ इसलिए है कि वर्ष 1947 में इस उपमहाद्वीप के करोड़ों लोगों ने जो सन्त्रास झेला है, उसकी किसी भी तरह पुनरावृत्ति न हो। भूगोल की लकीरें, ज़ेहन की गहराइयों तक न गहराएं, यही दुआएं, इस कृति के मूल से बंधी हैं।
भाषा, रहन-सहन, संस्कृति व विरासत की साझेदारी के इलावा भी बहुत कुछ है जो इस कृति के माध्यम से हमें जोड़कर रखे हुए हैं। इतना तो सुनिश्चित बनाना ही चाहिए कि अब भविष्य में इस उपमहाद्वीप में कोई ‘रिफ्यूजी’ न हो। 1947 के विभाजन की 100वीं वर्षगांठ (14-15 अगस्त 2047) दिल्ली, लाहौर, ढाका और इस्लामाबाद में अलग-अलग, मिश्रित और गहरी भावनाओं के साथ मनाई जाएगी। 100 वर्षों बाद यह केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं बल्कि एक युग के अंत और एक नई पीढ़ी की पहचान का दिन होगा। संभावित प्रतिक्रियाएं इस प्रकार हो सकती हैं-
1. नई दिल्ली (भारत)- स्मृति और विजय
विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस (14 अगस्त): भारत सरकार 100वीं वर्षगांठ पर बड़े पैमाने पर विभाजन के पीडि़तों को याद करेगी। स्कूलों, सरकारी दफ्तरों में मौन और प्रदर्शनी लगाई जा सकती है।
15 अगस्त को विभाजन के दर्द से आगे बढ़कर ‘विकसित भारत’ के संकल्प का जश्न मनाया जाएगा जो विभाजन के दौरान मिली अस्थिरता के विपरीत एक मजबूत, विकसित राष्ट्र का प्रतीक होगा।
भावनात्मक यादें : बुजुर्ग पीढ़ी विभाजन की कहानियों को याद करेगी लेकिन युवा पीढ़ी अपने-अपने देश की आर्थिक और तकनीकी प्रगति पर ध्यान केंद्रित करेगी।
2. लाहौर और इस्लामाबाद (पाकिस्तान)- राष्ट्रवाद और पहचान
पाकिस्तान में 14 अगस्त, 2047 को पाकिस्तान के निर्माण और भारत से अलगाव के गौरवपूर्ण जश्न के रूप में मनाया जाएगा। लाहौर, जो विभाजन में सबसे अधिक प्रभावित हुआ, वहां के बुजुर्गों के लिए यह एक उदासीन और दर्दनाक दिन भी हो सकता है, जहां वे बंटवारे से पहले के ‘साझा पंजाब’ को याद करेंगे।
3. ढाका (बांग्लादेश)- 1971 की विरासत
दोहरी स्मृति: ढाका के लिए यह 1947 (पाकिस्तान का हिस्सा बनने) की तुलना में 1971 (स्वतंत्रता) की स्मृति अधिक महत्वपूर्ण होगी। 14 अगस्त, 1947 का दिन पाकिस्तान से शोषण की शुरूआत के रूप में याद किया जाएगा।
बंगाली चेतना: 100 वर्ष बाद, बांग्लादेश अपनी अलग बंगाली भाषाई और सांस्कृतिक पहचान पर गर्व करेगा जो बंटवारे के बाद भी बरकरार रही।
100 वर्षों बाद के बदलाव
युवा पीढ़ी का नजरिया: 2047 की पीढ़ी के लिए विभाजन एक पाठ्यपुस्तक की कहानी होगी न कि व्यक्तिगत दर्द। डिजिटल और तकनीकी प्रगति के कारण, लोग डिजिटल माध्यम से पुरानी यादें और परिवार के इतिहास साझा कर सकते हैं। उम्मीद की जा सकती है कि 100 वर्षों बाद विभाजन का गहरा घाव, हालांकि मिटेगा नहीं लेकिन एक समझदारी और स्वीकार्यता में बदल जाएगा, जिससे दोनों देशों के बीच बेहतर संबंध बन सकें।

Dr. Chander Trikha